अह्ले सुन्नत वल-जमाअत का अक़ीदा


लेखक

मुह़म्मद बिन सालेह अल-उसैमीन

अनूवादक

रज़ाउर्रह़मान अंसारी

 संक्षिप्त परिचय

अहले सुन्नत वल-जमाअत का अक़ीदाः शैख़ मुह़म्मद बिन सालेह अल-उसैमीन रह़िमहुल्लाह की इस पुस्तक में अल्लाह, उसके फ़रिश्तों, उसकी किताबों, उसके रसूलों, आख़िरत के दिन और अच्छी तथा बुरी तक़्दीर पर ईमान के विषय में क़ुर्आन एवं ह़दीस की रोशनी में अहले सुन्नत वल-जमाअत का अक़ीदा तथा अक़ीदा के लाभ का उल्लेख किया गया है।

 प्रस्तावना

समस्त प्रशंसा केवल अल्लाह के लिए है, और दुरूद तथा सलमा नाज़िल हो उनपर जिनके बाद कोई नबी नहीं आने वाला है, तथा उनके परिवार-परिजन और सह़ाबा किराम पर।

मुझे ʻअक़ीदाʼ (विश्वास) संबंधी इस मूल्यवान संक्षिप्त पुस्तक की सूचना मिली, जिसे हमारे भाई फ़ज़ीलतुश शैख़ अल्लामा मुह़म्मद बिन सालेह़ अल-ओसैमीन ने संकलन किया है। हमने इस पुस्तक को शुरू से अन्त तक पढ़वाकर सुना, तो इसे अल्लाह की तौह़ीद, उसके नामों, गुणों, फ़रिश्तों, पुस्तकों, रसूलों, आख़िरत (परलोक) के दिन और भाग्य के अच्छे एवं बुरे होने पर ईमान के अध्यायों में 'अहले सुन्नत वल जामाअत' के ʻअक़ायदʼ का विशाल संग्रह पाया। इसमें कोई संदेह नहीं कि लेखक महोदय ने बड़ी उत्तमता से इसे एकत्र किया एवं उपकार योग्य बनाया है। इस पुस्तक में उन्होंने उन चीज़ों का उल्लेख किया है, जो एक विद्यार्थी एवं साधारण मुसलमान के लिए अल्लाह, उसके फ़रिश्तों, किताबों, रसूलों, अंतिम दिन और भाग्य के अच्छे एवं बुरे होने पर ईमान के संबंध में आवश्यक्ता होती है, तथा इसके साथ-साथ उन्होंने अक़ीदा सम्बन्धी ऐसी लाभजनक बातों का भी वर्णन किया है, जो कभी-कभी अक़ीदे के बारे में लिखी गई बहुत सारी पुस्तकों में नहीं मिलतीं। अल्लाह तआला लेखक महोदय को इसका अच्छा बदला दे तथा शिक्षापूर्ण ज्ञान से सम्मानित करे। इस पुस्तक तथा उनकी अन्य पुस्तकों को साधारण लोगों के लिए हितकर एवं लाभदायक बनाए तथा उन्हें, हमें और हमारे सभी भाइयों को हिदायत पाने वालों और ज्ञान के साथ, उसकी तरफ़ दअवत देने वालों में बनाये। निःसंदेह वह सुनने वाला एवं अत्यन्त निकट है। आमीन!

दुरूद एवं सलमाम नाज़िल हो हमारे नबी मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, उनके परिवार-परिजन एवं सह़ाबा किराम पर।

अल्लाह तआला की रह़मत एवं मग़फ़िरत का भिखारी

अब्दुल अज़ीज़ बिन अब्दुल्लाह बिन बाज़ (रह़िमहुल्लाह)

महाध्यक्ष

इस्लामी वैज्ञानिक अनुसंधान, इफ़्ता, दावह् तथा मार्गदर्शन संस्थान, रियाद, सऊदी अरब

 भूमिका

समस्त प्रशंसा सारे जहान के पालनहार के लिए है, अन्तिम सफलता अल्लाह से डरने वालों के लिए है और अत्याचार केवल अत्याचारियों पर है। मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य मअबूद (पूज्य) नहीं है, वह अकेला है, असका कोई शरीक (साझी) नहीं, वह मलिक (बादशाह) है, ह़क़्क़ (सत्य) है, मुबीन (प्रकट करने वाला) है। और गवाही देता हूँ कि मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, उसके बन्दे तथा उसके रसूल (संदेष्टा) हैं, जो समस्त नबियों में अन्तिम हैं और सदाचारियों के अगुवा हैं। अल्लाह तआला की कृपा नाज़िल हो उनपर, उनके परिवार-परिजन पर, उनके अस्ह़ाब (साथियों) पर और बदले के दिन तक भलाई के साथ उनका अनुसरण करने वालों पर। अम्मा बाद!

अल्लाह तआला ने अपने रसूल मुह़म्मद सल्लल्लाहू अलैहि व सल्लम को हिदायत (मार्गदर्शन) तथा सत्य धर्म देकर, सम्पूर्ण जगत के लिए रह़मत (कृपा), अच्छे कर्म करने वालों के लिए आदर्श तथा तमाम बन्दों पर ह़ुज्जत (प्रमाण) बनाकर भेजा। आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के ज़रिया तथा आपपर अवतरित पुस्तक (क़ुर्आन) द्वारा अल्लाह तआला ने वह सब कुछ बयान कर दिया, जिसमें बन्दों के लिए कल्याण तथा उनके सांसरिक एवं धार्मिक मामलों की भलाई निहित है। जैसे सही अक़ायद, पुण्य के कर्म, उत्तम आचरण तथा नैतिकता से परिपूर्ण सभ्यता।

तथा प्यारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपनी उम्मत को उस प्रकाशमान मार्ग पर छोड़कर इस संसार से गये हैं, जिसकी रात भी दिन की तरसह प्रकाशमान है, केवल कुकर्मी एवं पापी ही इस मार्ग से भटक सकता है।

चुनांचे इस मार्ग पर आपकी उम्मत के वह लोग दृढ़ता से क़ायम रहे, जिन्होंने अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के आह्वान को स्वीकार किया। वह सह़ाबए किराम, ताबेईने इज़ाम और सुचारु रूप से उनका अनुसरण करने वालों की जमाअत थी। वे, सभी मनुष्यों में श्रेष्ठ एवं शुध्द आत्मा वाले थे। उन्होंने प्यारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की शरीअत के अनुसार कर्म किये, सुन्नत को दृढ़ता से थामे रखा और अक़ीदा, उपासना (इबादत) तथा सदव्यवहार को पूर्णतः अपने ऊपर लागू किया। इसीलिए वे, वह कल्याणकारी दल घोषित हुए, जो सदा सत्य पर स्थिर रहेंगे, उनका विरोध एवं निन्दा करने वाले उन्हें कोई हानि नहीं पहुँचा सकते, यहाँ तक कि महाप्रलय आ जाएगी और वह इसी मार्ग पर क़ायम रहेंगे।

और हम भी –अल्-ह़मदु लिल्-लाह- उन्हीं के मार्ग पर चल रहे हैं तथा उनके तरीक़े को अपनाये हुए हैं, जिसे अल्लाह की किताब और रसूल की सुन्नत का समर्थन प्राप्त है। हम इसकी चर्चा अल्लाह की नेमत को बयान करने के लिए और यह बताने के लिए कर रहे हैं कि हर ईमानदार पर आवश्यक है कि वह इस तरीक़े को अपनाये।

हम अल्लाह तआला से दुआ करते हैं कि हमें तथा हमारे मुसलमान भाइयों को लोक-परलोक में ʻकलिमए तौह़ीदʼ पर दृढ़ता के साथ क़ायम रखे तथा हमें अपनी कृपा से सम्मानित करे। निःसंदेह वह बहुत ही दया एवं कृपा करने वाला है।

इस विषय के महत्व को सामने रखकर और इस बारे में लोगों की प्रवृत्ति की विभक्ति के कारण मैंने बेहतर समझा कि अहले सुन्नत वल-जमाअत के अक़ीदे को, जिस पर हम चल रहे हैं, संक्षिप्त तौर पर लिपिबध्द कर दूँ। अहले सुन्नत वल-जमाअत का अक़ीदा हैः अल्लाह तआला, उसके फ़रिश्तों, उसकी किताबों, उसके रसूलों, क़यामत के दिन एवं भाग्य के अच्छे एवं बुरे होने पर ईमान लाना।

मैं अल्लाह तआला से दुआ करता हूँ कि वह इस कार्य को सिर्फ अपने लिए करने का सामर्थ्य दे, इसका शुमार प्रिय कर्मों में करे तथा अपने बन्दों के लिए लाभदायक बनाये। आमीन या रब्बल आलमीन!

 अध्यायः 1

 हमारा अक़ीदा (विश्वास)

हमारा अक़ीदाः अल्लाह, उसके फ़रिश्तों, उसकी किताबों, उसके रसूलों, आख़िरत के दिन और तक़दीर की भलाई-बुराई पर ईमान लाना।

 अल्लाह तआला पर ईमान

हम अल्लाह तआला की ʻरुबूबियतʼ पर ईमान रखते हैं। अर्थात इस बात पर विश्वास रखते हैं कि केवल वही पालने वाला, पैदा करने वाला, हर चीज़ का स्वामी तथा सभी कार्यों का उपाय करने वाला है।

और हम अल्लाह तआला की ʻउलूहियतʼ (पूज्य होने) पर ईमान रखते हैं। अर्थात इस बात पर विश्वास रखते हैं कि वही सच्चा मअबूद है और उसके अतिरिक्त तमाम मअबूद असत्य तथा बातिल हैं।

अल्लाह तआला के नामों तथा उसके गुणों पर भी हमारा ईमान है। अर्थात इस बात पर हमारा विश्वास है कि अच्छे से अच्छे नाम और उच्चतम तथा पूर्णतम गुण उसी के लिए हैं।

और हम इन मामलों में उसकी वह़दानिय (एकत्ववाद) पर ईमान रखते हैं। अर्थात इस बात पर ईमान रखते हैं कि उसकी रूबूबियत, उलूहियत तथा असमा व सिफ़ात (नाम व गुण) में उसका कोई शरीक नहीं। अल्लाह तआला ने फ़रमायाः

﴿رَّبُّ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِ وَمَا بَيۡنَهُمَا فَٱعۡبُدۡهُ وَٱصۡطَبِرۡ لِعِبَٰدَتِهِۦۚ هَلۡ تَعۡلَمُ لَهُۥ سَمِيّٗا[1]

“वह आकाशों एवं धरती का तथा जो कुछ उन दोनों के बीच है, सबका प्रभु है, इसलिए उसीकी उपासना करो तथा उसीकी उपासना पर दृढ़ रहो। क्या तुम उसका कोई समनाम जानते हो?”

और हमारा ईमान है किः

﴿ٱللَّهُ لَآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَٱلۡحَيُّ ٱلۡقَيُّومُۚ لَا تَأۡخُذُهُۥ سِنَةٞ وَلَا نَوۡمٞۚ لَّهُۥ مَا فِي ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَمَا فِي ٱلۡأَرۡضِۗ مَن ذَا ٱلَّذِي يَشۡفَعُ عِندَهُۥٓ إِلَّا بِإِذۡنِهِۦۚ يَعۡلَمُ مَا بَيۡنَ أَيۡدِيهِمۡ وَمَا خَلۡفَهُمۡۖ وَلَا يُحِيطُونَ بِشَيۡءٖ مِّنۡ عِلۡمِهِۦٓ إِلَّا

بِمَا شَآءَۚ وَسِعَ كُرۡسِيُّهُ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضَۖ وَلَا يَ‍ُٔودُهُۥ حِفۡظُهُمَاۚ وَهُوَ ٱلۡعَلِيُّ ٱلۡعَظِيمُ[2]

“अल्लाह तआला ही सत्य मअबूद है, उसके अतिरिक्त कोई उपासना के योग्य नहीं। वह जीवित है। सदैव स्वयं स्थिर रहने वाला है। उसे न ऊँघ आती है और न ही नींद। जो कुछ आकाशों तथा धरती में है, उसी का है। कौन है, जो उसकी आज्ञा के बिना उसके सामने किसी की सिफ़ारिश (अभिस्ताव) कर सके? जो कुछ लोगों के सामने हो रहा है तथा जो कुछ उनके पीछे हो चुका है, वह सब जानता है। और वह उसके ज्ञान में से किसी चीज़ का घेरा नहीं कर सकते, परन्तु वह जितना चाहे। उसकी कुर्सी की परिधि ने आकाश एवं धरती को घेरे में ले रखा है। तथा उसके लिए इनकी रक्षा कठिन नहीं। वह तो उच्च एवं महान है।”

और हमारा ईमान है किः

﴿هُوَ ٱللَّهُ ٱلَّذِي لَآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَۖ عَٰلِمُ ٱلۡغَيۡبِ وَٱلشَّهَٰدَةِۖ هُوَ ٱلرَّحۡمَٰنُ ٱلرَّحِيمُ ٢٢ هُوَ ٱللَّهُ ٱلَّذِي لَآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ٱلۡمَلِكُ ٱلۡقُدُّوسُ ٱلسَّلَٰمُ ٱلۡمُؤۡمِنُ ٱلۡمُهَيۡمِنُ ٱلۡعَزِيزُ ٱلۡجَبَّارُ ٱلۡمُتَكَبِّرُۚ سُبۡحَٰنَ ٱللَّهِ عَمَّا يُشۡرِكُونَ ٢٣ هُوَ ٱللَّهُ ٱلۡخَٰلِقُ ٱلۡبَارِئُ ٱلۡمُصَوِّرُۖ لَهُ ٱلۡأَسۡمَآءُ ٱلۡحُسۡنَىٰۚ يُسَبِّحُ لَهُۥ مَا فِي ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِۖ وَهُوَ ٱلۡعَزِيزُ ٱلۡحَكِيمُ[3]

“वही अल्लाह है, जिसके अतिरिक्त कोई सत्य मअबूद नहीं। प्रोक्ष तथा प्रत्यक्ष का जानने वाला है। वह बहुत बड़ा दयावान एवं अति कृपालु है। वह अल्लाह है, जिसके अतिरिक्त कोई उपासना के योग्य नहीं। स्वामी, अत्यंत पवित्र, सभी दोषों से मुक्त, शान्ति करने वाला, रक्षक, बलिष्ठ, प्रभावशाली है। लोग जो साझीदार बनाते हैं, अल्लाह उससे पाक एवं पवित्र है। वही अल्लाह सृष्टिकर्ता, आविष्कारक, रूप देने वाला है। अच्छे-अच्छे नाम उसी के लिए हैं। आकाशों एवं धरती में जितनी चीज़ें हैं, सब उसकी तस्बीह़ (पवित्रता) बयान करती हैं और वही प्रभावशाली एवं ह़िक्मत वाला है।”

और हमारा ईमान है कि आकाशों तथा धरती का राजत्व उसी के लिए हैः

﴿لِّلَّهِ مُلۡكُ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِۚ يَخۡلُقُ مَا يَشَآءُۚ يَهَبُ لِمَن يَشَآءُ إِنَٰثٗا وَيَهَبُ لِمَن يَشَآءُ ٱلذُّكُورَ ٤٩ أَوۡ يُزَوِّجُهُمۡ ذُكۡرَانٗا وَإِنَٰثٗاۖ وَيَجۡعَلُ مَن يَشَآءُ عَقِيمًاۚ إِنَّهُۥ عَلِيمٞ قَدِيرٞ[4]

“आकाशो एवं धरती की बादशाही केवल उसी के लिए है। वह जो चाहे पैदा करता है, जिसे चाहता है बेटियाँ देता है और जिसे चाहता है बेटा देता है, या उनको बेटे और बेटियाँ दोनों प्रदान करता है और जिसे चाहता है निःसंतान रखता है। निःसंदेह वह जानने वाला तथा शक्ति वाला है।”

और हमारा ईमान है किः

﴿لَيۡسَ كَمِثۡلِهِۦ شَيۡءٞۖ وَهُوَٱلسَّمِيعُ ٱلۡبَصِيرُ ١١ لَهُۥ مَقَالِيدُ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِۖ يَبۡسُطُ ٱلرِّزۡقَ لِمَن يَشَآءُ وَيَقۡدِرُۚ إِنَّهُۥ بِكُلِّ شَيۡءٍ عَلِيمٞ[5]

“उस जैसी कोई चीज़ नहीं, वह ख़ूब सुनने वाला, देखने वाला है। आकाशों एवं धरती की कुंजियाँ उसी के पास हैं। वह जिसके लिए चाहता है, जीविका विस्तृत कर देता है तथा (जिसके लिए चाहता है) थोड़ा कर देता है। निःसंदेह वह प्रत्येक वस्तु का जानने वाला है।”

और हमारा ईमान है किः

﴿وَمَا مِن دَآبَّةٖ فِي ٱلۡأَرۡضِ إِلَّا عَلَى ٱللَّهِ رِزۡقُهَا وَيَعۡلَمُ مُسۡتَقَرَّهَا وَمُسۡتَوۡدَعَهَاۚ كُلّٞ فِي كِتَٰبٖ مُّبِينٖ[6]

“धरती पर कोई चलने-फिरने वाला नहीं, मगर उसकी जीविका अल्लाह के ज़िम्मे है। वही उनके रहने-सहने का स्थान भी जानता है तथा उनको अर्पित किये जाने का स्थान भी। यह सब कुछ खुली किताब (लौह़े मह़फ़ूज़) में मौजूद है।”

और हमारा ईमान है किः

﴿وَعِندَهُۥ مَفَاتِحُ ٱلۡغَيۡبِ لَا يَعۡلَمُهَآ إِلَّا هُوَۚ وَيَعۡلَمُ مَا فِي ٱلۡبَرِّ وَٱلۡبَحۡرِۚ وَمَا تَسۡقُطُ مِن وَرَقَةٍ إِلَّا يَعۡلَمُهَا وَلَا حَبَّةٖ فِي ظُلُمَٰتِ ٱلۡأَرۡضِ وَلَا رَطۡبٖ وَلَا يَابِسٍ إِلَّا فِي كِتَٰبٖ مُّبِينٖ[7]

