इस्लाम धर्म की विशेषता ()

 

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 इस्लाम की विशेषता


लेखक

शैख़ुल इस्लाम मुह़म्मद बिन अब्दुल बह्हाब

अनुवाद

अताउर्रह़मान ज़ियाउल्लाह

संशोधन

शफ़ीक़ुर्रह़मान ज़ियाउल्लाह मदनी

 संक्षिप्त परिचय

इस्लाम की विशेषताः इस पुस्तक में इस्लाम धर्म की विशेषता तथा इस तथ्य का वर्णन है कि इस्लाम सर्वश्रेष्ट धर्म है। यही वह ईश्वरीय धर्म है, जिसके बिना किसी भी मनुष्य को सौभाग्य और नजात प्राप्त नहीं हो सकती। अतः समस्त लोगों पर इस्लाम को स्वीकार करना और उसके अतिरिक्त अन्य धर्मों को त्याग देना अनिवार्य है। जो व्यक्ति इस्लाम को छोड़कर कोई अन्य धर्म तलाश करेगा, तो अल्लाह तआला उसको कदापि स्वीकार नहीं करेगा। इस बात का भी उल्लेख है कि बिद्अत बड़े-बड़े गुनाहों से भी भीषण और भयंकर है। इसलिए बिद्अतों से दूर रहना अनिवार्य है। तथा जिस प्रकार आरम्भ में इस्लाम के अनुयायी थोड़े थे, उसी प्रकार अन्त में भी इसके मानने वाले कम हो जायेंगे। अतः उस समय इस्लाम पर जमे रहने के लिए शुभ सूचना है।

 بسم الله الرحمن الرحيم

अल्लाह के नाम से आरम्भ करता हूँ, जो अति मेहरबान और दयालु है।

 इस्लाम की विशेषता

अल्लाह तआला का फ़रमान हैः

﴿ٱلۡيَوۡمَ أَكۡمَلۡتُ لَكُمۡ دِينَكُمۡ وَأَتۡمَمۡتُ عَلَيۡكُمۡ نِعۡمَتِي وَرَضِيتُ لَكُمُ ٱلۡإِسۡلَٰمَ دِينٗا[1]

“आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारे धर्म को सम्पूर्ण कर दिया, अपनी नेमतें तुमपर पूरी कर दीं और इस्लाम को तुम्हारे लिए धर्म स्वरूप पसन्द कर लिया।”

तथा फ़रमायाः

﴿قُلۡ يَٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ إِن كُنتُمۡ فِي شَكّٖ مِّن دِينِي فَلَآ أَعۡبُدُ ٱلَّذِينَ

تَعۡبُدُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ وَلَٰكِنۡ أَعۡبُدُ ٱللَّهَ ٱلَّذِي يَتَوَفَّىٰكُمۡۖ [2]

“आप कह दीजिए कि ऐ लोगो! यदि तुम मेरे धर्म के प्रति संदेह में हो, तो मैं उनकी उपासना नहीं करता, जिनकी उपासना तुम अल्लाह को छोड़कर करते हो। किन्तु मैं उस अल्लाह की उपासना करता हूँ, जो तुम्हें मृत्यु देता है।”

तथा अल्लाह तआला ने फ़रमायाः

﴿يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ ٱتَّقُواْ ٱللَّهَ وَءَامِنُواْ بِرَسُولِهِۦ يُؤۡتِكُمۡ كِفۡلَيۡنِ مِن رَّحۡمَتِهِۦ وَيَجۡعَل لَّكُمۡ نُورٗا تَمۡشُونَ بِهِۦ وَيَغۡفِرۡ لَكُمۡۚ وَٱللَّهُ غَفُورٞ رَّحِيمٞ[3]

ऐ ईमान वालो! अल्लाह से डरते रहो और उसके पैग़म्बर पर ईमान लाओ। अल्लाह तुम्हें अपनी रह़मत (कृपा) का दोहरा भाग देगा और तुम्हें नूर (प्रकाश) प्रदान करेगा, जिसके प्रकाश में तुम चलो-फिरोगे और तुम्हारे गुनाह भी क्षमा कर देगा। अल्लाह क्षमा करने वाला दयालु है।”

सह़ीह़ बुख़ारी में अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा से वर्णित है कि पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः

“तुम्हारा तथी यहूदियों और ईसाइयों का उदाहरण उस आदमी के समान है, जिसने मज़दूरी पर कुछ मज़दूर रखे और कहा कि कौन सुबह़ से दोपहर तक मेरा काम एक क़ीरात पर करेगा? तो यहूदियों ने काम किया। फ़िर उसने कहा कि कौन दोपहर से अस्र तक मेरा काम एक क़ीरात पर करेगा? तो ईसाइयों ने काम किया। फिर उसने कहा कि कौन अस्र की नमाज़ से सूरज डूबने तक दो क़ीरात पर करेगा? तो वह (अर्थात इस दर्मियान काम करने वाले) तुम लोग हो। इस पर यहूदी और ईसाई क्रोधित हो गये और कहने लगे कि यह क्या बात हुई? काम तो हम अधिक करें, पर मज़दूरी कम पायें? तो उसने कहाः क्या मैंने तुम्हारा कुछ ह़क़ मार लिया है? वह बोलेः नहीं। तो उसने कहा कि यह मेरा फ़ज़्ल (कृपा) है, जिसे चाहूँ, दूँ।”

तथा सह़ीह़ बुख़ारी में अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, वह बयान करते हैं कि पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः

“अल्लाह तआला ने हमसे पहले लोगों को जुमे के दिन से वंचित रखा। चुनांचे यहूदियों के भाग में शनिवार का दिन आया और ईसाइयों के भाग में रविवार का। फिर अल्लाह तआला ने हमें बरपा किया और जुमे के दिन से नबाज़ा। बिल्कुल ऐसे ही, वह क़यामत के दिन भी हमसे पीछे होंगे। हम दुनिया में अन्त में आये, किन्तु क़यामत के दिन सबसे आगे होंगे।”

और सह़ीह़ बुख़ारी में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से तालीक़न वर्णित है कि आपने फ़रमायाः

“अल्लाह के निकट सबसे पसंदीदा और सरल धर्म मिल्लते इब्राहीमी है।”

उबै बिन कअब रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, उन्होंने फ़रमायाः

“तुम लोग सुन्नत और सिराते मुस्तक़ीम –सीधे मार्ग- पर चलते रहो। क्योंकि ऐसा नहीं हो सकता कि कोई व्यक्ति सुन्नत और सिराते मुस्तक़ीम पर रहकर अल्लाह का ज़िक्र करे और अल्लाह के डर से उसकी आँखें आँसू बहायें और फिर उसे जहन्नम की आग छू ले। जो व्यक्ति सुन्नत और सिराते मुस्तक़ीम पर चलकर अल्लाह का ज़िक्र करे, फिर अल्लाह के डर से उसके रोंगटे खड़े हो जायें, उसका उदाहरण उस वृक्ष के समान है, जिसके पत्ते सूख चुके हों और सहसा आँधी आ जाये और उसके पत्ते झड़ जायें। उस व्यक्ति के गुनाह उसी तरह झड़ जाते हैं, जिस तरह उस वृक्ष के पत्ते। सिराते मुस्तक़ीम और सुन्नत के अनुसार की हुई नियमित उपासना, उनके विरुध्द की हुई अधिक उपासना से उत्तम है।”

अबू दर्दा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, उन्होंने फ़रमायाः

“बुध्दिमानों का सोना और उनका खाना-पीना क्या ही अच्छा है! यह मूर्खों के रात्रि-जाग्रण और रोज़ों को पीछे छोड़ देते हैं!! तक़्वा और यक़ीन के साथ की गई कण-बराबर नेकी, धोखे में पड़े हुए लोगों की पहाड़ बराबर उपासना से कहीं अधिक महान, श्रेष्ठ और वज़नी है।”

 इस्लाम स्वीकार करने की अनिवार्यता

अल्लाह तआला का फ़र्मान हैः

﴿وَمَن يَبۡتَغِ غَيۡرَ ٱلۡإِسۡلَٰمِ دِينٗا فَلَن يُقۡبَلَ مِنۡهُ وَهُوَ فِي ٱلۡأٓخِرَةِ مِنَ ٱلۡخَٰسِرِينَ[4]

जो व्यक्ति इस्लाम के अतिरिक्त कोई अन्य धर्म ढूँढे, उसका धर्म कदापि स्वीकार नहीं किया जाएगा और वह प्रलोक में घाटा उठाने वालों में से होगा।”

तथा अल्लाह तआला ने फ़रमायाः

﴿إِنَّ ٱلدِّينَ عِندَ ٱللَّهِ ٱلۡإِسۡلَٰمُۗ[5]

“निःसन्देह, अल्लाह के निकट धर्म इस्लाम ही है।”

तथा फ़रमायाः

﴿وَأَنَّ هَٰذَا صِرَٰطِي مُسۡتَقِيمٗا فَٱتَّبِعُوهُۖ وَلَا تَتَّبِعُواْ ٱلسُّبُلَ

فَتَفَرَّقَ بِكُمۡ عَن سَبِيلِهِ[6]

और यही धर्म मेरा सीधा मार्ग है। अतः इसी मार्ग पर चलो और दूसरी पगडण्डियों पर न चलो कि वह तुम्हें अल्लाह के मार्ग से अलग कर देंगी।”