“तथा उसी के पास परोक्ष की कुंजियाँ हैं, जिनको उसके अतिरिक्त कोई नहीं जानता। तथा उसे थल एवं जल की तमाम चीज़ों का ज्ञान है। तथा कोई पत्ता भी झड़ता है तो वह उसको जानता है। तथा धरती के अन्धेरों में कोई अन्न तथा हरी या सूखी चीज़ नहीं, मगर उसका उल्लेख खुली किताब (लौह़े मह़फ़ूज़) में है।”

और हमारा ईमान है किः

﴿إِنَّ ٱللَّهَ عِندَهُۥ عِلۡمُ ٱلسَّاعَةِ وَيُنَزِّلُ ٱلۡغَيۡثَ وَيَعۡلَمُ مَا فِي ٱلۡأَرۡحَامِۖ وَمَا تَدۡرِي نَفۡسٞ مَّاذَا تَكۡسِبُ غَدٗاۖ وَمَا تَدۡرِي نَفۡسُۢ بِأَيِّ أَرۡضٖ تَمُوتُۚ إِنَّ ٱللَّهَ عَلِيمٌ خَبِيرُۢ[8]

“निःसंदेह अल्लाह ही के पास क़यामत (महाप्रलय) का ज्ञान है। तथा वही वर्षा देता है, तथा जो कुछ गर्भाशय में है (उसकी वास्तविकता) वही जानता है, तथा कोई नहीं जानता कि कल क्या कमायेगा, तथा कोई जीवधारी नहीं जानता कि धरती के किस क्षेत्र में उसकी मृत्यु होगी। निःसंदेह अल्लाह ही पूर्ण ज्ञान वाला एवं सही ख़बरों वाला है।”

और हमारा ईमान है कि अल्लाह तआला जो चाहे, जब चाहे तथा जैसे चाहे, कलाम (बात) करता है।

﴿وَكَلَّمَ ٱللَّهُ مُوسَىٰ تَكۡلِيمٗا[9]

“और अल्लाह ने मूसा अलैहिस्सलाम से बात की।”

﴿وَلَمَّا جَآءَ مُوسَىٰ لِمِيقَٰتِنَا وَكَلَّمَهُۥ رَبُّهُ[10]

“और जब मूसा अलैहिस्सलाम हमारे समय पर (तूर पहाड़ पर) आये और उनके रब ने उनसे बातें कीं।”

﴿وَنَٰدَيۡنَٰهُ مِن جَانِبِ ٱلطُّورِ ٱلۡأَيۡمَنِ وَقَرَّبۡنَٰهُ نَجِيّٗا[11]

“और हमने उनको तूर की दायें ओर से पुकारा और गुप्त बात कहने के लिए निकट बुलाया।”

और हमारा ईमान है किः

﴿لَّوۡ كَانَ ٱلۡبَحۡرُ مِدَادٗا لِّكَلِمَٰتِ رَبِّي لَنَفِدَ ٱلۡبَحۡرُ قَبۡلَ أَن تَنفَدَ كَلِمَٰتُ رَبِّي وَلَوۡ جِئۡنَا بِمِثۡلِهِۦ مَدَدٗا[12]

“यदि समुद्र मेरे प्रभु की बातों को लिखने के लिए स्याही बन जाय, तो पूर्व इसके कि मेरे प्रभु की बातें समाप्त हों, समुद्र समाप्त हो जाय।”

﴿وَلَوۡ أَنَّ مَا فِي ٱلۡأَرۡضِ مِن شَجَرَةٍ أَقۡلَٰمٞ وَٱلۡبَحۡرُ يَمُدُّهُۥ مِنۢ بَعۡدِهِۦ سَبۡعَةُ أَبۡحُرٖ مَّا نَفِدَتۡ كَلِمَٰتُ ٱللَّهِۚ إِنَّ ٱللَّهَ عَزِيزٌ حَكِيمٞ[13]

“यदि ऐसा हो कि धरती पर जितने वृक्ष हैं, सब क़लम हों तथा समुद्र स्याही हो तथा उसके बाद सात समुद्र और स्याही हो जायें, फिर भी अल्लाह की बातें समाप्त नहीं हो सकतीं। निःसंदेह अल्लाह प्रभावशाली एवं ह़िक्मत वाला है।”

और हमारा ईमान है कि अल्लाह तआला की बातें सूचनाओं के एतबार से पूर्णतः सत्य, विधि-विधान के एतबार से न्याय संबलित तथा सब बातों से सुन्दर हैं। अल्लाह तआला ने फ़रमायाः

﴿وَتَمَّتۡ كَلِمَتُ رَبِّكَ صِدۡقٗا وَعَدۡلٗاۚ[14]

“तथा तुम्हारे प्रभु की बातें सत्य एवं न्याय से परिपूर्ण हैं।”

और फ़रमायाः

﴿وَمَنۡ أَصۡدَقُ مِنَ ٱللَّهِ حَدِيثٗا[15]

“तथा अल्लाह से बढ़कर सत्य बात कहने वाला कौन है?”

तथा हम इस पर भी ईमान रखते हैं कि क़ुर्आन करीम अल्लाह का शुभ कथन है। निःसंदेह उसने बात की और जिब्रील अलैहिस्सलाम पर ʻइल्क़ाʼ (वह बात जो अल्लाह किसी के दिल में डालता है) किया, फिर जिब्रील अलैहिस्सलाम ने प्यारे नबी के दिल में उतारा। अल्लाह तआला ने फ़रमायाः

﴿قُلۡ نَزَّلَهُۥ رُوحُ ٱلۡقُدُسِ مِن رَّبِّكَ بِٱلۡحَقِّ[16]

“कह दीजिए, उसको ʻरूह़ूल क़ुदुसʼ (जिब्रील अलैहिस्सलाम) तुम्हारे प्रभु की ओर से सत्यता के साथ लेकर आये हैं।”

﴿وَإِنَّهُۥ لَتَنزِيلُ رَبِّ ٱلۡعَٰلَمِينَ ١٩٢ نَزَلَ بِهِ ٱلرُّوحُ ٱلۡأَمِينُ ١٩٣ عَلَىٰ قَلۡبِكَ لِتَكُونَ مِنَ ٱلۡمُنذِرِينَ ١٩٤ بِلِسَانٍ عَرَبِيّٖ مُّبِينٖ[17]

“और यह (पवित्र क़ुर्आन) सारे जहान के पालनहार की ओर से अवतरित किया हुआ है, जिसे लेकर ʻरूह़ुल अमीनʼ (जिब्रील अलैहिस्सलाम) आये, तुम्हारे दिल में डाला, ताकि तुम लोगों को डराने वालों में से हो जाओ। (यह क़ुर्आन) स्वच्छ अरबी भाषा में है।”

और हमारा ईमान है कि अल्लाह तआला अपनी ज़ात एवं गुणों में अपनी सृष्टि से ऊँचा है। उसने स्वयं फ़रमायाः

﴿وَهُوَ ٱلۡعَلِيُّ ٱلۡعَظِيمُ[18]

“वह बहुत उच्च एवं बहुत महान है।”

और फ़रमायाः

﴿وَهُوَ ٱلۡقَاهِرُ فَوۡقَ عِبَادِهِۦۚ وَهُوَ ٱلۡحَكِيمُ ٱلۡخَبِيرُ[19]

“तथा वह अपने बन्दों पर प्रभावशाली है, और वह बड़ी ह़िक्मत वाला और पूरी ख़बर रखने वाला है।”

और हमारा ईमान है किः

﴿إِنَّ رَبَّكُمُ ٱللَّهُ ٱلَّذِي خَلَقَ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضَ فِي سِتَّةِ أَيَّامٖ ثُمَّ ٱسۡتَوَىٰ عَلَى ٱلۡعَرۡشِۖ يُدَبِّرُ ٱلۡأَمۡرَۖ[20]

“निःसंदेह तुम्हारा पालक अल्लाह ही है, जिसने आकाशों तथा धरती को छः दिनों में बनाया, फिर अर्श पर उच्चय हुआ, वह प्रत्येक कार्य की व्यवस्था करता है।”

अल्लाह तआला के अर्श पर उच्चय होने का अर्थ यह है कि अपनी ज़ात के साथ उसपर बुलंद व बाला हुआ, जिस प्रकार की बुलंदी उसकी शान तथा महानता के योग्य है, जिसकी स्थिति का विवरण उसके अतिरिक्त किसी को मालूम नहीं।

और हम इस पर भी ईमान रखते हैं कि अल्लाह तआला अर्श पर रहते हुए भी (अपने ज्ञान के माध्यम से) अपनी सृष्टि के साथ होता है। उनकी दशाओं को जानता है, बातों को सुनता है, कार्यों को देखता है तथा उनके सभी कार्यों का उपाय करता है, भिक्षुक को जीविका प्रदान करता है, निर्बल को शक्ति एवं बल देता है, जिसे चाहे सम्मान देता है और जिसे चाहे अपमानित करता है, उसी के हाथ में कल्याण है और वह प्रत्येक चीज़ पर सामर्थ्य रखता है। और जिसकी यह शान हो, वह अर्श पर रहते हुए भी (अपने ज्ञान के माध्यम से) ह़क़ीक़त में अपनी सृष्टि के साथ रह सकता है।

﴿لَيۡسَ كَمِثۡلِهِۦ شَيۡءٞۖ وَهُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلۡبَصِيرُ[21]

“उस जैसी कोई चीज़ नहीं। वह ख़ूब सुनने वाला, देखने वाला है।”

लेकिन हम जहमिया समुदाय के एक फ़िर्क़ा ह़ुलूलिया की तरह यह नहीं कहते कि वह धरती में अपनी सृष्टि के साथ है। हमारा विचार यह है कि जो व्यक्ति ऐसा कहे, वह या तो गुमराह है या फिर काफ़िर। क्योंकि उसने अल्लाह तआला को ऐसे अपूर्ण गुणों के साथ विशेषित कर दिया, जो उसकी शान के योग्य नहीं हैं।

और हमारा, प्यारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की बताई हुई इस बात पर भी ईमान है कि अल्लाह तआला हर रात, आख़िरी तिहाई में, पृथ्वी से निकट आकाश पर नाज़िल होता है और कहता हैः (( कौन है, जो मुझे पुकारे कि मैं उसकी पुकार सुनूँ? कौन है, जो मुझसे माँगे कि मैं उसको दूँ? कौन है, जो मुझसे माफ़ी तलब करे कि मैं उसे माफ़ कर दूँ?))

और हमारा ईमान है कि अल्लाह तआला क़यामत के दिन बन्दों के बीच फ़ैसला करने के लिए आयेगा। अल्लाह तआला ने फ़रमायाः

﴿كَلَّآۖ إِذَا دُكَّتِ ٱلۡأَرۡضُ دَكّٗا دَكّٗا ٢١ وَجَآءَ رَبُّكَ وَٱلۡمَلَكُ صَفّٗا صَفّٗا ٢٢ وَجِاْيٓءَ يَوۡمَئِذِۢ بِجَهَنَّمَۚ يَوۡمَئِذٖ يَتَذَكَّرُ ٱلۡإِنسَٰنُ وَأَنَّىٰ لَهُ ٱلذِّكۡرَى[22]

निःसंदेह जब धरती कूट-कूट कर समतल कर दी जायेगी, तथा तुम्हारा रब (प्रभु) आयेगा और फ़रिश्ते पंक्तिबध्द होकर आयेंगे, तथा उस दिन नरक (दोज़ख़) को लाया जायेगा, तो मनुष्य को उस दिन शिक्षा ग्रहण करने से क्या लाभ होगा?”

और हमारा ईमान है कि अल्लाह तआलाः

﴿فَعَّالٞ لِّمَا يُرِيدُ[23]

“वह जो चाहे उसे कर देने वाला है।”

और हम इसपर भी ईमान रखते हैं कि उसके इरादे की दो क़िस्में हैं:

1.  इरादए कौनियाः

इसी से अल्लाह तआला की इच्छा अमल में आती है। अल्बत्ता यह ज़रूरी नहीं कि यह उसे पसंद भी हो। यही इरादा है, जो ʻमशीयते इलाहीʼ अर्थात ʻईश्वरेच्छाʼ कहलाती है। जैसा कि अल्लाह तआला का फ़रमान हैः

﴿وَلَوۡ شَآءَ ٱللَّهُ مَا ٱقۡتَتَلُواْ وَلَٰكِنَّ ٱللَّهَ يَفۡعَلُ مَا يُرِيدُ[24]

“और यदि अल्लाह चाहता, तो यह लोग आपस में न लड़ते, किन्तु अल्लाह जो चाहता है, करता है।”

﴿وَلَا يَنفَعُكُمۡ نُصۡحِيٓ إِنۡ أَرَدتُّ أَنۡ أَنصَحَ لَكُمۡ إِن كَانَ ٱللَّهُ يُرِيدُ أَن يُغۡوِيَكُمۡۚ هُوَ رَبُّكُمۡ وَإِلَيۡهِ تُرۡجَعُونَ﴾[25]

“तुम्हें मेरी शुभचिन्ता कुछ भी लाभ नहीं पहुँचा सकती, चाहे मैं जितना ही तुम्हारा शुभचिन्तक क्यों न हूँ, यदि अल्लाह की इच्छा तुम्हें भटकाने की हो। वही तुम सबका प्रभु है तथा उसी की ओर लौटकर जाओगे।”

2.  इरादए शरईयाः

आवश्यक नहीं कि यह प्रकट ही हो जाये। और इसमें उद्दिष्ट विषय अल्लाह को प्रिय ही होता है। जैसा कि अल्लाह तआला ने फ़रमायाः

﴿وَٱللَّهُ يُرِيدُ أَن يَتُوبَ عَلَيۡكُمۡ[26]

“और अल्लाह तआला चाहता है कि तुम्हारी तौबा क़बूल करे।”

और हमारा ईमान है कि अल्लाह तआला का इरादा चाहे ʻकौनीʼ हो या ʻशरईʼ, उसकी ह़िक्मत के अधीन है। अतः हर वह कार्य, जिसका फ़ैसला अल्लाह तआला ने अपनी इच्छानुसार लिया अथवा उसकी सृष्टि ने शरई तौर पर उसपर अमल किया, वह किसी ह़िक्मत के कारण तथा ह़िक्मत के मुताबिक़ होता है। चाहे हमें उसका ज्ञान हो अथवा हमारी बुध्दि उसको समझने में असमर्थ हो।

﴿أَلَيۡسَ ٱللَّهُ بِأَحۡكَمِ ٱلۡحَٰكِمِينَ[27]

“क्या अल्लाह समस्त ह़ाकिमों का ह़ाकिम नहीं है?”

﴿وَمَنۡ أَحۡسَنُ مِنَ ٱللَّهِ حُكۡمٗا لِّقَوۡمٖ يُوقِنُونَ[28]

“तथा जो विश्वास रखते हैं, उनके लिए अल्लाह से बढ़कर उत्तम निर्णय करने वाला कौन हो सकता है?”

और हमारा ईमान है कि अल्लाह तआला अपने औलिया से मुह़ब्बत करता है तथा वह भी अल्लाह से मुह़ब्बत करते हैं।

﴿قُلۡ إِن كُنتُمۡ تُحِبُّونَ ٱللَّهَ فَٱتَّبِعُونِي يُحۡبِبۡكُمُ ٱللَّهُ[29]

“कह दीजिए कि यदि तुम अल्लाह से मुह़ब्बत करते हो, तो मेरा अनुसरण करो, अल्लाह तुमसे मुह़ब्बत करेगा।”

﴿فَسَوۡفَ يَأۡتِي ٱللَّهُ بِقَوۡمٖ يُحِبُّهُمۡ وَيُحِبُّونَهُۥ[30]

“तो अल्लाह तआला ऐसे लोगों को पैदा कर देगा, जिनसे वह मुह़ब्बत करेगा तथा वह उससे मुह़ब्बत करेंगे।”

﴿وَٱللَّهُ يُحِبُّ ٱلصَّٰبِرِينَ[31]

“तथा अल्लाह धैर्य रखने वालों से मुह़ब्बत करता है।”

﴿وَأَقۡسِطُوٓاْۖ إِنَّ ٱللَّهَ يُحِبُّ ٱلۡمُقۡسِطِينَ[32]

“तथा न्याय से काम लो, निःसंदेह अल्लाह न्याय करने वालों से मुह़ब्बत करता है।”

﴿وَأَحۡسِنُوٓاْۚ إِنَّ ٱللَّهَ يُحِبُّ ٱلۡمُحۡسِنِينَ[33]

“और एह़सान करो, निःसंदेह अल्लाह एह़सान करने वालों से मुह़ब्बत करता है।”

और हमारा ईमान है कि अल्लाह तआला ने जिन कर्मों तथा कथनों को धर्मानुकूल किया है, वह उसे प्रिय हैं और जिनसे रोका है, वह उसे अप्रिय हैं।

﴿إِن تَكۡفُرُواْ فَإِنَّ ٱللَّهَ غَنِيٌّ عَنكُمۡۖ وَلَا يَرۡضَىٰ لِعِبَادِهِ ٱلۡكُفۡرَۖ وَإِن تَشۡكُرُواْ يَرۡضَهُ لَكُمۡۗ[34]

“यदि तुम कृतघ्नता व्यक्त करोगे, तो अल्लाह तुमसे निस्पृह है। वह अपने बन्दों के लिए कृतघ्नता पसन्द नहीं करता है, और यदि कृतज्ञता करोगे, तो वह उसको तुम्हारे लिए पसंद करेगा।”

﴿وَلَٰكِن كَرِهَ ٱللَّهُ ٱنۢبِعَاثَهُمۡ فَثَبَّطَهُمۡ وَقِيلَ ٱقۡعُدُواْ مَعَ ٱلۡقَٰعِدِينَ[35]