मुजाहिद कहते हैं कि इस आयत में पगडण्डियों से अभिप्राय “बिदआत एवं संदेह” हैं।

आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः

“जिसने हमारे इस धर्म में कोई ऐसी चीज़ निकाली, जो धर्म का भाग नहीं है, तो वह मर्दूद (अस्वीकृत) है।”[7]

एक दूसरी रिवायत में हैः

“जिसने कोई ऐसा काम किया, जिसपर हमारा आदेश नहीं है, तो वह काम मर्दूद (अस्वीकृत) है।”[8]

सह़ीह़ बुख़ारी में अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, वह बयान करते हैं कि रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः

“मेरी उम्मत का प्रत्येक व्यक्ति स्वर्ग में जाएगा, सिवाय उस आदमी के, जो इन्कार कर दे। पूछा गया कि स्वर्ग में प्रवेश करने से कौन इन्कार करेगा? तो आपने फ़रमायाः “जिसने मेरी आज्ञा का पालन किया, वह स्वर्ग में प्रवेश करेगा और जिसने मेरी अवज्ञा की, उसने स्वर्ग में जाने से इन्कार किया।”

और सह़ीह बुख़ारी में अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से वर्णित है कि पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः

“अल्लाह के निकट सबसे नापसन्दीदा लोग तीन हैं: प्रथमः ह़रम में बेदीनी (नास्तिकता) का प्रदर्शन करने वाला। द्वितीयः इस्लाम के अन्दर जाहिलियत का मार्ग ढूँढने वाला। तृतीयः किसी मुसलमान का अवैध ख़ून बहाने का मुतालबा करने वाला।”[9]

शैखुल इस्लाम इब्ने तैमिय्या रह़मतुल्लाहि अलैहि फ़रमाते हैं:

“पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के फ़र्मान “जाहिलियत का मार्ग” में पैग़म्बरों के लाये हुए धर्म के विरुध्द जाहिलियत का प्रत्येग मार्ग सम्मिलित है। चाहे वह सामान्य हो या कुछ ख़ास लोगों का, यहूद एवं ईसाइयों का हो, मूरतीपूजकों का हो या इनके अतिरिक्त किसी अन्य का।”

और सह़ीह़ बुख़ारी में ह़ुज़ैफ़ा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, उन्होंने फ़रमायाः

“ऐ क़ारियों की जमाअत! सीधे मार्ग पर चलते रहो। यदि तुम सीधे मार्ग पर रहोगे, तो बहुत आगे निकल जाओगे। यदि दायें-बायें मुड़ोगे, तो अति पथ-भ्रष्ट हो जाओगे।”

और मुह़म्मद बिन वज़्ज़ाह़ ने इस प्रकार वर्णन किया है कि ह़ुज़ैफ़ा रज़ियल्लाहु अन्हु मस्जिद में प्रवेश करते हुए ह़ल्कों के निकट खड़े होकर यह फ़रमाते।

वह अधिक वर्णन करते हैं कि हमसे सुफ़्यान बिन उययना ने मुजालिद से और मुजालिद ने शअबी से और शअबी ने मसरूक़ से वर्णन करते हुए कहा है कि अब्दुल्लाह बिन मस्ऊद रज़ियल्लाहु अन्हु ने फ़रमायाः

“बाद में आने हर वर्ष गुज़रे हुए वर्षों से अधिक बुरा है। मैं यह नहीं कहता कि फ़लाँ साल फ़लाँ साल से अधिक वर्षा वाला है, न यह कहता हूँ कि फलाँ साल फलाँ साल से अधिक हरा-भरा है और न ही यह कहता हूँ कि फलाँ अमीर फलाँ अमीर से श्रेष्ठ है, बल्कि वास्तविक बात यह है कि तुम्हारे उलेमा और अच्छे लोग समाप्त हो जायेंगे। इसके पश्चात ऐसे लोग पैदा होंगे, जो धार्मिक मामलों को अपने विचार पर क़्यास करेंगे। जिस्के कारण इस्लाम को ध्वस्त और नष्ट कर दिया जाएगा।”

 इस्लाम की व्याख्या

अल्लाह तआला का फ़र्मान हैः

﴿فَإِنۡ حَآجُّوكَ فَقُلۡ أَسۡلَمۡتُ وَجۡهِيَ لِلَّهِ وَمَنِ ٱتَّبَعَنِۗ[10]

“फिर यदि यह आपसे झगड़ें, तो आप कह दें कि मैंने और मेरे मानने वालों ने अल्लाह तआला के सामने अपना सिर झुका दिया है।”

सह़ीह़ मुस्लिम में उमर रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः

“इस्लाम यह है कि तुम इस बात की गवाही दो कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं और मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के पैग़म्बर हैं, नमाज़ स्थापित करो, ज़कात दो, रमज़ान के रोज़े रखो और मामर्थ्य हो तो अल्लाह के घर -कअबा- का ह़ज्ज करो।”[11]