“परन्तु, अल्लाह तआला ने उनके उठने को प्रिय न माना, इसलिए उन्हें हिलने-डोलने ही न दिया और उनसे कहा गया कि तुम बैठने वालों के साथ बैठे ही रहो।”

और हमारा ईमान है कि अल्लाह तआला ईमान लाने वालों तथा नेक अमल करने वालों से प्रसन्न होता है।

﴿رَّضِيَ ٱللَّهُ عَنۡهُمۡ وَرَضُواْ عَنۡهُۚ ذَٰلِكَ لِمَنۡ خَشِيَ رَبَّهُۥ[36]

“अल्लाह उनसे प्रसन्न हुआ तथा वह अल्लाह से प्रसन्न हुए। यह उसके लिए है, जो अपने प्रभु से डरे।”

और हमारा ईमान है कि काफ़िर इत्यादियों में से जो क्रोध के अधिकारी हैं, अल्लाह उनपर क्रोध प्रकट करता है।

﴿ٱلظَّآنِّينَ بِٱللَّهِ ظَنَّ ٱلسَّوۡءِۚ عَلَيۡهِمۡ دَآئِرَةُ ٱلسَّوۡءِۖ وَغَضِبَ ٱللَّهُ عَلَيۡهِمۡ[37]

“जो लोग अल्लाह के सम्बन्ध में बुरे गुमान रखने वाले हैं, उन्हीं पर बुराई का चक्र है तथा अल्लाह उनसे क्रोधित हुआ।”

﴿وَلَٰكِن مَّن شَرَحَ بِٱلۡكُفۡرِ صَدۡرٗا فَعَلَيۡهِمۡ غَضَبٞ مِّنَ ٱللَّهِ وَلَهُمۡ عَذَابٌ عَظِيمٞ[38]

“परन्तु, जो लोग खुले दिल से कुफ़्र करें, तो उनपर अल्लाह का क्रोध है तथा उन्हीं के लिए बहुत बड़ी यातना है।”

और हमारा ईमान है कि अल्लाह का मुख है, जो महानता तथा सम्मान से विशेषित है।

﴿وَيَبۡقَىٰ وَجۡهُ رَبِّكَ ذُو ٱلۡجَلَٰلِ وَٱلۡإِكۡرَامِ ٢٧[39]

“तथा तेरे प्रभु का मुख जो महान एवं सम्मानित है, बाक़ी रहेगा।”

और हमारा ईमान है कि अल्लाह तआला के महान एवं कृपा वाले दो हाथ हैं।

﴿بَلۡ يَدَاهُ مَبۡسُوطَتَانِ يُنفِقُ كَيۡفَ يَشَآءُۚ[40]

“बल्कि उसके दोनों हाथ खुले हुए हैं। वह जिस प्रकार चाहता है, ख़र्च करता है।”

﴿وَمَا قَدَرُواْ ٱللَّهَ حَقَّ قَدۡرِهِۦ وَٱلۡأَرۡضُ جَمِيعٗا قَبۡضَتُهُۥ يَوۡمَ ٱلۡقِيَٰمَةِ وَٱلسَّمَٰوَٰتُ مَطۡوِيَّٰتُۢ بِيَمِينِهِۦۚ سُبۡحَٰنَهُۥ وَتَعَٰلَىٰ عَمَّا يُشۡرِكُونَ ٦٧[41]

तथा उन्होंने अल्लाह का जिस प्रकार सम्मान करना चाहिए था, नहीं किया। क़यामत के दिन सम्पूर्ण धरती उसकी मुट्ठी में होगी तथा आकाश उसके दायें हाथ में लपेटे होंगे, वह उन लोगों के शिर्क से पवित्र एवं सर्वोपरि है।”

और हमारा ईमान है कि अल्लाह तआला की दो वास्तविक आँखें हैं। अल्लाह तआला ने फ़रमायाः

﴿وَٱصۡنَعِ ٱلۡفُلۡكَ بِأَعۡيُنِنَا وَوَحۡيِنَا[42]

“तथा एक नाव हमारी आँखों के सामने और हमारे हुक्म से बनाओ।”

और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमयाः

((حِجَابُهُ النّوْرُ لَوْ كَشَفَهُ لَأَحْرَقَتْ سُبُحَاتُ وَجْهِهِ مَا انْتَهَى إلَيْهِ بَصَرُهُ مِنْ خَلْقِهِ))[43]

((अल्लाह तआला का पर्दा नूर (ज्योति) है, यदि उसे उठा दे, तो उसके मुख की ज्योतियों से उसकी सृष्टी जलकर राख हो जाये।))

तथा सुन्नत का अनुसरण करने वालों का इस बात पर इजमा (एकमत) है कि अल्लाह तआला की आँखें दो हैं, जिसकी पुष्टि दज्जाल के बारे में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के इस फ़र्मान से होती हैः

((إِنَّهُ أَعْوَرُ، وإِنَّ رَبَّكُمْ لَيْسَ بِأَعْوَرَ))

((दज्जाल काना है तथा तुम्हारा प्रभु काना नहीं है।)

और हमारा ईमान है किः

﴿لَّا تُدۡرِكُهُ ٱلۡأَبۡصَٰرُ وَهُوَ يُدۡرِكُ ٱلۡأَبۡصَٰرَۖ وَهُوَ ٱللَّطِيفُ ٱلۡخَبِيرُ[44]

“निगाहें उसका परिवेष्टन नहीं कर सकतीं तथा वर सब निगाहों का परिवेष्टन करता है, और वह सूक्ष्मदर्शी तथा सर्वसूचित है।”

और हमारा ईमान है कि ईमानदार लोग क़यामत के दिन अपने प्रभु को देखेंगे।

﴿وُجُوهٞ يَوۡمَئِذٖ نَّاضِرَةٌ ٢٢ إِلَىٰ رَبِّهَا نَاظِرَةٞ ٢٣[45]

“उस दिन बहुत-से मुख प्रफुल्लित होंगे, अपने प्रभु की ओर देख रहे होंगे।”

और हमारा ईमान है कि अल्लाह के गुणों के परिपूर्ण होने के कारण, उसका समकक्ष कोई नहीं है।

﴿لَيۡسَ كَمِثۡلِهِۦ شَيۡءٞۖ وَهُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلۡبَصِيرُ[46]

उस जैसी कोई चीज़ नहीं। वह ख़ूब सुनने वाला, देखने वाला है।”

और हमारा ईमान है किः

﴿لَا تَأۡخُذُهُۥ سِنَةٞ وَلَا نَوۡمٞۚ[47]

“उसे न ऊँघ आती है और न ही नींद।”

क्योंकि उसमें जीवन तथा स्थिरता का गुण परिपूर्ण है।

और हमारा ईमान है कि वह अपने पूर्ण न्याय एवं इन्साफ़ के गुणों के कारण किसी पर अत्याचार नहीं करता। तथा उसकी निगरानी एवं परिवेष्टन की पूर्णता के कारण वह अपने बन्दों के कर्मों से बेख़बर नहीं है।

और हमारा ईमान है कि उसके पूर्ण ज्ञान एवं क्षमता के कारण आकाश तथा धरती की कोई चीज़ उसे लाचार नहीं कर सकती।

﴿إِنَّمَا أَمْرُهُ إِذَا أَرَادَ شَيْئًا أَنْ يَقُوْلَ لَهُ كُنْ فَيَكُوْنُ[48]

“उसकी शान यह है कि वह जब किसी चीज़ का इरादा करता है, तो कह देता है कि हो जा, तो हो जाता है।”

और हमारा ईमान है कि उसकी शक्ति की पूर्णता के कारण, उसे कभी लाचारी एवं थकावट का सामना नहीं करना पड़ता है।

﴿وَلَقَدْ خَلَقْنَا السَّمٰوٰتِ وَالْأَرْضَ وَمَا بَيْنَهُمَا فِى سِتَّةِ أَيَّامٍ وَمَا مَسَّنَا مِنْ لُغُوْبٍ[49]

 “और हमने आकाशों एवं धरती को तथा उनके अन्दर जो कुछ है, सबको, छः दिन में पैदा कर दिया और हमें ज़रा भी थकावट नहीं हुई।”

और हमारा ईमान अल्लाह तआला के उन नामों एवं गुणों पर है, जिनका प्रमाण स्वयं अल्लाह तआला के कलाम अथवा उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की ह़दीसों से मिलता है। किन्तु हम दो बड़ी त्रुटियों से अपने आपको बचाते हैं, जो यह हैं:

1.  समानताः अर्थात दिल या ज़ुबान से यह कहना कि अल्लाह तआला के गुण मनुष्य के गुणों के समान हैं।

2.  अवस्थाः अर्थात दिल या ज़ुबान से यह कहना कि अल्लाह तआला के गुणों की कैफ़ियत इस प्रकार है।

और हमारा ईमान है कि अल्लाह तआला उन सब गुणों से पाक एवं पवित्र है, जिन्हें अपनी ज़ात के सम्बन्ध में उसने स्वयं या उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अस्वीकार किया है। ध्यान रहे कि इस अस्वीकृति में, सांकेतिक रूप से उनके विपरीत पूर्ण गुणों का प्रमाण भी मौजूद है। और हम उन गुणों से ख़ामोशी अख़्तियार करते हैं, जिनसे अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ख़ामोश हैं।

हम समझते हैं कि इसी मार्ग पर चलना अनिवार्य है। इसके बिना कोई चारा नहीं। क्योंकि जिन चीज़ों को स्वयं अल्लाह तआला ने अपने लिए साबित किया या जिनका इन्कार किया, वह ऐसी सूचना है, जो उसने अपने संबंध में दी है। और अल्लाह अपने बारे में सबसे ज़्यादा जानने वाला, सबसे ज़्यादा सच बोलने वाला है और सबसे उत्तम बात करने वाला है। जबकि बन्दों का ज्ञान उसका परिवेष्टन कदापि नहीं कर सकता।

तथा अल्लाह तआला के लिए उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने जिन चीज़ों को साबित किया या जिनका इन्कार किया है, वह भी ऐसी सूचना है जो आपने अल्लाह के संबंध में दी है। और आप अपने प्रभु के बारे में लोगों में सबसे ज़्यादा जानकार, सबसे ज़्यादा शुभचिंतक, सबसे ज़्यादा सच बोलने वाले और सबसे ज़्यादा विशुध्दभाषी हैं।

अतः अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के कलाम में ज्ञान, सच्चाई तथा विवरण की पूर्णता है। इसलिए उसे अस्वीकार करने या उसे मानने में हिचकिचाने का कोई कारण नहीं।

 अध्यायः 2

अल्लाह तआला के वह सभी गुण, जिनकी चर्चा हमने पिछले पृष्ठों में की है, विस्तृत रूप से हो या संक्षेप में तथा प्रमाणिक करके हो या अस्कवीकृत करके, उनके बारे में हम अपने प्रभु की किताब (क़ुर्आन) तथा अपने प्यारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत (ह़दीस) पर आश्रित हैं और इस विषय में उम्मत के सलफ़ तथा उनके बाद आने वाले इमामों के मन्हज (तरीक़े) पर चलते हैं।

हम ज़रूरी समझते हैं कि अल्लाह तआला की किताब और रसूलुल्लाह की सुन्नत के नुसूस (कुर्आन ह़दीस की वाणी) को, उनके ज़ाहिरी (प्रत्यक्ष) अर्थ में लिया जाय और उनको उस ह़क़ीक़त पर मह़मूल किया जाय (यानी प्रकृतार्थ में लिया जाय), जो अल्लाह तआला के लिए उचित तथा मुनासिब है।

हम फेर-बदल करने वालों के तरीक़ों से ख़ुद को अलग करते हैं, जिन्होंने किताब व सुन्नत के उन नुसूस को, उस तरफ़ फेर दिया, जो अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की इच्छा के विपरीत है।

और हम ख़ुद को अलग करते हैं (अल्लाह तआला के गुणों का) इन्कार करने वालों के आचरण से, जिन्होंने उन नुसूस को उन अर्थों से हटा दिया, जो अर्थ अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने लिए हैं।

और हम ख़ुद को अलग करते हैं उन ग़ुलू (अतिरंजन) करने वालों की शैली से, जिन्होंने उन नुसूस को समानता के अर्थ में लिया है या उनकी कैफ़ियत बयान की है।

हमें यक़ीनी तौर पर मालूम है कि जो कुछ अल्लाह की किताब तथा उसके नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत में मौजूद है, वह सत्य है। उसमें पारस्परिक टकराव नहीं है। इसलिए कि अल्लाह तआला ने फ़रमायाः

﴿أَفَلَا يَتَدَبَّرُوْنَ الْقُرْآنَ وَلَوْ كَانَ مِنْ عِنْدِ غَيْرِ اللهِ لَوَجَدُوْا فِيْهِ اخْتِلَافًا كَثِيْرًا[50]

“भला यह लोग क़ुर्आन में ग़ौर क्यों नहीं करते? यदि यह अल्लाह के अतिरिक्त किसी और की ओर से होता, तो इसमें बहुत ज़्यादा पारस्परिक टकराव पाते।”

क्योंकि सूचनाओं में पारस्परिक टकराव, उनमें से एक को दूसरे के द्वारा मिथ्या साबित करता है। जबकि यह बात अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के द्वारा दी गयी सूचनाओं में असम्भव है।

जो व्यक्ति यह दावा करे कि अल्लाह की किताब, उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत या उन दोनों में पारस्परिक टकराव है, तो उसका यह दावा, उसके कुधारणा तथा उसके दिल के टेढ़ेपन के प्रमाण है। इसलिए उसे अल्लाह तआला से क्षमा याचना करना तथा अपनी गुमराही से बाज़ आना चाहिए।

जो व्यक्ति इस भ्रम में है कि अल्लाह की किताब, उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत या उन दोनों में पारस्परिक टकराव है, तो यह उसके ज्ञान की कमी, समझने में असमर्थता अथवा ग़ौर व फ़िक्र की कोताही का प्रमाण है। अतः उसके लिए आवश्यक है कि ज्ञान अर्जित करे और ग़ौर व फ़िक्र की सलाहियत पैदा करे, ताकि सत्य स्पष्ट हो सके। और अगर सत्य स्पष्ट न हो पाये, तो मामला उसके जानने वाले को सौंप दे, भ्रम की स्थिति से बाहर आये और कहे, जिस तरह पूर्ण एवं दृढ़ ज्ञान वाले कहते हैं:

﴿ءَامَنَّا بِهِۦ كُلٌّ مِنْ عِنْدِ رَبِّنَا[51]

“हम उसपर ईमान लाये, यह सब कुछ हमारे प्रभु के यहाँ से आया है।”

और जान ले कि न किताब में, न सुन्नत में और न इन दोनों के बीच कोई भिन्नता और टकराव है।

 अध्यायः 3

 फ़रिश्तों पर ईमान

हम अल्लाह ताआला के फ़रिश्तों पर ईमान रखते हैं और यह कि वेः

﴿عِبَادٌ مُّكْرَمُوْنَ ٢٦ لَا يَسْبِقُوْنَهُ بِالْقَوْلِ وَ هُمْ بِأَمْرِهِۦ يَعْمَلُوْنَ[52]

“सम्मानित बन्दे हैं, उसके समक्ष बढ़कर नहीं बोलते और उसके आदेशों पर कार्य करते हैं।”

अल्लाह तआला ने उन्हें पैदा फ़रमाया, तो वे उसकी उपासना में लग गए तथा आज्ञा पालन के लिए आत्म समर्पण कर दिए।

﴿لَا يَسْتَكْبِرُوْنَ عَنْ عِبَادَتِهِۦ وَلَا يَسْتَحْسِرُوْنَ١٩ يُسَبِّحُوْنَ اللَّيْلَ وَالنَّهَارَ لَا يَفْتَرُوْنَ[53]

“वे उसकी उपासना से न अहंकार करते हैं और न ही थकते हैं। दिन-रात उसकी पवित्रता वर्णन करते हैं और ज़रा सी भी सुस्ती नहीं करते।”

अल्लाह तआला ने उन्हें हमारी नज़रों से ओझल रखा है, इसलिए हम उन्हें देख नहीं सकते। अल्बत्ता, कभी-कभी अल्लाह तआला अपने कुछ बन्दों के लिए उन्हें प्रकट भी कर देता है। जैसा कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने जिब्रील अलैहिस्सलाम को उनके असली रूप में देखा। उनके छः सौ पंख थे, जो क्षितिज (उफ़ुक़) को ढाँपे हुए थे। इसी प्रकार जिब्रील अलैहिस्सलाम मरयम अलैहस्सलाम के पास सम्पूर्ण आदमी का रूप धारण करके आये, तो मरयम अलैहस्सलाम ने उनसे बातें कीं तथा उन्हें उनका उत्तर दिया।

और एक बार प्यारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास सह़ाबा किराम मौजूद थे कि जिब्रील अलैहिस्सलाम एक मनुष्य का रूप धारण करके आ गये, जिन्हें न कोई नहीं पहचानता था और न उनपर यात्रा का कोई प्रभाव दिखाई दे रहा था। कपड़े बिल्कुल उजले और बाल बिल्कुल काले थे। वह नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सामने घुटना से घुटना मिलाकर बैठ गए और अपने दोनों हाथों को आपके दोनों रानों पर रखकर आपसे सम्बोधित हुए। नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उनके जाने के पश्चात सह़ाबा को बताया कि वह जिब्रील अलैहिस्सलाम थे।

और हमारा ईमान है कि फ़रिश्तों के ज़िम्मे कुछ काम लगाये गये हैं।

उनमें से एक जिब्रील अलैहिस्सलाम हैं, जिनको वह़्य का कार्यभार सोंपा गया है, जिसे वह अल्लाह के पास से लाते हैं तथा अंबिया एवं रसूलों में से जिसपर अल्लाह तआला चाहता है, नाज़िल करते हैं।

तथा उनमें से एक मीकाईल अलैहिस्लाम हैं, जिनको वर्षा एवं वनस्पति की ज़िम्मेदारी सौंपी गयी है।

तथा उनमें से एक इस्राफ़ील अलैहिस्सलाम हैं, जिन्हें क़यामत आने पर पहले लोगों को बेहोशी के लिए फिर दोबारा ज़िन्दा करने के लिए सूर फूँकने का कार्यभार दिया गया है।

तथा एक मलकुल-मौत हैं, जिन्हें मृत्यु के समय प्राण निकालने का काम सोंपा गया है।

तथा उनमें से एक मालिक हैं, जो जहन्नम के दारोगा हैं।

तथा कुछ फ़रिश्ते उनमें से माँ के पेट में बच्चों के कार्यों पर नियुक्त किए गये हैं। तथा कुछ फ़रिश्ते आदम अलैहिस्सलाम की संतान की रक्षा के लिए नियुक्त हैं।

तथा कुछ फ़रिश्तों के ज़िम्मे मनुष्य के कर्मों का लेखन क्रिया है। हरेक व्यक्ति पर दो-दो फ़रिश्ते नियुक्त हैं।

﴿عَنِ الْيَمِيْنِ وَ عَنِ الشِّمَالِ قَعِيْدٌ١٧ مَا يَلْفِظُ مِنْ قَوْلٍ إِلَّا لَدَيْهِ رَقِيْبٌ عَتِيْدٌ[54]١٨

“जो दायें-बायें बैठे हैं, उनकी (मनुष्य की) कोई बात ज़ुबान पर नहीं आती, परन्तु रक्षक उसके पास लिखने को तैयार रहता है।”

उनमें से एक गिरोह मैयित से सवाल करने पर नियुक्त है। जब मैयित को मृत्यु के पश्चात अपने ठिकाने पर पहुँचा दिया जाता है, तो उसके पास दो फ़रिश्ते आते हैं और उससे उसके प्रभु, उसके दीन तथा उसके नबी के सम्बंध में प्रश्न करते हैं, तोः

﴿يُثَبِّتُ اللهُ الَّذِيْنَ ءَامَنُوْا بِالْقَوْلِ الثَّابِتِ فِى الْحَيوةِ الدُّنْيَا وَ فِى الْآخِرَةِۖ وَ يُضِلُّ اللهُ الظَّالِميْنَۚ وَ يَفْعَلُ اللهُ مَا يَشَاءُ[55]

“अल्लाह तआला ईमानदारों को पक्की बात पर दृढ़ रखता है सांसारिक जीवन में भी तथा परलोकिक जीवन में भी। तथा अल्लाह तआला अन्याय करने वालों को भटका देता है। और अल्लाह तआला जो चाहता है, करता है।”

और उनमें से चंद फ़रिश्ते जन्नतियों के यहाँ नियुक्त हैं।

﴿وَٱلۡمَلَٰٓئِكَةُ يَدۡخُلُونَ عَلَيۡهِم مِّن كُلِّ بَابٖ ٢٣ سَلَٰمٌ عَلَيۡكُم بِمَا صَبَرۡتُمۡۚ فَنِعۡمَ عُقۡبَى ٱلدَّارِ ٢٤[56]

“फ़रिश्ते हरेक द्वार से उनके पास आयेंगे और कहेंगेः सलामती हो तुमपर तुम्हारे धैर्य के बदले, परलोकिक घर क्या ही अच्छा है!”

तथा प्यारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया कि आकाश में बैतुल मामूर है, जिसमें रोज़ाना सत्तर हज़ार फ़रिश्ते प्रवेश करते हैं –एक रिवायत के अनुसार उसमें नमाज़ पढ़ते है- और जो एक बार प्रवेश कर जाते हैं, उनकी बारी दोबारा कभी नहीं आती।

 अध्यायः 4

 किताबों पर ईमान

हमारा ईमान है कि जगत पर ह़ुज्जत क़ायम करने तथा अमल करने वालों को रास्ता दिखाने के लिए अल्लाह तआला ने अपने रसूलों पर किताबें नाज़िल फ़रमाईं। पैग़म्बर इन किताबों के द्वारा लोगों को धर्म की शिक्षा देते तथा उनके दिलों की सफ़ाई करते थे।

और हमारा ईमान है कि अल्लाह तआला ने हर रसूल के साथ एक किताब नाज़िल फ़रमाई। इसकी दलील अल्लाह तआला का यह फरमान हैः

﴿لَقَدۡ أَرۡسَلۡنَا رُسُلَنَا بِٱلۡبَيِّنَٰتِ وَأَنزَلۡنَا مَعَهُمُ ٱلۡكِتَٰبَ وَٱلۡمِيزَانَ لِيَقُومَ ٱلنَّاسُ بِٱلۡقِسۡطِ[57]

“निःसंदेह हमने अपने पैग़म्बरों को खुली निशानियाँ देकर भेजा और उनपर किताब तथा न्याय (तुला) नाज़िल की, ताकि लोग न्याय पर क़ायम रहें।”

हमें उनमें से निम्नलिखित किताबों का ज्ञान हैः

1.  तौरातः

इसे अल्लाह तआला ने मूसा अलैहिस्सलाम पर नाज़िल किया और यह किताब बनी इस्राईल में सबसे मुख्य किताब थी।

﴿إِنَّآ أَنزَلۡنَا ٱلتَّوۡرَىٰةَفِيهَا هُدٗى وَنُورٞۚ يَحۡكُمُ بِهَا ٱلنَّبِيُّونَ ٱلَّذِينَ أَسۡلَمُواْلِلَّذِينَ هَادُواْ وَٱلرَّبَّٰنِيُّونَ وَٱلۡأَحۡبَارُ بِمَا ٱسۡتُحۡفِظُواْ مِن كِتَٰبِ ٱللَّهِ وَكَانُواْ عَلَيۡهِ شُهَدَآءَۚ[58]

“हमने नाज़िल किया तौरात को, जिसमें मार्गदर्शन एवं ज्योति है। यहूदियों में इसी तौरात के साथ अल्लाह तआला के मानने वाले अम्बिया (अलैहिमुस्सलाम), अल्लाह वाले और उलेमा फ़ैस्ले करते थे। क्योंकि उन्हें अल्लाह की इस किताब की रक्षा करने का आदेश दिया गया था और वह इसपर गवाह थे।”

2.  इन्जीलः

इसे अल्लाह तआला ने ईसा अलैहिस्सलाम पर नाज़िल किया और यह तौरात की पुष्टि करने वाली एवं सम्पूरक थी।

﴿وَءَاتَيۡنَٰهُ ٱلۡإِنجِيلَ فِيهِ هُدٗى وَنُورٞ وَمُصَدِّقٗالِّمَا بَيۡنَ يَدَيۡهِ مِنَ ٱلتَّوۡرَىٰةِ وَهُدٗى وَمَوۡعِظَةٗ لِّلۡمُتَّقِينَ ٤٦[59]

“और हमने उनको (ईसा अलैहिस्सलाम को) इन्जील प्रदान की, जिसमें मार्गदर्शन एवं ज्योति है तथा वह अपने से पूर्व किताब तौरात की पुष्टि करती है तथा वह परहेज़गारों (संयमियों) के लिए मार्गदर्शन एवं सदुपदेश है।”

﴿وَلِأُحِلَّ لَكُم بَعۡضَ ٱلَّذِي حُرِّمَ عَلَيۡكُمۡۚ[60]

“और मैं इसलिए भी आया हूँ कि कुछ चीज़ें, जो तुमपर ह़राम कर दी गई थीं, तुम्हारे लिए ह़लाल कर दूँ।”

3.  ज़बूरः

इसे अल्लाह तआला ने दाऊद अलैहिस्सलाम पर उतारा।

4.  इब्राहीम अलैहिस्सलाम और मूसा अलैहिस्सलाम अलैहिस्सलाम के सह़ीफ़े।

5.  क़ुर्आन मजीदः

इसे अल्लाह तआला ने अपने आख़री नबी मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर नाज़िल किया।

﴿هُدٗى لِّلنَّاسِ وَبَيِّنَٰتٖ مِّنَ ٱلۡهُدَىٰ وَٱلۡفُرۡقَانِۚ[61]

“जो लोगों के लिए मार्गदर्शन है तथा इसमें मार्गदर्शन की निशानियाँ हैं एवं सत्य तथा असत्य में अन्तर करने वाला है।”

﴿مُصَدِّقٗا لِّمَا بَيۡنَ يَدَيۡهِ مِنَ ٱلۡكِتَٰبِ وَمُهَيۡمِنًا عَلَيۡهِ[62]

“जो अपने से पूर्व की किताबों की पुष्टि करने वाली तथा उन सबका रक्षक है।”

अल्लाह तआला ने पवित्र क़ुर्आन के द्वारा पिछली तमाम किताबों को मन्सूख़ (निरस्त) कर दिया तथा उसे खिलवाड़ियों के खेल एवं फेर-बदल करने वालों के टेढ़ेपन से सुरक्षित रखने की ज़िम्मेदारी स्वयं ली है।

﴿إِنَّا نَحۡنُ نَزَّلۡنَا ٱلذِّكۡرَ وَإِنَّا لَهُۥ لَحَٰفِظُونَ[63]

निःसंदेह हमने ही इस क़ुर्आन को उतारा है तथा हम ही इसके रक्षक हैं।”

क्योंकि यह क़यामत तक तमाम सृष्टि पर ह़ुज्जत बनकर क़ायम रहेगा।

जहाँ तक पिछली आसमानी किताबों का संबंध है, तो वह एक निर्धारित समय तक के लिए थीं और उस समय तक बाक़ी रहती थीं, जब तक उन्हें मन्सूख़ (निरस्त) करने वाली तथा उनमें होने वाले फेर-बदल को स्पष्ट करने वाली किताब न आ जाती थी। इसी लिए (पवित्र क़ुर्आन से पूर्व की) कोई किताब फेर-बदल तथा कमी-बेशी से सुरक्षित न रह सकी।

﴿مِّنَ ٱلَّذِينَ هَادُواْ يُحَرِّفُونَ ٱلۡكَلِمَ عَن مَّوَاضِعِهِۦ[64]

यहूदियों में से कुछ ऐसे हैं, जो कलिमात को उसके उचित स्थान से उलट-फेर कर देते हैं।”

﴿فَوَيۡلٞ لِّلَّذِينَ يَكۡتُبُونَ ٱلۡكِتَٰبَ بِأَيۡدِيهِمۡ ثُمَّ يَقُولُونَ هَٰذَا مِنۡ عِندِ ٱللَّهِ لِيَشۡتَرُواْ بِهِۦ ثَمَنٗا قَلِيلٗاۖ فَوَيۡلٞ لَّهُم مِّمَّا كَتَبَتۡ أَيۡدِيهِمۡ وَوَيۡلٞ لَّهُم مِّمَّا يَكۡسِبُونَ[65]٧٩﴾

“उन लोगों के लिए सर्वनाश है, जो अपने हाथों की लिखी हुई किताब को अल्लाह तआला की ओर से उतरी हुई कहते हैं और इस प्रकार दुनिया कमाते हैं। उनके हाथों की लिखाई को और उनकी कमाई के लिए बर्बादी और अफ़्सोस है।”

﴿قُلۡ مَنۡ أَنزَلَ ٱلۡكِتَٰبَ ٱلَّذِي جَآءَ بِهِۦ مُوسَىٰ نُورٗا وَهُدٗى لِّلنَّاسِۖ تَجۡعَلُونَهُۥ قَرَاطِيسَ تُبۡدُونَهَا وَتُخۡفُونَ كَثِيرٗاۖ[66]

“कह दीजिए कि वह किताब किसने नाज़िल की है, जिसको मूसा अलैहिस्सलाम लाये थे, जो लोगों के लिए प्रकाश तथा मार्गदर्शक है, जिसे तुमने उन अलग-अलग पेपरों में रख छोड़ा है, जिनको वयक्त करते हो और बहुत सी बातों को छुपाते हो।”

﴿وَإِنَّ مِنۡهُمۡ لَفَرِيقٗا يَلۡوُۥنَ أَلۡسِنَتَهُم بِٱلۡكِتَٰبِ لِتَحۡسَبُوهُ مِنَ ٱلۡكِتَٰبِ وَمَا هُوَ مِنَ ٱلۡكِتَٰبِ وَيَقُولُونَ هُوَ مِنۡ عِندِ ٱللَّهِ وَمَا هُوَ مِنۡ عِندِ ٱللَّهِ وَيَقُولُونَ عَلَى ٱللَّهِ ٱلۡكَذِبَ وَهُمۡ يَعۡلَمُونَ ٧٨ مَا كَانَ لِبَشَرٍ أَن يُؤۡتِيَهُ ٱللَّهُ ٱلۡكِتَٰبَ وَٱلۡحُكۡمَ وَٱلنُّبُوَّةَ ثُمَّ يَقُولَ لِلنَّاسِ كُونُواْ عِبَادٗا لِّي مِن دُونِ ٱللَّهِ[67]

“अवश्य उनमें से ऐसा गिरोह भी है, जो किताब पढ़ते हुए अपनी जीभ मोड़ लेता है, ताकि तुम उसको किताब ही का लेख समझो, हालाँकि वह किताब में से नहीं है, और यह कहते भी हैं कि वह अल्लाह की ओर से है, हालाँकि वह अल्लाह की ओर से नहीं, वह तो जान-बूझकर अल्लाह पर झूठ बोलते हैं। किसी ऐसे पुरुष को, जिसे अल्लाह किताब, विज्ञान और नुबूअत प्रदान करे, यह उचित नहीं कि फिर भी वह लोगों से कहे कि अल्लाह को छोड़कर मेरे भक्त बन जाओ।”

﴿يَٰٓأَهۡلَ ٱلۡكِتَٰبِ قَدۡ جَآءَكُمۡ رَسُولُنَا يُبَيِّنُ لَكُمۡ كَثِيرٗا مِّمَّا كُنتُمۡ تُخۡفُونَ مِنَ ٱلۡكِتَٰبِ وَيَعۡفُواْ عَن كَثِيرٖۚ قَدۡ جَآءَكُم مِّنَ ٱللَّهِ نُورٞ وَكِتَٰبٞ مُّبِينٞ ١٥ يَهۡدِي بِهِ ٱللَّهُ مَنِ ٱتَّبَعَ رِضۡوَٰنَهُۥ سُبُلَ ٱلسَّلَٰمِ وَيُخۡرِجُهُم مِّنَ ٱلظُّلُمَٰتِ إِلَى ٱلنُّورِ بِإِذۡنِهِۦ وَيَهۡدِيهِمۡ إِلَىٰ صِرَٰطٖ مُّسۡتَقِيمٖ ١٦ لَّقَدۡ كَفَرَ ٱلَّذِينَ قَالُوٓاْ إِنَّ ٱللَّهَ هُوَ ٱلۡمَسِيحُ ٱبۡنُ مَرۡيَمَۚ[68]

“हे अह्ले किताब! तुम्हारे पास हमारे रसूल (मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) आ गये, जो बहुत सी वह बातें बता रहे हैं, जो किताब (तौरात तथा इन्जील) की बातें तुम छुपा रहे थे तथा बहुत सी बातों को छोड़ रहे हैं। तुम्हारे पास अल्लाह की ओर से ज्योति तथा खुली किताब (पवित्र क़ुर्आन) आ चुकी है। जिसके द्वारा अल्लाह उन्हें शान्ति का पथ दिखाता है, जो उसकी प्रसन्नता का अनुकरण करें। तथा उन्हें अन्धकार से, अपनी कृपा से प्रकाश की ओर निकाल लाता है तथा उन्हें सीधा मार्ग दर्शाता है। निःसंदेह वह लोग काफिर हो गये, जिन्होंने कहा कि मर्यम का पुत्र मसीह अल्लाह है।”

 अध्याचः 5

 रसूलों पर ईमान

हमारा ईमान है कि अल्लाह तआला ने अपनी सृष्टि की ओर रसूलों को भेजा।

﴿رُّسُلٗا مُّبَشِّرِينَ وَمُنذِرِينَ لِئَلَّا يَكُونَ لِلنَّاسِ عَلَى ٱللَّهِ حُجَّةُۢ بَعۡدَ ٱلرُّسُلِۚ وَكَانَ ٱللَّهُ عَزِيزًا حَكِيمٗا[69]

“शुभसूचक एवं सचेतकर्ता रसूल बनाकर भेजा, ताकि लोगों के लिए कोई बहाना एवं अभियोग रसूलों के (भेजने के) पश्चात न रह जाये, तथा अल्लाह तआला शक्तिमान एवं पूर्ण ज्ञानी है।”

और हमारा ईमान है कि सबसे प्रथम रसूल नूह़ अलैहिस्सलाम तथा अन्तिम रसूल मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हैं।

﴿إِنَّآ أَوۡحَيۡنَآ إِلَيۡكَ كَمَآ أَوۡحَيۡنَآ إِلَىٰ نُوحٖ وَٱلنَّبِيِّ‍ۧنَ مِنۢ بَعۡدِهِۦۚ[70]

“हमने आपकी ओर उसी प्रकार वह़्य भेजी, जिस प्रकार नूह़ एवं उनके बाद के नबियों पर भेजी थी।”

﴿مَّا كَانَ مُحَمَّدٌ أَبَآ أَحَدٖ مِّن رِّجَالِكُمۡ وَلَٰكِن رَّسُولَ ٱللَّهِ وَخَاتَمَ ٱلنَّبِيِّ‍ۧنَۗ[71]

“मुह़म्मद तुम्हारे पुरुषों में से किसी के पिता नहीं हैं, बल्कि अल्लाह के रसूल तथा समस्त नबियों में अन्तिम हैं।”