और सह़ीह़ ह़दीस में अबू हुरैरह रज़ियल्लाहु अन्हु से मर्फ़ूअन वर्णति हैः

“मुसलमान वह है, जिसकी ज़बान और हाथ से दूसरे मुसलमान सुरक्षित रहें।”

और बह़्ज बिन ह़कीम से वर्णित है, वह अपने बाप के वास्ते से अपने दादा से वर्णन करते हैं कि उन्होंने पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से इस्लाम के विषय में प्रश्न किया, तो आपने फ़रमायाः

“इस्लाम यह है कि तुम अपना हृदय अल्लाह को सोंप दो, अपना मुख अल्लाह की ओर कर लो, फ़र्ज़ नमाज़ें पढ़ो और फ़र्ज़ ज़कात दो।”[12]

अबू क़िलाबा एक शामी (सीरियन) आदमी से वर्णन करते हैं कि उसके बाप ने अल्लाह के पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से प्रश्न किया कि इस्लाम क्या है? तो आपने फ़रमायाः

“इस्लाम यह है कि तुम अपना दिल अल्लाह के ह़वाले कर दो और मुसलमान तुम्हारी ज़ुबान और तुम्हारे हाथ से सुरक्षित रहें।” फिर उन्होंने प्रश्न किया कि इस्लाम का कौन-सा काम सर्वश्रेष्ठ है? तो आपने फ़रमायाः “ईमान।” उसने कहा कि ईमान क्या है? तो आपने फ़रमायाः “ईमान यह है कि तुम अल्लाह पर, उसके फ़रिश्तों पर, उसकी उतारी हुई पुस्तकों पर, उसके पैग़म्बरों पर और मरने के बाद दुबारा उठाए जाने पर विश्वास रखो।”[13]

 अल्लाह तआला के फ़र्मान وَمَن يَبۡتَغِ غَيۡرَ ٱلۡإِسۡلَٰمِ دِينٗا فَلَن

 يُقۡبَلَ مِنۡهُ की व्याख्या

अल्लाह तआला का फ़र्मान हैः

﴿وَمَن يَبۡتَغِ غَيۡرَ ٱلۡإِسۡلَٰمِ دِينٗا فَلَن يُقۡبَلَ مِنۡهُ وَهُوَ فِي ٱلۡأٓخِرَةِ مِنَ ٱلۡخَٰسِرِينَ[14]

“और जो व्यक्ति इस्लाम के अतिरिक्त कोई अन्य धर्म तलाश करे, तो उसका धर्म हरगिज़ स्वीकार नहीं किया जाएगा।”

अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, वह बयान करते हैं कि पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः

“क़यामत के दिन बन्दों के आमाल उपस्थित होंगे। चुनांचे नमाज़ उपस्थित होगी और कहेगी कि ऐ पालनहार! मैं नमाज़ हूँ! अल्लाह तआला फ़रमाएगाः तू ख़ैर पर है। फ़िर ज़कात उपस्थित होगी और कहेगी कि ऐ पालनहार! मैं ज़कात हूँ! अल्लाह तआला फ़रमाएगाः तू भी ख़ैर पर है। फिर रोज़ा उपस्थित होगा और कहेगा कि ऐ पालनहार! मैं रोज़ा हूँ! अल्लाह तआला फ़रमाएगाः तू भी ख़ैर पर है। इसके बाद बन्दे के शेष आमाल इसी प्रकार उपस्थित होंगे और अल्लाह तआला फ़रमाएगाः तुमसब ख़ैर पर हो। फिर इस्लाम उपस्थित होगा और कहेगा कि ऐ पालनहार! तू सलाम है और मैं इस्लाम हूँ। अल्लाह तआला फ़रमाएगाः तू भी ख़ैर पर है। आज मैं तेरे कारण से पकड़ करूँगा और तेरे ही कारण प्रदान करूँगा। अल्लाह तआला ने अपनी किताब क़ुर्आन मजीद में फ़रमायाः

﴿وَمَن يَبۡتَغِ غَيۡرَ ٱلۡإِسۡلَٰمِ دِينٗا فَلَن يُقۡبَلَ مِنۡهُ وَهُوَ فِي ٱلۡأٓخِرَةِ مِنَ ٱلۡخَٰسِرِينَ﴾

“और जो व्यक्ति इस्लाम के अतिरिक्त कोई अन्य धर्म तलाश करे, तो उसका धर्म हरगिज़ स्वीकार नहीं किया जाएगा और वह आख़िरत में घाटा उठाने वालों में से होगा।”