और हमारा ईमान है कि उनमें सबसे अफ़ज़ल (सर्वश्रेष्ठ) मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हैं, फिर इब्राहीम अलैहिस्सलाम हैं, फिर मूसा अलैहिस्सलाम, फिर नूह़ अलैहिस्सलाम एवं ईसा बिन मर्यम अलैहिस्सलाम हैं। इन्हीं पाँच रसूलों का विशेष रूप से इस आयत में वर्णन हैः

﴿وَإِذۡ أَخَذۡنَا مِنَ ٱلنَّبِيِّ‍ۧنَ مِيثَٰقَهُمۡ وَمِنكَ وَمِن نُّوحٖ وَإِبۡرَٰهِيمَ وَمُوسَىٰ وَعِيسَى ٱبۡنِ مَرۡيَمَۖ وَأَخَذۡنَا مِنۡهُم مِّيثَٰقًا غَلِيظٗا ٧[72]

“और जब हमने समस्त नबियों से वचन लिया तथा आपसे तथा नूह़ से तथा इब्राहीम से तथा मूसा से तथा मर्यम के पुत्र ईसा से, और हमने उनसे पक्का वचन लिया।”

और हमारा अक़ीदा है कि मर्यादा के साथ विशेषित, उल्लिखित रसूलों की शरीअतों के सारे फ़ज़ायल मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की शरीअत में मौजूद हैं। अल्लाह तआला ने फरमायाः

﴿شَرَعَ لَكُم مِّنَ ٱلدِّينِ مَا وَصَّىٰ بِهِۦ نُوحٗا وَٱلَّذِيٓ أَوۡحَيۡنَآ إِلَيۡكَ وَمَا وَصَّيۡنَا بِهِۦٓ إِبۡرَٰهِيمَ وَمُوسَىٰ وَعِيسَىٰٓۖ أَنۡ أَقِيمُواْ ٱلدِّينَ وَلَا تَتَفَرَّقُواْ فِيهِۚ[73]

“अल्लाह तआला ने तुम्हारे लिए वही धर्म निर्धारित कर दिया है, जिसको स्थापित करने का उसने नूह़ अलैहिस्सलाम को आदेश दिया था, और जो (प्रकाशना के द्वारा) हमने तेरी ओर भेज दिया है तथा जिसका विशेष आदेश हमने इब्राहीम तथा मूसा एवं ईसा (अलैहिमुस्सलाम) को दिया था कि धर्म को स्थापित रखना तथा इसमें फूट न डालना।”

और हमारा ईमान है कि सभी रसूल मनुष्य तथा सृष्टि थे। उनके अन्दर रुबूबियत (ईश्वरियता) की विशेषताओं में से कोई भी विशेषता नहीं पाई जाती थी। अल्लाह तआला ने प्रथम रसूल नूह़ अलैहिस्सलाम की ओर से सम्बोधन कियाः

﴿وَلَآ أَقُولُ لَكُمۡ عِندِي خَزَآئِنُ ٱللَّهِ وَلَآ أَعۡلَمُ ٱلۡغَيۡبَ وَلَآ أَقُولُ إِنِّي مَلَكٞ[74]

“न तो मैं तुमसे यह कहता हूँ कि मेरे पास अल्लाह के ख़ज़ाने हैं, न यह कि मैं परोक्ष जानता हूँ और न यह कहता हूँ कि मैं फ़रिश्ता हूँ।”

तथा अल्लाह तआला ने अन्तिम रसूल मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को आदेश दिया कि वह लोगों से कह दें:

﴿قُل لَّآ أَقُولُ لَكُمۡ عِندِي خَزَآئِنُ ٱللَّهِ وَلَآ أَعۡلَمُ ٱلۡغَيۡبَ وَلَآ أَقُولُ لَكُمۡ إِنِّي مَلَكٌۖ[75]

“न मैं तुमसे यह कहता हूँ कि मेरे पास अल्लाह के ख़ज़ाने हैं, न यह कि मैं परोक्ष जानता हूँ और न ही यह कहता हूँ कि मैं फ़रिश्ता हूँ।”

और यह भी कह दें:

﴿قُل لَّآ أَمۡلِكُ لِنَفۡسِي نَفۡعٗا وَلَا ضَرًّا إِلَّا مَا شَآءَ ٱللَّهُۚ[76]

“मैं स्वयं अपने नफ़्स के लिए किसी लाभ का अधिकार नहीं रखता और न किसी हानि का, किन्तु उतना ही, जितना कि अल्लाह तआला ने चाहा हो।”

और यह भी कह दें:

﴿قُلۡ إِنِّي لَآ أَمۡلِكُ لَكُمۡ ضَرّٗا وَلَا رَشَدٗا ٢١ قُلۡ إِنِّي لَن يُجِيرَنِي مِنَ ٱللَّهِ أَحَدٞ وَلَنۡ أَجِدَ مِن دُونِهِۦ مُلۡتَحَدًا ٢٢[77]

निःसंदेह मैं तुम्हारे लिए किसी लाभ-हानि का अधिकार नहीं रखता, यह भी कह दीजिए कि मुझे कदापि कोई अल्लाह से नहीं बचा सकता तथा मैं कदापि उसके अतिरिक्त किसी और से शरण का स्थान नहीं पा सकता।”

और हमारा ईमान है कि रसूल अल्लाह के बन्दे थे। अल्लाह ने उन्हें रिसालत (दूतत्व) से सम्मानित किया। अल्लाह तआला ने उन्हें गौरव और प्रतिष्ठा के स्थानों तथा प्रशंसा के प्रसंग (सियाक़) में दासत्व के विशेषण से विशेषित किया है। चुनांचे प्रथम दूत नूह़ अलैहिस्सलाम के सम्बंध में फ़रमायाः

﴿ذُرِّيَّةَ مَنۡ حَمَلۡنَا مَعَ نُوحٍۚ إِنَّهُۥ كَانَ عَبۡدٗا شَكُورٗا ٣[78]

ऐ उन लोगों की संतान, जिनको हमने नूह़ अलैहिस्सलाम के साथ (नाव में) सवार किया था! निःसंदेह वह अत्यधिक कृतज्ञ भक्त था।”

और सबसे अन्तिम रसूल मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के बारे में फरमायाः

﴿تَبَارَكَ ٱلَّذِي نَزَّلَ ٱلۡفُرۡقَانَ عَلَىٰ عَبۡدِهِۦ لِيَكُونَ لِلۡعَٰلَمِينَ نَذِيرًا١[79]

“अत्यंत शुभ है वह (अल्लाह तआला) जिसने अपने भक्त पर फ़ुर्क़ान (क़ुर्आन) अवतरित किया, ताकि वह जगत के लिए सतर्क करने वाला बन जाए।”

तथा अन्य रसूलों के सम्बंध में फ़रमायाः

﴿وَٱذۡكُرۡ عِبَٰدَنَآ إِبۡرَٰهِيمَ وَإِسۡحَٰقَ وَيَعۡقُوبَ أُوْلِي ٱلۡأَيۡدِي وَٱلۡأَبۡصَٰرِ[80]

“तथा हमारे भक्तों इब्राहीम, इस्ह़ाक़ एवं याक़ूब को भी याद करो, जो हाथों एवं आँखों वाले थे।”

﴿وَٱذۡكُرۡ عَبۡدَنَا دَاوُۥدَ ذَا ٱلۡأَيۡدِۖ إِنَّهُۥٓ أَوَّابٌ ١٧[81]

तथा हमारे भक्त दाऊद को याद करें, जो अत्यंत शक्तिशाली थे। निःसंदेह वह बहुत ध्यानमग्न थे।”

﴿وَوَهَبۡنَا لِدَاوُۥدَ سُلَيۡمَٰنَۚ نِعۡمَ ٱلۡعَبۡدُ إِنَّهُۥٓ أَوَّابٌ ٣٠[82]

तथा हमने दाऊद को सुलैमान नामी पुत्र प्रदान किया, जो अति उत्तम भक्त था तथा अत्यधिक ध्यान लगाने वाला था।”

और मर्यम के पुत्र ईसा के सम्बंध में फरमायाः

﴿إِنۡ هُوَ إِلَّا عَبۡدٌ أَنۡعَمۡنَا عَلَيۡهِ وَجَعَلۡنَٰهُ مَثَلٗا لِّبَنِيٓ إِسۡرَٰٓءِيلَ ٥٩[83]

“वह तो हमारे ऐसे भक्त थे, जिनपर हमने उपकार किया तथा उसे बनी इस्राईल के लिए निशानी बनाया।”

और हमारा ईमान है कि अल्लाह तआला ने मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दूतत्व का सिलसिला समाप्त कर दिया तथा आपको सम्पूर्ण मानवता के लिए रसूल बनाकर भेजा। अल्लाह तआला ने फ़रमायाः

﴿قُلۡ يَٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ إِنِّي رَسُولُ ٱللَّهِ إِلَيۡكُمۡ جَمِيعًا ٱلَّذِي لَهُۥ مُلۡكُ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِۖ لَآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ يُحۡيِۦ وَيُمِيتُۖ فَ‍َٔامِنُواْ بِٱللَّهِ وَرَسُولِهِ ٱلنَّبِيِّ ٱلۡأُمِّيِّ ٱلَّذِي يُؤۡمِنُ بِٱللَّهِ وَكَلِمَٰتِهِۦ وَٱتَّبِعُوهُ لَعَلَّكُمۡ تَهۡتَدُونَ ١٥٨[84]

“आप कह दीजिए कि ऐ लोगो! मैं तुम सब की ओर अल्लाह का भेजा हुआ हूँ (अर्थात उसका रसूल हूँ), जिसके लिए आकाशों एवं धरती का राजत्व है, उसके अतिरिक्त कोई भी उपासना के योग्य नहीं, वही जीवन प्रदान करता है तथा वही मृत्यु देता है, इसलिए अल्लाह पर तथा उसके उम्मी (निरक्षर, अनपढ़) दूत पर, जो अल्लाह और उसके सभी कलाम पर ईमान रखते हैं, उनका अनुसरण करो, ताकि तुम सत्य मार्ग पा जाओ।”

और हमारा ईमान है कि मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की शरीअत ही दीने इस्लाम (इस्लाम धर्म) है, जिसे अल्लाह तआला ने अपने बन्दों के लिए पसंद किया है। अतः किसी से इस दीन के अतिरिक्त कोई दीन क़बूल नहीं करेगा। अल्लाह तआला ने फ़रमायाः

﴿إِنَّ ٱلدِّينَ عِندَ ٱللَّهِ ٱلۡإِسۡلَٰمُۗ[85]

“निःसंदेह, अल्लाह के पास इस्लाम ही धर्म है।”

﴿ٱلۡيَوۡمَ يَئِسَ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ مِن دِينِكُمۡ فَلَا تَخۡشَوۡهُمۡ وَٱخۡشَوۡنِۚ ٱلۡيَوۡمَ أَكۡمَلۡتُ لَكُمۡ دِينَكُمۡ وَأَتۡمَمۡتُ عَلَيۡكُمۡ نِعۡمَتِي وَرَضِيتُ لَكُمُ ٱلۡإِسۡلَٰمَ دِينٗاۚ[86]

“आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारे धर्म को पूरा कर दिया तथा तुमपर अपनी अनुकम्पा पूरी कर दी एवं तुम्हारे लिए इस्लाम धर्म को पसंद कर लिया।”

﴿وَمَن يَبۡتَغِ غَيۡرَ ٱلۡإِسۡلَٰمِ دِينٗا فَلَن يُقۡبَلَ مِنۡهُ وَهُوَ فِي ٱلۡأٓخِرَةِ مِنَ ٱلۡخَٰسِرِينَ ٨٥[87]

“तथा जो व्यक्ति इस्लाम के अतिरिक्त किसी अन्य धर्म की खोज करे, उसका धर्म कदापि मान्य नहीं होगा तथा वह परलोक में क्षतिग्रस्तों में होगा।”

हमारा अक़ीदा है कि जो इस्लाम धर्म के अतिरिक्त किसी अन्य धर्म जैसे यहूदियत अथवा नसरानियत आदि को स्वीकार योग्य समझे, वह काफ़िर है। उसे तौबा करने के लिए कहा जायेगा। यदि वह तौबा कर ले, तो ठीक है, नहीं तो धर्मत्यागी होने के कारण क़त्ल किया जाएगा। क्योंकि वह क़ुर्आन को झुठलाने वाला है।

हमारा यह भी अक़ीदा है कि जिस व्यक्ति ने मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की रिसालत या आपके सम्पूर्ण मानवता की ओर दूत बनकर आने का इन्कार किया, उसने सभी रसूलों के साथ कुफ़्र किया, यहाँ तक कि उस रसूल का भी, जिसके अनुकरण तथा जिसपर ईमान का उसे दावा है। क्योंकि अल्लाह तआला ने फ़रमायाः

﴿كَذَّبَتۡ قَوۡمُ نُوحٍ ٱلۡمُرۡسَلِينَ ١٠٥[88]

“नूह़ (अलैहिस्सलाम) की क़ौम ने रसूलों को झुठलाया।”

इस पवित्र आयत ने उन्हें सारे रसूलों को झुठलाने वाला ठहराया, ह़ालाँकि नूह़ अलैहिस्सलाम से पूर्व कोई रसूल नहीं गुज़रा। अल्लाह तआला ने दूसरी जगह फ़रमायाः

﴿إِنَّ ٱلَّذِينَ يَكۡفُرُونَ بِٱللَّهِ وَرُسُلِهِۦ وَيُرِيدُونَ أَن يُفَرِّقُواْ بَيۡنَ ٱللَّهِ وَرُسُلِهِۦ وَيَقُولُونَ نُؤۡمِنُ بِبَعۡضٖ وَنَكۡفُرُ بِبَعۡضٖ وَيُرِيدُونَ أَن يَتَّخِذُواْ بَيۡنَ ذَٰلِكَ سَبِيلًا ١٥٠ أُوْلَٰٓئِكَ هُمُ ٱلۡكَٰفِرُونَ حَقّٗاۚ وَأَعۡتَدۡنَا لِلۡكَٰفِرِينَ عَذَابٗا مُّهِينٗا ١٥١[89]

“जो लोग अल्लाह तआला तथा उसके रसूलों के प्रति अविश्वास रखते हैं और चाहते हैं कि अल्लाह तथा उसके रसूलों के मध्य अलगाव करें और कहते हैं कि हम कुछ को मानते हैं और कुछ को नहीं मानते एवं इसके बीच रास्ता बनाना चाहते हैं, विश्वास करो कि यह सभी लोग अस्ली काफ़िर हैं। और काफ़िरों के लिए हमने अत्यधिक कठोर यातनायें तैयार कर रखी हैं।”

और हम ईमान रखतें हैं कि मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के बाद कोई नबी नहीं। अतः आपके बाद जिस किसी ने नबूअत का दावा किया या नबूअत के दावेदार की पुष्टि की, वह काफ़िर है। क्योंकि वह अल्लाह तआला और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को एवं मुसलमानों के इजमा (एकमत) को झुठलाने वाला है।

और हम ईमान रखते हैं कि आपके कुछ सत्य मार्ग पर चलने वाले ख़लीफ़े (ख़ुलफ़ाये राशेदीन) हैं। उन्होंने उम्मत को आपके बाद ज्ञान, दअवत तथा शासन-प्रशासन के मामले में प्रतिनिधित्व प्रदान की। और हम इस पर भी ईमान रखते हैं कि ख़ुलफ़ा में सबसे अफ़्ज़ल और ख़िलाफ़त के सबसे ह़क़दार अबू बक्र रज़ियल्लाहु अन्हु हैं, फिर उमर बिन ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु, फिर उस्मान बिन अफ़्फ़ान रज़ियल्लाहु अन्हु, फिर अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु।

मर्यादा में जिस तरह उनकी तर्तीब रही, उसी क्रमानुसार वह ख़िलाफ़त के अधिकारी भी हुए। अल्लाह तआला का कोई काम ह़िक्मत से ख़ाली नहीं होता। इसलिए उसकी शान से यह बात बहुत परे है कि वह ख़ैरुल क़ुरून (सबसे उत्तम ज़माना) में किसी उत्तम तथा ख़िलाफ़त के अधिक अधिकार रखने वाले व्यक्ति की उपस्थिति में किसी अन्य व्यक्ति को मुसलमानों पर आच्छादित करता।

और हमारा ईमान है कि उपरोक्त ख़ुलफ़ा में मफ़्ज़ूल (अपेक्षाकृत मर्यादा में कम) ख़लीफ़ा में ऐसी विशिष्टता पाई जा सकती है, जिसमें वह अपने से अफ़्ज़ल से श्रेष्ठ हो, लेकिन इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि वह अपने से अफ़्ज़ल ख़लीफ़ा से हर विषय में प्रधानता रखते हैं, क्योंकि प्रधानता के कारण अनेक तथा विभिन्न प्रकार के होते हैं।

और हमारा ईमान है कि यह उम्मत अन्य उम्मतों से उत्तम है तथा अल्लाह के यहाँ इसकी इज़्ज़त एवं प्रतिष्ठा अधिक है।

अल्लाह तआला ने फ़रमायाः

﴿كُنتُمۡ خَيۡرَ أُمَّةٍ أُخۡرِجَتۡ لِلنَّاسِ تَأۡمُرُونَ بِٱلۡمَعۡرُوفِ وَتَنۡهَوۡنَ عَنِ ٱلۡمُنكَرِ وَتُؤۡمِنُونَ بِٱللَّهِۗ[90]

“तुम सर्वश्रेष्ठ उम्मत हो, जो लोगों के लिए पैदा की गयी है कि तुम सत्कर्मों का आदेश देते हो और कुकर्मों से रोकते हो और अल्लाह तआला पर ईमान रखते हो।”

और हम ईमान रखते हैं कि उम्मत में सबसे उत्तम सह़ाबा किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम थे, फिर ताबेईन और फिर तबा-ताबेईन रह़ेमहुमुल्लाह।

और हमारा ईमान है कि इस उम्मत में से एक जमाअत विजयी बनकर सदैव सत्य पर क़ाय रहेगी। उनका विरोध करने वाला या उन्हें रुस्वा करने वाला कोई व्यक्ति उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा, यहाँ तक कि अल्लाह का हुक्म आ जाय।