इस ह़दीस को इमाम अह़मद ने रिवायत किया है। और सह़ीह़ मुस्लिम में आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत है कि पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः

“जिसने कोई ऐसा काम किया, जिसके बारे में हमारा आदेश नहीं है, तो वह काम मर्दूद (अस्वीकृत) है।” इस ह़दीस को इमाम अहमद ने भी रिवायत किया है।

 किताबुल्लाह की पैरवी करके उसके अतिरिक्त अन्य वस्तुओं से बेनियाज़ होने की अनिवार्यता

अल्लाह तआला का फ़र्मान हैः

﴿وَنَزَّلۡنَا عَلَيۡكَ ٱلۡكِتَٰبَ تِبۡيَٰنٗا لِّكُلِّ شَيۡءٖ[15]

“और हमने आपपर यह किताब उतारी है, जिसमें हर चीज़ का स्पष्ट उल्लेख है।”

सुनन नसाई आदि में है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उमर बिन ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु के हाथ में तौरात का एक पन्ना देखा, तो फ़रमायाः

“ऐ ख़त्ताब के बेटे! क्या तुम ह़ैरत में पड़े हो! मैं तुम्हारे पास स्पष्ट और उज्जवल शरीअत लेकर आया हूँ। यदि मूसा भी जीवित होते और तुम मुझे छोड़कर उनकी पैरवी करने लगते, तो पथभ्रष्ट हो जाते।”

एक दूसरी रिवायत में हैः

“यदि मूसा भी जीवित होते, तो उन्हें भी मेरी पैरवी करनी पड़ती।”

यह सुनकर उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने कहाः

“मैं अल्लाह से प्रसन्न हूँ उसे अपना पालनकर्ता मानकर, इस्लाम से प्रसन्न हूँ उसे अपना दीन समझकर और मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से प्रसन्न हूँ उन्हें अपना नबी मानकर।”

 इस्लाम के दावा से निकल जाने का वर्णन

अल्लाह तआला फ़रमाता हैः

﴿هُوَ سَمَّىٰكُمُ ٱلۡمُسۡلِمِينَ مِن قَبۡلُ وَفِي هَٰذَا﴾[16]

“उसी अल्लाह ने तुम्हारा नाम सुसलमान रखा है, इस क़ुर्आन से पहले और इसमें भी।”

ह़ारिस अश्अरी रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, वह नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से रिवायत करते हैं कि आपने फ़रमायाः

“मैं तुम्हें उन पाँच बातों का आदेश देता हूँ, जिनका अल्लाह तआला ने मुझे आदेश दिया हैः शासक की बात सुनने और उसकी पैरवी करने का, जिहाद का, हिज्रत का और मुसलमानों की जमाअत से जुड़े रहने का। क्योंकि जो व्यक्ति जमाअत से बालिश्त बराबर भी दूर हुआ, उसने अपनी गर्दन से इस्लाम का पट्टा निकाल फेंका। परन्तु यह कि वह जमाअत की ओर पलट आए। और जिसने जाहिलियत की पुकार लगाई, वह जहन्नमी है।” यह सुनकर एक व्यक्ति ने कहा कि ऐ अल्लाह के पैग़म्बर! चाहे वह नमाज़ पढ़े और रोज़े रखे? फरमायाः “हाँ, चाहे वह नमाज़ पढ़े और रोज़े रखे। अतः ऐ अल्लाह के बन्दो! तुम उस अल्लाह की पुकार लगाओ, जिसने तुम्हारा नाम मुसलमान और मोमिन रखा है।”[17]

और सह़ीह़ बुख़ारी एवं मुस्लिम में हैः

“जो जमाअत से बालिश्त बराबर भी जुदा हुआ और इसी अवस्था में मर गया, उसकी मौत जाहिलियत की मौत होगी।”

तथा सह़ीह़ ह़दीस में है कि पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः

“क्या जाहिलियत की पुकार लगाई जा रही है और मैं तुम्हारे बीच मौजूद हूँ?”

शौखुल इस्लाम अबुल अब्बास इब्ने तैमिया फ़रमाते हैं:

“इस्लाम और क़ुर्आन के दावे के सिवा हर दावा, चाहे वह नसब हो शहर का हो, क़ौम का हो, मस्लक का हो या पंथ का, सब जाहिलियत की पुकार में सम्मिलित है। बल्कि जब एक मुहाजिर और एक अन्सारी के बीच झगड़ा हो गया और मुहाजिर ने मुहाजिरों को पुकारा और अन्सारी ने अन्सारियों को आवाज़ दी, तो पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः “क्या जाहिलियत की पुकार लगाई जा रही है, जबकि मैं तुम्हारे बीच मौजूद हूँ?” और इस बात से आप बहुत अप्रसन्न हुए।” शैख़ुल इस्लाम इब्ने तैमिया का कलाम समाप्त हुआ।

 इस्लाम में सम्पूर्ण रूप से प्रवेश करने और उसके अतिरिक्त अन्य धर्मों के परित्याग की अनिवार्यता

अल्लाह तआला का फ़र्मान हैः

﴿يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ ٱدۡخُلُواْ فِي ٱلسِّلۡمِ كَآفَّةٗ﴾[18]

“ऐ ईमान वालो! इस्लाम में पूरे-पूरे प्रवेश कर जाओ।”

तथा फ़रमायाः

﴿أَلَمۡ تَرَ إِلَى ٱلَّذِينَ يَزۡعُمُونَ أَنَّهُمۡ ءَامَنُواْ بِمَآ أُنزِلَ إِلَيۡكَ وَمَآ أُنزِلَ مِن قَبۡلِكَ﴾[19]

“क्या आपने उन्हें नहीं देखा, जिनका दावा तो यह है कि जो कुछ आपपर और जो कुछ आपसे पहले उतारा गया, उसपर उनका ईमान है।”

तथा अल्लाह तआला ने फ़रमायाः

إِنَّ ٱلَّذِينَ فَرَّقُواْ دِينَهُمۡ وَكَانُواْ شِيَعٗا لَّسۡتَ مِنۡهُمۡ فِي شَيۡءٍۚ[20]

“निःसंदेह जिन लोगों ने अपने धर्म को अलग-अलग कर दिया और गुट-गुट बन गए, आपका उनसे कोई सम्बन्ध नहीं।”

इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा अल्लाह तआला के इस कथनः

﴿يَوۡمَ تَبۡيَضُّ وُجُوهٞ وَتَسۡوَدُّ وُجُوهٞۚ﴾[21]

“जिस दिन कुछ चेहरे चमक रहे होंगे और कुछ काले।”

की व्याख्या में कहते हैं:

“अह्ले सुनन्त वल-जमाअत के चेहरे उज्जवल होंगे और अह्ले बिद्अत तथा साम्प्रदायिक लोगों के चेहरे काले होंगे।”

अब्दुल्लाह बिन अम्र रज़ियल्लाहु अन्हुमा से वर्णित है, वह बयान करते हैं कि अल्लाह के पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः

“मेरी उम्मत पर बिल्कुल वैसा ही समय आएगा, जैसा कि बनी इस्लाईल पर आया था। यहाँ तक कि यदि उनमें से किसी ने अपनी माँ के साथ खुल्लम-खुल्ला बलत्कार किया होगा, तो मेरी उम्मत में भी इस प्रकार का व्यक्ति होगा, जो ऐसा करेगा। तथा बनी इस्राईल बहत्तर फ़िर्क़ों (दलों) में बट गए थे, किन्तु मेरी यह उम्मत तेहत्तर फ़िर्क़ों में बट जाएगी। उनमें से एक के अतिरिक्त बाक़ी सब नरकवासी होंगे।” सह़ाबा ने पूछा कि ऐ अल्लाह के पैग़म्बर! वह नजात पाने वाला फ़िर्क़ा कौन सा होगा? तो आपने फ़रमायाः “वह जो उस मार्ग पर चले, जिसपर मैं हूँ और मेरे सह़ाबा हैं।”

जो मोमिन अल्लाह तआला से मुलाक़ात की आशा रखता है, उसे इस स्थान पर सादिक़ व मस्दूक़ सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की ह़दीस विशेष रूप से आपके फ़र्मान “जिस तरीक़े पर मैं हूँ और मेरे साथी हैं” पर ग़ौर करना चाहिए। यह ह़दीस कितनी बड़ी नसीह़त है, उन दिलों के लिए जिनमें ज़िन्दगी की ज़रा भी रमक़ बाक़ी है। इस ह़दीस को इमाम तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है तथा उन्होंने इसे अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु के वास्ते से रिवायत करके सह़ीह़ कहा है। अल्बत्ता इस रिवायत में जहन्नम का उल्लेख नहीं है। यह ह़दीस मुस्नद अह़मद और सुनन अबू दाऊद में मुआविया रज़ियल्लाहु अन्हु के तरीक़ से वर्णित है, जिसमें आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का यह फ़र्मान भी हैः

“मेरी उम्मत में एक ऐसी क़ौम प्रकट होगी, जिनकी नसों में ख़्वाहिशात इस प्रकार घुस जाएंगी, जिस प्रकार पागल कुत्ते के काटने से पैदा होने वाली बीमारी काटे हुए व्यक्ति की नसों में प्रवेश कर जाती है। यहाँ तक कि उसके शरीर की कोई नस और कोई जोड़ उसके प्रभाव से सुरक्षित नहीं रहता।”

इससे पहले पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का यह फ़र्मान उल्लिखित हो चुका है किः