सह़ाबा किराम रजियल्लाहु अन्हुम के बीच जो मतभेद हुए, उनके सम्बन्ध में हमारा विश्वास यह है कि वह इजतिहादी मतभेद थे। अतः उनमें से जो सही दिशा को पहुँच पाये, उनके लिए दोहरा अज्र है और जो सही दिशा को नहीं पहुँच पाये, उनके लिए एक अज्र है तथा उनकी भूल क्षमायोग्य है।

हमें इस पर भी विश्वास है कि उनकी अप्रिय बातों की आलोचना करने से पूर्णतः बचना अनिवार्य है। केवल उनकी उत्तम बातों की प्रशंसा करनी चाहिए जिसके वह ह़क़दार हैं। तथा उनमें से हरेक के सम्बन्ध में हमें अपने दिलों को वैर एवं कपट से पवित्र रखना चाहिए, क्योंकि उनकी शान में अल्लाह तआला का कथन हैः

﴿لَا يَسۡتَوِي مِنكُم مَّنۡ أَنفَقَ مِن قَبۡلِ ٱلۡفَتۡحِ وَقَٰتَلَۚ أُوْلَٰٓئِكَ أَعۡظَمُ دَرَجَةٗ مِّنَ ٱلَّذِينَ أَنفَقُواْ مِنۢ بَعۡدُ وَقَٰتَلُواْۚ وَكُلّٗا وَعَدَ ٱللَّهُ ٱلۡحُسۡنَىٰۚ[91]

“तुममें से जिन लोगों ने विजय से पूर्व अल्लाह के मार्ग में खर्च किया तथा धर्मयुध्द किया, वह (दूसरों के) समतुल्य नहीं, अपितु उनसे अत्यंत उच्च पद के हैं, जिन्होंने विजय के पश्चात दान किया तथा धर्मयुध्द किया। हाँ, भलाई का वचन तो अल्लाह तआला का उनसब से है।”

तथा हमारे सम्बन्ध में अल्लाह तआला का कथन हैः

﴿وَٱلَّذِينَ جَآءُو مِنۢ بَعۡدِهِمۡ يَقُولُونَ رَبَّنَا ٱغۡفِرۡ لَنَا وَلِإِخۡوَٰنِنَا ٱلَّذِينَ سَبَقُونَا بِٱلۡإِيمَٰنِ وَلَا تَجۡعَلۡ فِي قُلُوبِنَا غِلّٗا لِّلَّذِينَ ءَامَنُواْ رَبَّنَآ إِنَّكَ رَءُوفٞ رَّحِيمٌ ١٠[92]

“तथा (उनके लिए) जो उनके पश्चात आयें, जो कहेंगे कि हे हमारे प्रभु! हमें क्षमा कर दे तथा हमारे उन भाईयों को भी, जो हमसे पूर्व ईमान ला चुके हैं तथा ईमान वालों के बारे में हमारे हृदय में कपट (एवं शत्रुता) न डाल। हे हमारे प्रभु! निःसंदेह तू प्रेम एवं दया करने वाला है।”

 अध्यायः 6

 क़यामत (महाप्रलय) पर ईमान

हमारा ईमान आख़िरत के दिन पर है। वह क़यामत का दिन है। उसके पश्चात कोई दिन नहीं। उस दिन अल्लाह तआला लोगों को दोबारा जीवित करके उठायेगा। फिर या तो वे सदैव के लिए स्वर्ग में रहेंगे, जहाँ अच्छी-अच्छी चीज़ें होंगी या नरक में, जहाँ कठोर यातनायें होंगी।

हमारा ईमान मृत्यु के पश्चात मुर्दों को जीवित किये जाने पर है। अर्थात इस्राफ़ील अलैहिस्सलाम जब दोबारा सूर फूकेंगे, तो अल्लाह तआला तमाम मुर्दों को जीवित कर देगा।

﴿وَنُفِخَ فِي ٱلصُّورِ فَصَعِقَ مَن فِي ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَمَن فِي ٱلۡأَرۡضِ إِلَّا مَن شَآءَ ٱللَّهُۖ ثُمَّ نُفِخَ فِيهِ أُخۡرَىٰ فَإِذَا هُمۡ قِيَامٞ يَنظُرُونَ٦٨[93]

“तथा जब नरसिंघा में फूँक मारी जायेगी, तो जो लोग आकाशों एवं धरती में हैं, सब बेहोश होकर गिर पड़ेंगे, परन्तु वह जिसे अल्लाह चाहे, फिर पुनः नरसिंघा में फूँक मारी जायेगी, तो सब तुरन्त खड़े होकर देखने लग जायेंगे।”

अब लोग अपनी-अपनी क़ब्रों से उठकर संसार के प्रभु की ओर जायेंगे। उस समय वह नंगे पाँव बिना जूतों के, नंगे बदन बिना कपड़ों के एवं बिना ख़तनों के होंगे।

﴿كَمَا بَدَأۡنَآ أَوَّلَ خَلۡقٖ نُّعِيدُهُۥۚ وَعۡدًا عَلَيۡنَآۚ إِنَّا كُنَّا فَٰعِلِينَ ١٠٤[94]

“जिस प्रकार हमने (संसार को) पहले पैदा किया था, उसी प्रकार दोबारा पैदा कर देंगे। यह हमारा वादा है, हम ऐसा अवश्य करने वाले हैं।”

और हमारा ईमान नामए-आमाल (कर्मपत्र) पर भी है कि वह दायें हाथ में दिया जायेगा या पीछे की ओर से बायें हाथ में।

﴿فَأَمَّا مَنۡ أُوتِيَ كِتَٰبَهُۥ بِيَمِينِهِۦ ٧ فَسَوۡفَ يُحَاسَبُ حِسَابٗا يَسِيرٗا ٨ وَيَنقَلِبُ إِلَىٰٓ أَهۡلِهِۦ مَسۡرُورٗا٩ وَأَمَّا مَنۡ أُوتِيَ كِتَٰبَهُۥ وَرَآءَ ظَهۡرِهِۦ ١٠ فَسَوۡفَ يَدۡعُواْ ثُبُورٗا ١١ وَيَصۡلَىٰ سَعِيرًا ١٢[95]

“तो जिसका कर्मपत्र उसके दायें हाथ में दिया जायेगा, उससे सरल ह़िसाब लिया जायेगा तथा वह अपने घर वालों में प्रसन्न होकर लौटेगा। तथा जिसका कर्मपत्र पीठ के पीछे से दिया जायेगा, वह मृत्यु को पुकारेगा तथा भड़कती हुई आग में डाल दिया जायेगा।”

﴿وَكُلَّ إِنسَٰنٍ أَلۡزَمۡنَٰهُ طَٰٓئِرَهُۥ فِي عُنُقِهِۦۖ وَنُخۡرِجُ لَهُۥ يَوۡمَ ٱلۡقِيَٰمَةِ كِتَٰبٗا يَلۡقَىٰهُ مَنشُورًا ١٣ ٱقۡرَأۡ كِتَٰبَكَ كَفَىٰ بِنَفۡسِكَ ٱلۡيَوۡمَ عَلَيۡكَ حَسِيبٗا١٤[96]

“तथा हमने हरेक मनुष्य के भाग्य को उसके गले में डाल दिया है तथा महाप्रलय के दिन हम उसके कर्मपत्र को निकालेंगे, जिसे वह अपने ऊपर खुला हुआ देखेगा। लो, स्वयं ही अपना कर्मपत्र पढ़ लो। आज तो तूम स्वयं ही अपना निर्णय करने को काफ़ी हो।”

तथा हम तुले (मवाज़ीन) पर भी ईमान रखते हैं, जो क़यामत के दिन स्थापित किये जायेंगे। फिर किसी पर कोई अत्याचार नहीं होगा।”

﴿فَمَن يَعۡمَلۡ مِثۡقَالَ ذَرَّةٍ خَيۡرٗا يَرَهُۥ ٧ وَمَن يَعۡمَلۡ مِثۡقَالَ ذَرَّةٖ شَرّٗا يَرَهُۥ ٨[97]

“तो जिसने कण भर भी नेकी की होगी, वह उसको देख लेगा तथा जिसने कण भर भी बुराई की होगी, वह उसे देख लेगा।”

﴿فَمَن ثَقُلَتۡ مَوَٰزِينُهُۥ فَأُوْلَٰٓئِكَ هُمُ ٱلۡمُفۡلِحُونَ ١٠٢ وَمَنۡ خَفَّتۡ مَوَٰزِينُهُۥ فَأُوْلَٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ خَسِرُوٓاْ أَنفُسَهُمۡ فِي جَهَنَّمَ خَٰلِدُونَ ١٠٣ تَلۡفَحُ وُجُوهَهُمُ ٱلنَّارُ وَهُمۡ فِيهَا كَٰلِحُونَ ١٠٤[98]

“जिनके तराज़ू का पलड़ा भारी हो गया, वे तो नजात पाने वाले हो गये। तथा जिनके तराज़ू का पल्ड़ा हल्का रह गया, ये हैं वे, जिन्होंने अपनी हानि स्वयं कर ली, जो सदैव के लिए नरक में चले गये। उनके मुखों को आग झुलसाती रहेगी। वे वहाँ कुरूप बने हुए होंगे।”

﴿مَن جَآءَ بِٱلۡحَسَنَةِ فَلَهُۥ عَشۡرُ أَمۡثَالِهَاۖ وَمَن جَآءَ بِٱلسَّيِّئَةِ فَلَا يُجۡزَىٰٓ إِلَّا مِثۡلَهَا وَهُمۡ لَا يُظۡلَمُونَ ١٦٠[99]

“जो व्यक्ति पुण्य का कार्य करेगा, उसे उसके दस गुना मिलेंगे। तथा जो कुकर्म करेगा, उसे उसके समान दण्ड मिलेगा, तथा उन लोगों पर अत्यताचार न होगा।”

हम सुमहान अभिस्ताव (शफ़ाअते उज़्मा) पर ईमान रखते हैं, जो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के लिए ख़ास है। जब लोग असहनीय दुःख एवं कष्ट में ग्रस्त होंगे, तो पहले आदम अलैहिस्सलाम के पास, फिर नूह़ अलैहिस्सलाम के पास, फिर इब्राहीम अलैहिस्सलाम के पास, फिर मूसा अलैहिस्सलाम के पास, फिर ईसा अलैहिस्सलाम के पास और अन्त में मूह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास जायेंगे, तो आप अल्लाह की आज्ञा से उसके समक्ष सिफ़ारिश करेंगे, ताकि वह अपने बन्दों के दरमियान फ़ैस्ला कर दे।

और हमारा ईमान है कि मोमिन अपने गुनाहों के कारण नरक में प्रवेश कर जायेंगे, तो वहाँ से उन्हें निकालने के लिए भी अभिस्ताव होगा तथा उसका सम्मान नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और आपके अतिरिक्त अन्यों (जैसे अम्बिया, ईमान वालों एवं फ़रिश्तों) को भी प्राप्त होगा।

और हमारा ईमान है कि अल्लाह तआला मोमिनों में से कुछ लोगों को बिना अभिस्ताव के केवल अपनी दया एवं अनुकम्पा के आधार पर नरक से निकालेगा।

हम प्यारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के ह़ौज़ पर भी ईमान रखते हैं। उसका पानी दूध से बढ़कर सफ़ेद, शहद से ज़्यादा मीठा तथा कस्तूरी से बढ़कर सुगन्धित होगा। उसकी लम्बाई एवं चौड़ाई एक मास की यात्रा के समान होगी। तथा उसके आबख़ोरे (पानी पीने के प्याले) सुन्दरता एवं अधिकता में आसमान के तारों की तरह होंगे। आपके ईमान वाले उम्मती वहाँ से पानी पियेंगे। जिसने वहाँ से एक बार पी लिया, उसे कभी प्यास नहीं लगेगी।

हमारा ईमान है कि नरक पर पुलसिरात की स्थापना होगी। लोग अपने कर्मों के अनुसार उस पर से गुज़रेंगे। पहली श्रेणी के लोग बिजली की तरह गुज़र जायेंगे, फिर क्रमानुसार कुछ हवा की सी तेज़ी से, कुछ पक्षियों की तरह तथा कुछ तेज़ दौड़ने वाले पुरुषों की तरह गुज़रेंगे। और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पुलसिरात पर खड़े होकर दुआ माँग रहे होंगेः ऐ अल्लाह! इन्हें सुरक्षित रख! इन्हें सुरक्षित रख! यहाँ तक कि जब लोगों के कर्म विवश हो जायेंगे, तो वह पेट के बल रेंगते हुए गुज़रेंगे। और पुलसिरात की दोनों ओर कुंडियाँ लटकी होंगी, जिनके सम्बन्ध में आदेश होगा, उन्हें पकड़ लेंगी। कुछ लोग उनकी ख़राशों से ज़ख़्मी होकर मुक्ति पा जायेंगे तथा कुछ लोग जहन्नम में गिर पड़ेंगे।

किताब तथा सुन्नत में उस दिन की जो सूचनाएं एवं कष्टदायक यातनायें उल्लिखित हैं, उन सब पर हमारा ईमान है। अल्लाह तआला अनमें हमारी सहायता करे!

हमारा ईमान है कि नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जन्नतियों के स्वर्ग में प्रवेश के लिए अभिस्ताव करेंगे, जो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ ख़ास होगा।

जन्नत एवं जहन्नम (स्वर्ग-नरक) पर भी हमारा ईमान है। जन्नत नेमतों का वह घर है, जिसे अल्लाह तआला ने परहेज़गार मोमिनों के लिए तैयार किया है, उसमें ऐसी-ऐसी नेमतें हैं, जो न किसी आँख ने देखी है, न किसी कान ने सुनी है और न किसी मनुष्य के दिल में उनका ख़्याल ही आया है।

﴿فَلَا تَعۡلَمُ نَفۡسٞ مَّآ أُخۡفِيَ لَهُم مِّن قُرَّةِ أَعۡيُنٖ جَزَآءَۢ بِمَا كَانُواْ يَعۡمَلُونَ[100]

“कोई नफ़्स नहीं जानता, जो कुछ हमने उनकी आँखों की ठंडक उनके लिए छुपा रखी है। वह जो कुछ करते थे यह उसका बदला है।”

तथा जहन्नम कठिन यातना का वह घर है, जिसे अल्लाह तआला ने काफ़िरों तथा अत्याचारियों के लिए तैयार कर रखा है। वहाँ ऐसी भयानक यातना है, जिसका कभी दिल में खटका भी नहीं हुआ।

﴿إِنَّآ أَعۡتَدۡنَا لِلظَّٰلِمِينَ نَارًا أَحَاطَ بِهِمۡ سُرَادِقُهَاۚ وَإِن يَسۡتَغِيثُواْ يُغَاثُواْ بِمَآءٖ كَٱلۡمُهۡلِ يَشۡوِي ٱلۡوُجُوهَۚ بِئۡسَ ٱلشَّرَابُ وَسَآءَتۡ مُرۡتَفَقًا ٢٩[101]

“अत्याचारियों के लिए हमने वह आग तैयार कर रखी है, जिसकी परिधि उन्हें घेर लेगी। यदि वे आर्तनाद करेंगे, तो उनकी सहायता उस पानी से की जायेगी, जो तलछट जैसा होगा, जो चेहरे भून देगा, बड़ा ही बुरा पानी है तथा बड़ा बुरा विश्राम स्थल (नरक) है।”

तथा स्वर्ग और नरक इस समय भी मौजूद हैं एवं वे सदैव रहेंगे। कभी नाश नहीं होंगे।

﴿وَمَن يُؤۡمِنۢ بِٱللَّهِ وَيَعۡمَلۡ صَٰلِحٗا يُدۡخِلۡهُ جَنَّٰتٖ تَجۡرِي مِن تَحۡتِهَا ٱلۡأَنۡهَٰرُ خَٰلِدِينَ فِيهَآ أَبَدٗاۖ قَدۡ أَحۡسَنَ ٱللَّهُ لَهُۥ رِزۡقًا ١١[102]

“तथा जो व्यक्ति अल्लाह पर ईमान लाये तथा सत्कर्म करे, अल्लाह उसे ऐसे स्वर्ग में प्रवेश कर देगा, जिसके नीचे नहरें प्रवाहित हैं, जिसमें वे सदैव-सदैव रहेंगे। निःसंदेह अल्लाह ने उसे सर्वोत्तम जीविका प्रदान कर रखी है।”

﴿إِنَّ ٱللَّهَ لَعَنَ ٱلۡكَٰفِرِينَ وَأَعَدَّ لَهُمۡ سَعِيرًا ٦٤ خَٰلِدِينَ فِيهَآ أَبَدٗاۖ لَّا يَجِدُونَ وَلِيّٗا وَلَا نَصِيرٗا ٦٥ يَوۡمَ تُقَلَّبُ وُجُوهُهُمۡ فِي ٱلنَّارِ يَقُولُونَ يَٰلَيۡتَنَآ أَطَعۡنَا ٱللَّهَ وَأَطَعۡنَا ٱلرَّسُولَا۠ ٦٦[103]

“अल्लाह ने काफ़िरों पर धिक्कार भेजी है तथा उनके लिए भड़कती हुई अग्नि तैयार कर रखी है, जिसमें वे सदैव रहेंगे, वह कोई पक्षधर एवं सहायता करने वाला न पायेंगे। उस दिन उनके मुख आग में उल्टे-पल्टे जायेंगे। (पश्चाताप तथा खेद से) कहेंगे कि काश! हम अल्लाह तथा रसूल की आज्ञा पालन करते!”