“इस्लाम में जाहिलियत का तरीक़ा ढूँढने वाला (अल्लाह के निकट तीन सबसे नापसंदीदा लोगों में से है।)

 बिद्अत बड़े-बड़े गुनाहों से भी अधिक सख़्त

अल्लाह तआला का फ़र्मान हैः

﴿إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَغۡفِرُ أَن يُشۡرَكَ بِهِۦ وَيَغۡفِرُ مَا دُونَ ذَٰلِكَ لِمَن يَشَآءُۚ﴾[22]

“अल्लाह तआला अपने साथ शिर्क किए जाने को क्षमा नहीं करेगा और इसके अतिरिक्त जिसे चाहेगा, क्षमा कर देगा।”

तथा अल्लाह तआला ने फ़रमायाः

﴿فَمَنۡ أَظۡلَمُ مِمَّنِ ٱفۡتَرَىٰ عَلَى ٱللَّهِ كَذِبٗا لِّيُضِلَّ ٱلنَّاسَ بِغَيۡرِ عِلۡمٍۚ﴾[23]

“और उससे बढ़कर अत्याचारी कौन होगा, जो अल्लाह तआला पर बिना किसी प्रमाण के झूठा आरोप लगाता है।”

तथा अल्लाह तआला ने फ़रमायाः

﴿لِيَحۡمِلُوٓاْ أَوۡزَارَهُمۡ كَامِلَةٗ يَوۡمَ ٱلۡقِيَٰمَةِ وَمِنۡ أَوۡزَارِ ٱلَّذِينَ يُضِلُّونَهُم

بِغَيۡرِ عِلۡمٍۗ أَلَا سَآءَ مَا يَزِرُونَ﴾[24]

“ताकि क़यामत के दिन यह लोग अपने पूरे बोझ के साथ ही उन लोगों के बोझ के भी भागीदार हों, जिन्हें अनजाने में पथ-भ्रष्ठ करते रहे। देखो तो कैसा बुरा बोझ उठा रहे हैं।”

और सह़ीह़ बुख़ारी में है कि पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ख़्वारिज के विषय में फ़रमायाः

“उन्हें जहाँ भी पाओ, क़त्ल कर दो। यदि मैंने उन्हें पाया, तो क़ौमे आद के क़त्ल के समान क़त्ल करूँगा।”[25]

तथा सह़ीह़ (मुस्लिम) में है कि पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अत्याचारी शासकों को क़त्ल करने से रोका है, जब तक वह नमाज़ पढ़ते हों।”

और जरीर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि एक आदमी ने ख़ैरात दिया। उसके बाद लोगों ने ख़ैरात देना आरम्भ कर दिया, तो पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः

“जिसने इस्लाम में कोई अच्छा तरीक़ा निकाला, तो उसे उसका अज्र –बदला- मिलेगा और उन लोगों का अज्र भी, जो इसके बाद उसपर अमल करेंगे। किन्तु अमल करने वालों के अज्र में कोई कमी नहीं होगी। और जिसने इस्लाम में कोई बुरा तरीक़ा अविष्कार किया, तो उसपर उसका गुनाह होगा और उन लोगों का भी गुनाह होगा, जो उसपर अमल करेंगे। किन्तु इन अमल करने वालों के गुनाह में कोई कमी नहीं होगी।” इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।

तथा सह़ीह मुस्लिम में अबू हुरैरा रज़िययल्लाहु अन्हु के द्वारा इसी के समान एक अन्य ह़दीस वर्णित है, जिसके शब्द यह हैं:

“जिसने किसी हिदायत –मार्गदर्शन- की ओर बुलाया..... और जिसने किसी गुमराही की ओर बुलाया।”

 अल्लाह तआला बिद्अती की तौबा स्वीकार नहीं करता

यह बात अनस रज़ियल्लाहु अन्हु की (मर्फ़ुअ) ह़दीस और ह़सन बसरी की मुर्सल ह़दीस से प्रमाणित है। इब्ने वज़्ज़ाह़ ने अय्यूब से बयान किया है कि उन्होंने फ़रमाया कि हमारे बीच एक आदमी था, जो कोई असत्य विचार रखता था। फिर उसने वह विचार त्याग दिया, तो मैं मुह़म्मद बिन सीरीन के पास आया और कहाः क्या आपको पता है कि अमुक ने अपना विचार त्याग दिया है?