तथा हम उन लोगों के स्वर्ग में जाने की गवाही देते हैं, जिनके लिए किताब एवं सुन्नत में नाम लेकर या विशेषतायें बताकर स्वर्ग की गवाही दी गयी है।

जिनका नाम लेकर स्वर्ग की गवाही दी गई है, उनमें अबू बक्र, उमर, उस्मान एवं अली रज़ियल्लाहु अन्हुम आदि शामिल हैं, जिन्हें नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने जन्नती बताया है।

विशेषता के आधार पर स्वर्ग की गवाही देने का उदाहरण, हरेक मोमिन और मुत्तक़ी (संयमी) के लिए स्वर्ग की शुभसूचना है।

हम उनसब लोगों के नारकीय होने की गवाही देते हैं, जिनका नाम लेकर या अवगुण बयान करके किताब एवं सुन्नत ने उन्हें नारकीय घोषित किया है। जैसे अबू लहब, अम्र बिन लुह़ै अल्-ख़ुज़ाई आदि।

तथा अवगुणों के आधार पर नरक की गवाही देने का उदाहरण, हर काफ़िर, मुश्रिक अथवा मुनाफ़िक़ (द्वयवादी) के लिए नरक की गवाही देना है।

और हम क़ब्र की विपत्ति एवं परीक्षा अर्थात मैयित से उसके प्रभु, उसके दीन तथा उसके नबी के बारे में पूछे जाने वाले प्रश्नों पर भी ईमान रखते हैं।

﴿يُثَبِّتُ ٱللَّهُ ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ بِٱلۡقَوۡلِ ٱلثَّابِتِ فِي ٱلۡحَيَوٰةِ ٱلدُّنۡيَا وَفِي ٱلۡأٓخِرَةِۖ وَيُضِلُّ ٱللَّهُ ٱلظَّٰلِمِينَۚ وَيَفۡعَلُ ٱللَّهُ مَا يَشَآءُ ٢٧[104]

अल्लाह तआला ईमानदारों को पक्की बात पर दृढ़ रखता है सांसरिक जीवन में भी तथा परलोकिक जीवन में भी। तथा अल्लाह तआला अन्याय करने वालों को भटका देता है। और अल्लाह तआला जो चाहता है, करता है।”

मोमिन तो कहेगा कि मेरा प्रभु अल्लाह, मेरा दीन इस्लाम तथा मेरे नबी मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हैं। परन्तु, काफ़िर और मुनाफ़िक़ उत्तर देंगे कि मैं नहीं जानता, मैं तो लोगों को जो कुछ कहते हुए सुनता था वही, कह देता था!

हमारा ईमान है कि क़ब्र में मोमिनों को नेमतों से सम्मानित किया जायेगा।

﴿ٱلَّذِينَ تَتَوَفَّىٰهُمُ ٱلۡمَلَٰٓئِكَةُ طَيِّبِينَ يَقُولُونَ سَلَٰمٌ عَلَيۡكُمُ ٱدۡخُلُواْ ٱلۡجَنَّةَ بِمَا كُنتُمۡ تَعۡمَلُونَ ٣٢[105]

“वे जिनके प्राण फ़िरश्ते ऐसी अवस्था में निकालते हैं कि वह स्वच्छ तथ पवित्र हों, कहते हैं कि तुम्हारे लिए शान्ति ही शान्ति है, अपने उन कर्मों के बदले स्वर्ग में जाओ, जो पहले तुम कर रहे थे।”

तथा अत्याचारियों और काफ़िरों को क़ब्र में यातनायें दी जायेंगी।

﴿وَلَوۡ تَرَىٰٓ إِذِ ٱلظَّٰلِمُونَ فِي غَمَرَٰتِ ٱلۡمَوۡتِ وَٱلۡمَلَٰٓئِكَةُ بَاسِطُوٓاْ أَيۡدِيهِمۡ أَخۡرِجُوٓاْ أَنفُسَكُمُۖ ٱلۡيَوۡمَ تُجۡزَوۡنَ عَذَابَ ٱلۡهُونِ بِمَا كُنتُمۡ تَقُولُونَ عَلَى ٱللَّهِ غَيۡرَ ٱلۡحَقِّ وَكُنتُمۡ عَنۡ ءَايَٰتِهِۦ تَسۡتَكۡبِرُونَ ٩٣[106]

“यदि आप अत्याचारियों को मौत की घोर यातना में देखेंगे, जब मलकुल-मौत अपने हाथ फैलाये होते हैं (और कहते हैं) कि अपने प्राण निकालो। आज तुम्हें अल्लाह पर अनुचित आरोप लगाने तथा अभिमानपूर्वक उसकी आयतों का इन्कार करने के कारण अपमानकारी प्रतिकार दिया जायेगा।”

इस सम्बन्ध में बहुत सारी ह़दीसें भी प्रसिध्द हैं। इसलिए ईमान वालों पर अनिवार्य है कि इन परोक्ष की बातों से सम्बन्धित, जो कुछ किताब एवं सुन्नत में उल्लेख है, उस पर बिना किसी आपत्ति अभियोग के ईमान ले आयें तथा सांसारिक मामलात पर क़यास करते हुए उनका विरोध न करें। क्योंकि आख़िरत के मामलात का सांसारिक मामलात से तुलना करना उचित नहीं है। दोनों के बीच बड़ा अन्तर है।

 अध्यायः 7

 भाग्य पर ईमान

हम भाग्य पर ईमान रखते हैं। अच्छे तथा बुरे दोनों पर। दर असल भाग्य विश्व के सम्बन्ध में ज्ञान तथा हिक्मत के अनुसार अल्लाह तआला का निर्धारण है।

भाग्य की चार श्रेणियाँ हैं:

1.  इल्म (ज्ञान)

हमारा ईमान है कि अल्लाह तआला हर चीज़ के सम्बन्ध में; जो हो चुका है, जो होने वाला है और जिस प्रकार होगा, सब कुछ अपने अनादिकाल एवं सर्वकालिक ज्ञान के द्वारा जानता है। उसका ज्ञान नया नहीं है, जो अज्ञानता के बाद प्राप्त होता है और न ही वह ज्ञान के बाद विस्मरण का शिकार होता है। अर्थात न उसके ज्ञान का कोई आरम्भ है और न अन्त।

2.  लिपिबध्द करना

हमारा ईमान है कि क़ियामत तक जो कुछ होने वाला है अल्लाह तआला ने उसे लौह़े मह़्फ़ूज़ में लिपिबध्द कर रखा है।

﴿أَلَمۡ تَعۡلَمۡ أَنَّ ٱللَّهَ يَعۡلَمُ مَا فِي ٱلسَّمَآءِ وَٱلۡأَرۡضِۚ إِنَّ ذَٰلِكَ فِي كِتَٰبٍۚ إِنَّ ذَٰلِكَ عَلَى ٱللَّهِ يَسِيرٞ ٧٠[107]

“क्या आपने नहीं जाना कि आकाश तथा धरती की प्रत्येक पस्तु अल्लाह के ज्ञान में है। यह सब लिखी हुई किताब में सुरक्षित है। अल्लाह के लिए यह कार्य अत्यन्त सरल है।”

3.  मशीअत (ईश्वरेच्छा)

हमारा ईमान है कि जो कुछ आकाशों एवं धरती में है, सब अल्लाह की इच्छा से वजूद में आया है। कोई वस्तु उसकी इच्छा के बिना नहीं होती। अल्लाह तआला जो चाहता है, होता है और जो नहीं चाहता, नहीं होता।

4.  ख़ल्क़ (रचना)

हमारा ईमान है कि

﴿ٱللَّهُ خَٰلِقُ كُلِّ شَيۡءٖۖ وَهُوَ عَلَىٰ كُلِّ شَيۡءٖ وَكِيلٞ ٦٢ لَّهُۥ مَقَالِيدُ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِۗ[108]

“अल्लाह समस्त वस्तुओं का रचयिता है तथा वही प्रत्येक वस्तु का संरक्षक है। आकाशों तथा धरती की चाबियों का वही स्वामी है।”

भाग्य की इन चारों श्रेणियों में वह सब कुछ आ जाता है, जो स्वयं अल्लाह की ओर से अथवा बन्दों की ओर से होता है। अतः बन्दे जो कुछ अन्जाम देते हैं, चाहे वह कथनात्मक हो, कर्मात्मक हो या वर्जात्मक, सब अल्लाह के ज्ञान में है एवं उसके पास लिपिबध्द है। अल्लाह तआला ने उन्हें चाहा तथा उनकी रचना की।

﴿لِمَن شَآءَ مِنكُمۡ أَن يَسۡتَقِيمَ ٢٨ وَمَا تَشَآءُونَ إِلَّآ أَن يَشَآءَ ٱللَّهُ رَبُّ ٱلۡعَٰلَمِينَ ٢٩[109]

(विशेष रूप से) उसके लिए जो तुममें से सीधे मार्ग पर चलना चाहे। तथा तुम बिना समस्त जगत के प्रभु के चाहे, कुछ नहीं चाह सकते।”

﴿وَلَوۡ شَآءَ ٱللَّهُ مَا ٱقۡتَتَلُواْ وَلَٰكِنَّ ٱللَّهَ يَفۡعَلُ مَا يُرِيدُ ٢٥٣[110]

“और यदि अल्लाह तआला चाहता, तो यह लोग आपस में न लड़ते, किन्तु अल्लाह जो चाहता है, करता है।”

﴿وَلَوۡ شَآءَ ٱللَّهُ مَا فَعَلُوهُۖ فَذَرۡهُمۡ وَمَا يَفۡتَرُونَ ١٣٧[111]

“और अगर अल्लाह चाहता, तो वे ऐसा नहीं करते, इसलिए आप उनको तथा उनकी मनगढ़ंत बातों को छोड़ दीजिए।”

﴿وَٱللَّهُ خَلَقَكُمۡ وَمَا تَعۡمَلُونَ ٩٦[112]

“ह़ालाँकि तुमको और जो तुम करते हो उसको, अल्लाह ही ने पैदा किया है।”

लेकिन इसके साथ-साथ हमारा यह भी ईमान है कि अल्लाह तआला ने बन्दों को अख़्तियार तथा शक्ति दी है, जिसके आधार पर ही कर्म संघटित होते हैं:

1.  अल्लाह तआला का फ़र्मान हैः

﴿فَأۡتُواْ حَرۡثَكُمۡ أَنَّىٰ شِئۡتُمۡ[113]

“अपनी खेतियों में जिस प्रकार चाहो, जाओ।”

और उसका फ़र्मान हैः

﴿وَلَوۡ أَرَادُواْ ٱلۡخُرُوجَ لَأَعَدُّواْ لَهُۥ عُدَّةٗ[114]

“अगर वह निकलना चाहते, तो उसके लिए संसाधन तैयार करते।”

अल्लाह तआला ने (पहली आयत में) ʻआनेʼ को (और दूसरी आयत में) ʻतैयारीʼ को बन्दे के इच्छाधीन साबित किया है।

2.  बन्दे को आदेश-निषेध का निर्देश। अगर बन्दे को अख़्तियार तथा शक्ति न होती, तो आदेश-निषेध का निर्देश उन भारों में से शुमार किया जाता, जो ताक़त से बाहर हैं। जबकि अल्लाह तआला की ह़िक्मत, रह़मत तथा उसकी सत्य वाणी इसका खण्डन करती है। अल्लाह तआला ने फ़रमायाः

﴿لَا يُكَلِّفُ ٱللَّهُ نَفۡسًا إِلَّا وُسۡعَهَاۚ[115]

“अल्लाह किसी व्यक्ति को उसकी शक्ति से अधिक भार नहीं देता।”

3.  सदाचार करने वाले की, उसके सदाचार पर प्रशंसा एवं दुराचार करने वाले की, उसके दुराचार पर निंदा तथा उन दोनों में से प्रत्येक को उनके कर्मानुसार बदला देना। यदि बन्दे का कर्म उसके अख़्तियार तथा इच्छा से न होता, तो सदाचारी की प्रशंसा करना निरर्थ होता एवं दुराचारी को सज़ा देना अत्याचार होता। जबकि अल्लाह तआला निरर्थ कामों एवं अत्याचार से पवित्र है।

4.  अल्लाह तआला का रसूलों को भेजना।

﴿رُّسُلٗا مُّبَشِّرِينَ وَمُنذِرِينَ لِئَلَّا يَكُونَ لِلنَّاسِ عَلَى ٱللَّهِ حُجَّةُۢ بَعۡدَ ٱلرُّسُلِۚ[116]

(हमने इन्हें) शुभसूचक एवं सचेतकर्ता रसूल बनाया, ताकि लोगों को कोई बहाना तथा अभियोग रसूलों को भेजने के पश्चात अल्लाह पर न रह जाये।”

अगर बन्दे का कर्म उसके अख़्तियार एवं इच्छा से न होता, तो रसूल को भेजने से उसका बहाना तथा अभियोग बातिल न होता।

5.  हर काम करने वाला व्यक्ति, काम करते या छोड़ते समय अपने आपको हर प्रकार की कठिनाइयों से मुक्त पाता है। वह केवल अपने इरादे से उठता-बैठता, आता-जाता तथा यात्रा एवं निवास करता है। उसे यह अनुभव नहीं होता कि कोई उसे इसपर विवश कर रहा है। बल्कि वह उन कामों में, जो अपने अख़्तियार से करता है और उन कामों में, जो किसी के विवश करने से करता है, वास्तविक अन्तर कर लेता है। इसी तरह शरीअत ने भी इन दोनों अवस्थाओं के दरमियान हिक्मत से भरा हुआ अन्तर किया है। अतः मनुष्य यदि अल्लाह के अधिकार सम्बन्धी कार्यों को विवश होकर कर जाये, तो उसकी कोई पकड़ नहीं होगी।

हमारा अक़ीदा है कि पापी को अपने पाप को सही ठहराने के लिए, भाग्य को ह़ुज्जत बनाने का कोई अधिकार नहीं है। क्योंकि वह अपने अख़्तियार से पाप करता है और उसे इसका बिल्कुल ज्ञान नहीं होता कि अल्लाह तआला ने उसके भाग्य में यही लिख रखा है। क्योंकि किसी कार्य के होने से पूर्व कोई नहीं जान सकता कि अल्लाह तआला उसे उसके भाग्य में लिख रखा है।

﴿وَمَا تَدۡرِي نَفۡسٞ مَّاذَا تَكۡسِبُ غَدٗاۖ[117]

“कोई भी नहीं जानता कि वह कल क्या कमायेगा?”

जब मनुष्य कोई क़दम उठाते समय इस ह़ुज्जत को जानता ही नहीं, तो फिर सफ़ाई देते समय उसका इसे पेश करना कैसे सही हो सकता है? अल्लाह तआला ने इस ह़ुज्जत को बातिल ठहराते हुए फ़रमायाः

﴿سَيَقُولُ ٱلَّذِينَ أَشۡرَكُواْ لَوۡ شَآءَ ٱللَّهُ مَآ أَشۡرَكۡنَا وَلَآ ءَابَآؤُنَا وَلَا حَرَّمۡنَا مِن شَيۡءٖۚ كَذَٰلِكَ كَذَّبَ ٱلَّذِينَ مِن قَبۡلِهِمۡ حَتَّىٰ ذَاقُواْ بَأۡسَنَاۗ قُلۡ هَلۡ عِندَكُم مِّنۡ عِلۡمٖ فَتُخۡرِجُوهُ لَنَآۖ إِن تَتَّبِعُونَ إِلَّا ٱلظَّنَّ وَإِنۡ أَنتُمۡ إِلَّا تَخۡرُصُونَ ١٤٨[118]

“जो लोग शिर्क करते हैं, वह कहेंगे कि यदि अल्लाह चाहता, तो हम तथा हमारे पूर्वज शिर्क नहीं करते और न हम किसी चीज़ को ह़राम ठहराते। इसी प्रकार उन लोगों ने झुठलाया, जो उनसे पहले थे, यहाँ तक कि हमारे प्रकोप (अज़ाब) का मज़ा चखकर रहे। कह दो, क्या तुम्हारे पास कोई ज्ञान है तो उसे हमारे लिए निकालो (व्यक्त करो)। तुम कल्पना का अनुसरण करते हो तथा मात्र अनुमान लगाते हो।”

तथा हम भाग्य को आधार बनाकर पेश करने वाले पापियों से कहेंगेः आप पुण्य का काम यह समझकर क्यों नहीं करते कि अल्लाह तआला ने आपके भाग्य में यही लिखा है? अज्ञानता में कार्य के होने से पहले पाप एवं आज्ञापालन में इस आधार पर कोई अन्तर नहीं है। यही कारण है कि जब नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने सह़ाबा किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम को यह सूचना दी कि तुममें से हरेक का ठिकाना स्वर्ग या नरक में तय कर दिया गया है, और उन्होंने निवेदन किया कि क्या हम कर्म करने को छोड़कर उसी पर भरोसा न कर लें? तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः नहीं, तुम अमल करते रहो, क्योंकि जिसको जिस ठिकाने के लिए पैदा किया गया है, उसे उसी के कर्मों का सामर्थ्य दिया जाता है!

तथा अपने पापों पर भाग्य से ह़ुज्जत पकड़ने वालों से कहेंगेः यदि आपका इरादा मक्का की यात्रा का हो, तथा उसके दो मार्ग हों, और आपको कोई विश्वासी व्यक्ति यह बताये कि उनमें से एक मार्ग बहुत ही भयंकर एवं कष्टदायक तथा दूसरा बहुत ही सरल एवं शान्तिपूर्ण है, तो आप निश्चय ही दूसरा मार्ग अपनायेंगे। यह असंभव है कि आप पहले वाले भयंकर मार्ग पर यह कहते हुए चल निकलें कि मेरे भाग्य में यही लिखा है। अगर आप ऐसा करते हैं, तो दीवानों में शमार होंगे।

और हम उनसे यह भी कहेंगे कि यदि आपको दो नौकरियों का प्रस्ताव दिया जाय और उनमें से एक का वेतन अधिक हो, तो आप निश्चित रूप से कम वेतन वाली नौकरी की बजाय अधिक वेतन वाली नौकरी को चुनेंगे। तो फिर परलौकिक कर्मों के मामले में आप क्यों कमतर को चुनकर भाग्य की दुहाई देते हैं?

और हम उनसे यह भी कहेंगे कि जब आप किसी शारीरिक रोग में ग्रस्त होते हैं, तो अपने उपचार के लिए हर डॉक्टर का दरवाज़ा खटखटाते हैं और आरेशन की पीड़ा एवं कड़वी दवा पूरे धैर्य के साथ सहन करते हैं, तो फिर अपने दिल पर पापों के रोग के ह़मले की सूरत में ऐसा क्यों नहीं करते?

हमारा ईमान है कि अल्लाह तआला की अशेष कृपा एवं ह़िक्मत के चलते बुराई का सम्बन्ध उससे जोड़ा नहीं जायेगा। नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः

((وَالشَّرُّ لَيْسَ إِلَيْكَ))[119]

((तथा बुराई तेरी ओर मन्सूब नहीं है।))

अल्लाह तआला के आदेशों में स्वयं कभी बुराई नहीं होती। क्योंकि वह उसकी कृपा एवं हिक्मत से जारी होते हैं। बल्क़ि बुराई उसकी निर्णीत वस्तुओं में होती है। क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ह़सन रज़ियल्लाहु अन्हु को दुआये क़ुनूत की शिक्षा देते हुए फ़रमायाः

((وَ قِنِي شَرَّ مَا قَضَيْتَ))

((मुझे अपनी निर्णीत चीज़ों के अनिष्ट से सुरक्षित रख।))

इसमें अनिष्ट का सम्बन्ध अल्लाह की निर्णीत वस्तुओं से जोड़ा गया है। इसके बावजूद निर्णीत वस्तुओं में सिर्फ़ बुराई ही नहीं होती, बल्कि उनमें एक कोण से बुराई होती है तो दूसरे कोण से भलाई अथवा एक स्थान पर बुराई होती है तो दूसरे स्थान पर अच्छाई।

चुनांचे ज़मीन में विकार जैसे अकाल, बीमारी, फ़क़ीरी तथा भय आदि बुराई हैं। किन्तु इनमें भलाई का पक्ष भी मौजूद है। अल्लाह तआला ने फ़रमयाः

﴿ظَهَرَ ٱلۡفَسَادُ فِي ٱلۡبَرِّ وَٱلۡبَحۡرِ بِمَا كَسَبَتۡ أَيۡدِي ٱلنَّاسِ لِيُذِيقَهُم بَعۡضَ ٱلَّذِي عَمِلُواْ لَعَلَّهُمۡ يَرۡجِعُونَ[120]

“जल और थल में लोगों के कुकर्मों के कारण फ़साद फैल गया, ताकि उन्हें उनके कुछ कर्तूतों का फल अल्लाह तआला चखा दे, (बहुत) मुम्किन है कि वह रुक जायें।”

तथा चोर का हाथ काटना एवं बियाहता व्याभिचारी को रज्म (संगसार) करना, चोर और व्यभिचारी के लिए तो अनिष्ट है, क्योंकि एक का हाथ नष्ट होता है तो दूसरे की जान जाती है, परन्तु दूसरे कोण से यह उनके लिए उपकार है, क्योंकि इससे पापों का निवारण होता है। अल्लाह तआला उनके लिए लोक-परलोक की सज़ा इकट्ठा नहीं करेगा। तथा दूसरे स्थान पर यह इस कोण से भी उपकार है कि इससे लोगों की सम्पत्तियों, प्रतिष्ठाओं एवं गोत्रों की रक्षा होती है।

 अध्यायः 8

 अक़ीदा के लाभ एवं प्रतिकार

इन महान नियमों पर आधारित यह उच्च अक़ीदा अपने मानने वालों के लिए अति श्रेष्ठ प्रतिफल एवं परिणामों का वाहक है।

अल्लाह तआला पर ईमान के लाभ एवं प्रतिकारः

अल्लाह तआला की ज़ात तथा उसके नामों और गुणों पर ईमान से बन्दे के दिलों में उसकी मुह़ब्बत एवं उसका सम्मान उत्पन्न होता है, जिसके परिणाम स्वरूप वह उसके आदेशों के पालन के लिए तैयार रहता है तथा निषिध्द चीज़ों से बचने लगता है। अल्लाह तआला के आदेशों के पालन तथा निषिध्द कार्यों से बचे रहने में व्यक्ति एवं समाज के लोक-परलोक का पूर्ण कल्याण है।

﴿مَنۡ عَمِلَ صَٰلِحٗا مِّن ذَكَرٍ أَوۡ أُنثَىٰ وَهُوَ مُؤۡمِنٞ فَلَنُحۡيِيَنَّهُۥ حَيَوٰةٗ طَيِّبَةٗۖ وَلَنَجۡزِيَنَّهُمۡ أَجۡرَهُم بِأَحۡسَنِ مَا كَانُواْ يَعۡمَلُونَ ٩٧[121]

“जो पुण्य का कार्य करे, नर हो अथवा नारी, और वह ईमान वाला हो, तो हम उसे निःसंदेह सर्वोत्तम जीवन प्रदान करेंगे तथा उनके पुण्य के कार्यों का उत्तम बदला भी अवश्य देंगे।”

फ़रिश्तों पर ईमान के लाभ एवं प्रतिकारः

1.  उनके स्रष्टा की महानता, शक्ति एवं अधिपत्य का ज्ञान।

2.  अल्लाह तआला की अपने बन्दों के साथ विशेष कृपा पर उसका शुक्र अदा करना। क्योंकि अल्लाह ने कुछ फ़रिश्तों को बन्दों के साथ लगा रखा है, जो उनकी रक्षा करने तथा उनके कर्मों को लिखने आदि कार्यों में व्यस्त रहते हैं।

3.  फ़रिश्तों से मुह़ब्बत करना, इस बिना पर कि वह यथोचित रूप से अल्लाह की उपासना करते हैं तथा मोमिनों के लिए इस्तिग़्फ़ार (क्षमा याचना) करते हैं।

किताबों पर ईमान के लाभ एवं प्रतिकारः

1.  सृष्टि पर अल्लाह तआला की कृपा एवं मेहरबानी का ज्ञान। क्योंकि उसने हर क़ौम के लिए वह किताब उतारी, जो उन्हें सत्य मार्ग की ओर अग्रसर करती है।

2.  अल्लाह तआला की ह़िक्मत का ज़ाहिर होना। क्योंकि उसने इन किताबों में हर उम्मत के लिए वह शरीअत निर्धारित की, जो उनके लिए मुनासिब थी। इन किताबों में अन्तिम किताब पवित्र क़ुर्आन है, जो क़यामत तक तमाम सृष्टि के लिए प्रत्येक युग तथा प्रत्येक स्थान में मुनासिब है।

3.  इस पर अल्लाह तआला की नेमत का शुक्र अदा करना।

रसूलों पर ईमान के लाभ एवं प्रतिकारः

1.  अपनी सृष्टि पर, अल्लाह की कृपा एवं दया का ज्ञान। क्योंकि उसने इन रसूलों को उनके पास उनके मार्गदर्शन तथा निर्देशन के लिए भेजा है।

2.  अल्लाह तआला की इस महा कृपा पर उसका आभार व्यक्त करना।

3.  रसूलों से मुह़ब्बत, उनका श्रध्दा और उनकी ऐसी प्रशंसा करना, जिसके वह योग्य हैं। क्योंकि वह अल्लाह के रसूल और उसके ख़ालिस बन्दे हैं। उन्होंने अल्लाह तआला की इबादत करने, उसके संदेश को पहुँचाने और उसके बन्दों के शुभचिन्तन के कर्तव्य को बख़ूबी निभाया तथा दावत के रास्ते में आने वाले दुखों एवं कष्टों पर धैर्य का प्रदर्शन किया।

आख़िरत पर ईमान के लाभ एवं प्रतिकारः

1.  उस दिन के प्रतिदान की उम्मीद रखते हुए पूरे मन से अल्लाह तआला की आज्ञापालन करना एवं उस दिन की सज़ा से डरते हुए उसकी अवज्ञा से दूर रहना।

2.  यह मोमिन के लिए, दुनिया की उन नेमतों एवं माल-अस्बाब से सांत्वना का कारण है, जो उसे प्राप्त नहीं हो पीतीं। क्योंकि उसे परलोकिक नेमतों तथा प्रतिदानों की आशा रहती है।

भाग्य पर ईमान के लाभ एवं प्रतिकारः

1.  साधनों को अख़्तियार करते समय अल्लाह तआला पर भरोसा करना। क्योंकि साधन तथा परिणाम दोनों अल्लाह तआला के फ़ैसले तथा उसकी इच्छा पर आश्रित हैं।

2.  आत्मा की राह़त तथा दिल की शान्ति। क्योंकि बन्दा जब जान ले कि यह अल्लाह तआला के फ़ैसले से हुआ है तथा अप्रिय विषय निश्चय संघटित होने वाले हैं, तब आत्मा को राह़त तथा दिल को शान्ति मिल जाती है एवं वह प्रभु के फैसले से संतुष्ट हो जाता है। जो व्यक्ति भाग्य पर ईमान लाता है उससे बढ़कर सुखप्रद जीवन तथा सुकून एवं चैन किसी को प्राप्त नहीं होता।

3.  उद्देश्य प्राप्त होने पर आत्मगर्व से बचाव। क्योंकि इसकी प्राप्ति अल्लाह तआला की ओर से नेमत है, जिसे उसने सफलता तथा कल्याण के साधनों में से बनाया है। अतः इस पर अल्लाह का शुक्र बजा लाता है एवं गर्व से परहेज़ करता है।

4.  उद्देश्य के फ़ौत होने या अप्रिय वस्तु के सामने आने पर बेचैनी से छुटकारा। क्योंकि यह उस अल्लाह का निर्णय है, जो आकाशों एवं धरती का स्वामी है तथा यह हर अवस्था में होकर रहेगा। अतः वह इस पर सब्र करता है एवं नेकी की उम्मीद रखता है। अल्लाह तआला इसी ओर संकेत करते हुए फ़रमाता हैः

﴿مَآ أَصَابَ مِن مُّصِيبَةٖ فِي ٱلۡأَرۡضِ وَلَا فِيٓ أَنفُسِكُمۡ إِلَّا فِي كِتَٰبٖ مِّن قَبۡلِ أَن نَّبۡرَأَهَآۚ إِنَّ ذَٰلِكَ عَلَى ٱللَّهِ يَسِيرٞ ٢٢ لِّكَيۡلَا تَأۡسَوۡاْ عَلَىٰ مَا فَاتَكُمۡ وَلَا تَفۡرَحُواْ بِمَآ ءَاتَىٰكُمۡۗ وَٱللَّهُ لَا يُحِبُّ كُلَّ مُخۡتَالٖ فَخُورٍ ٢٣[122]

“न कोई कठिनाई (संकट) संसार में आती है न (ख़ास) तुम्हारी जानों में, मगर इससे पूर्व कि हम उसको पैदा करें, वह एक ख़ास किताब में लिखी हुई है। निःसंदेह यह (कार्य) अल्लाह पर (बिल्कुल) आसान है। ताकि अपने से छिन जाने वाली वस्तु पर दुखी न हो जाया करो, न प्रदान की हुई वस्तु पर गर्व करने लगो, तथा गर्व करने वाले अहंकारियों को अल्लाह पसंद नहीं फ़रमाता।”

अंत में हम अल्लाह तआला से दुआ करते हैं कि वह हमें इस अक़ीदे पर दृढ़ प्रतिज्ञा वाला बनाये रखे,इससे लाभान्वित होने की तौफ़ीक़ अता करे, अपने अनुकंपाओं से सम्मानित करे, हिदायत के बाद हमारे दिलों को टेढ़ा न करे और अपने पास से हमें कृपा प्रदान करे। निःसंदेह वह परम दाता है। सारी प्रशंसा जगत के प्रभु अल्लाह के लिए है।

अल्लाह तआला की कृपा नाज़िल हो हमारे नबी मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, आपके परिवार-परिजन, आपके अस्ह़ाब (साथियों) और भलाई के साथ आपका अनुसरण करने वालों पर।



[1] सूरह मर्यमः 65

[2] सूरह अल्-बक़राः 255

[3] सूरह अल्-ह़श्रः 22-24

[4] सूरह अश्-शूराः 49-50

[5] सूरह अश्-शूराः 11-12

[6] सूरह हूदः 6

[7] सूरह अल्-अन्आमः 59

[8] सूरह लुक़्मानः 34

[9] सूरह निसाः 164

[10] सूरह अल्-आराफ़ः 143

[11] सूरह मर्यमः 52

[12] सूरह अल्-कह्फ़ः 109

[13] सूरह लुक़्मानः 27

[14] सूरह अल्-अन्आमः 115

[15] सूरह अन्-निसाः 87

[16] सूरह अन्-नह़्लः 102

[17] सूरह अश्-शुअराः 192-195

[18] सूरह अल्-बक़राः 155

[19]  सूरह अल्-अन्आमः 18

[20] सूरह यूनुसः 3

[21] सूरह अश्-शूराः 11

[22] सूरह अल्-फ़ज्रः 21-23

[23] सूरह अल्-बुरूजः 16

[24] अल्-बक़राः 253

[25] सूरह हूदः 34

[26] सूरह अन्-निसाः 27

[27] सूरह अत्-तीनः 8

[28] सूरह अल्-माइदाः 50

[29] सूरह आले-इम्रानः 31

[30] सूरह अल्-माइदाः 54

[31] सूरह आले-इम्रानः 146

[32] सूरह अल्-ह़ुजुरातः 9

[33] सूरह अल्-बक़राः 195

[34] सूरह अज़्-ज़ुमरः 7

[35] सूरह अत्-तौबाः 46

[36] सूरह अल्-बय्यिनाः 8

[37] सूरह अल्-फ़त्ह़ः 6

[38] सूरह अन्-नह़्लः 106

[39] सूरह अर्-रह़मानः 27

[40] सूरह अल्-माइदाः 64

[41] सूरह अज़्-ज़ुमरः 67

[42] सूरह हूदः 37

[43] सह़ीह़ मुस्लिमः 293

[44] सूरह अल्-अन्आमः 103

[45] सूरह अल्-क़ियामाः 22-23

[46] सूरह अश्-शूराः 11

[47] सूरह अल्-बक़राः 255

[48] सूरह यासीनः 82

[49] सूरह क़ाफ़ः 38

[50] सूरह अन्-निसाः 82

[51] सूरह आले इम्रानः 7

[52] सूरह अल्-अम्बियाः 26-27

[53] सूरह अल्-अम्बियाः 19-20

[54] सूरह क़ाफ़ः 17-18

[55] सूरह इब्राहीमः 27

[56] सूरह अर-रअदः 23-24

[57] सूरह अल्-ह़दीदः 25

[58]सूरह अल्-माइदाः 44

[59] सूरह अल्-माइदाः 46

[60] सूरह आले इम्रानः 50

[61] सूरह अल्-बक़राः 185

[62] सूरह अल्-माइदाः 48

[63] सूरह अल्-ह़िज्रः 9

[64]  सूरह अन्-निसाः 46

[65] सूरह अल्-बक़राः 79

[66] सूरह अल्-अन्आमः 91

[67] सूरह आले इम्रानः 78-79

[68] सूरह अल्-माइदाः 15-17

[69] सूरह अन्-निसाः 165

[70] सूरह अन्-निसाः 163

[71] सूरह अल्-अह़्ज़ाबः 40

[72] सूरह अल्-अह़्ज़ाबः 7

[73] सूरह अश्-शूराः 13

[74] सूरह हूदः 31

[75] सूरह अल्-अन्आमः 50

[76] सूरह अल्-आराफ़ः 188

[77] सूरह अल्-जिन्नः 21-22

[78] सूरह अल्-इस्राः 3

[79] सूरह अल्-फ़ुर्क़ान- 1

[80] सूरह सादः 45

[81] सूरह सादः 17

[82] सूरह सादः 30

[83] सूरह अज़्-ज़ुख़रुफ़ः 59

[84] सूरह अल्-आराफ़ः 158

[85] सूरह आले-इम्रानः 19

[86] सूरह अल्-माइदाः 3

[87] सूरह आले-इम्रानः 85

[88] सूरह अश्-शुअराः 105

[89] सूरह अन्-निसाः 150-151

[90] सूरह आले-इम्रानः 110

[91] सूरह अल्-ह़दीदः 10

[92] सूरह अल्-ह़श्रः 10

[93] सूरह अज़्-ज़ुमरः 68

[94] सूरह अल्-अम्बियाः 104

[95] सूरह अल्-इन्शिक़ाक़ः 7-12

[96] सूरह अल्-इस्राः 13-14

[97] सूरह अज़्-ज़ल्ज़लाः 7-8

[98] सूरह अल्-मोमिनूनः 102-104

[99] सूरह अल्-अन्आमः 160

[100] सूरह सज्दाः 17

[101] सूरह अल्-कह्फ़ः 29

[102] सूरह अत्-तलाक़ः 11

[103] सूरह अल्-अह़्ज़ाबः 64-66

[104] सूरह इब्राहीमः 27

[105] सूरह अन्-नह़्लः 32

[106] सूरह अल्-अन्आमः 93

[107] सूरह ह़ज्जः 70

[108] सूरह अज़्-ज़ुमरः 62-63

[109] सूरह अत्-तक्वीरः 28-29

[110] सूरह अल्-बक़राः 253

[111] सूरह अन्-आमः 137

[112] सूरह साफ़्फ़ातः 96

[113] सूरह अल्-बक़राः 223

[114] सूरह अत्-तौबाः 46

[115] सूरह अल्-बक़राः 286

[116] सूरह अन्-निसाः 165

[117] सूरह लुक़मानः 34

[118] सूरह अल्-अन्आमः 148

[119] मुस्लिम

[120] सूरह अर्-रूमः 41

[121] सूरह अन्-नह़्लः 97

[122] सूरह अल्-ह़दीदः 22-23