तो उन्होंने कहाः अभी देखो तो सही, वह किस दिशा में जाता है? ऐसे लोगों के सम्बन्ध में जो ह़दीस आई है, उसका यह अन्तिम भाग उसके प्रारंभिक भाग से अधिक सख़्त है कि “वह इस्लाम से निकल जाएंगे, फिर उसकी ओर पुनः वापस नहीं लौटेंगे।”

इमाम अहमद बिन ह़म्बल –रह़मतुल्लाहि अलैहि- से इसका अर्थ पूछा गया, तो आपने फ़रमायाः “ऐसे आदमी को तौबा की तौफ़ीक़ नहीं होती।”

 अल्लाह तआला के फ़र्मान يَٰٓأَهۡلَ ٱلۡكِتَٰبِ لِمَ تُحَآجُّونَ فِيٓ إِبۡرَٰهِيمَ..... وَمَا كَانَ مِنَ ٱلۡمُشۡرِكِينَ का वर्णन

अल्लाह तआला का फ़र्मान हैः

﴿يَٰٓأَهۡلَ ٱلۡكِتَٰبِ لِمَ تُحَآجُّونَ فِيٓ إِبۡرَٰهِيمَ وَمَآ أُنزِلَتِ ٱلتَّوۡرَىٰةُ وَٱلۡإِنجِيلُ إِلَّا مِنۢ بَعۡدِهِۦٓۚ أَفَلَا تَعۡقِلُونَ ٦٥ هَٰٓأَنتُمۡ هَٰٓؤُلَآءِ حَٰجَجۡتُمۡ فِيمَا لَكُم بِهِۦ عِلۡمٞ فَلِمَ تُحَآجُّونَ فِيمَا لَيۡسَ لَكُم بِهِۦ عِلۡمٞۚ وَٱللَّهُ يَعۡلَمُ وَأَنتُمۡ

لَا تَعۡلَمُونَ ٦٦ مَا كَانَ إِبۡرَٰهِيمُ يَهُودِيّٗا وَلَا نَصۡرَانِيّٗا وَلَٰكِن كَانَ حَنِيفٗا مُّسۡلِمٗا وَمَا كَانَ مِنَ ٱلۡمُشۡرِكِينَ﴾[26]

“ऐ अहले किताब (यहूद एवं नसारा)! तुम इब्राहीम के विषय में क्यों झगड़ते हो, हालाँकि तौरात और इन्जील तो उनके बाद उतरी हैं? क्या फिर भी तुम नहीं समझते? सुनो! तुम उसमें झगड़ चुके हो, जिसका तुम्हें ज्ञान था। फिर तुम उस बात में क्यों झगड़ते हो, जिसका तुम्हें ज्ञान नहीं? और अल्लाह तआला जानता है तथा तुम नहीं जानते। इब्राहीम न तो यहूदी थे, न ईसाई। बल्कि वह तो एकांत और शूध्द मुसलमान थे और मुश्रिक –अनेकेश्वरवादी- नहीं थे।”

और अल्लाह तआला का फ़र्मान हैः

﴿وَمَن يَرۡغَبُ عَن مِّلَّةِ إِبۡرَٰهِ‍ۧمَ إِلَّا مَن سَفِهَ نَفۡسَهُۥۚ وَلَقَدِ ٱصۡطَفَيۡنَٰهُ فِي ٱلدُّنۡيَاۖ وَإِنَّهُۥ فِي ٱلۡأٓخِرَةِ لَمِنَ ٱلصَّٰلِحِينَ﴾[27]

“और इब्राहीम के धर्म से वही मुँह मोड़ेगा, जो मूर्ख होगा। हमने तो उन्हें दुनिया में भी चुन लिया था और आख़िरत में भी वह सदाचारियों में से हैं।”

इस विषय में ख़्वारिज से सम्बन्धित ह़दीस मौजूद है, जो गुज़र चुकी है। तथा सह़ीह़ ह़दीस में है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः

“अबू फलाँ के आल (अर्थात अमुक व्यक्ति के परिजन) मेरे दोस्त नहीं। मेरे दोस्त मुत्तक़ी (संयमी, ईशभय रखने वाले) लोग हैं।”

और सह़ीह़ ह़दीस में अनस रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, अल्लाह के पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से वर्णन किया गयाः किसी सह़ाबी ने कहा कि मैं गोश्त नहीं खाऊँगा, दूसरे ने कहा कि मैं रात भर नमाज़ पढ़ूँगा और नहीं सोऊँगा, तीसरे ने कहा कि मैं औरतों के समीप नहीं जाऊँगा, चौथे ने कहा कि मैं लगातार रोज़ा रखूँगा और नाग़ा नहीं करूँगा। इनकी बातें सुनकर पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः

“किन्तु मेरा ह़ाल यह है कि मैं रात को नमाज़ पढ़ता हूँ और सोता भी हूँ, रोज़ा रखता हूँ और नाग़ा भी करता हूँ तथा पत्नियों के पास भी जाता हूँ और गोश्त भी खाता हूँ। तो जिसने मेरी सुन्नत से मुँह मोड़ा, वह मुझसे नहीं।”

ग़ौर कीजिए कि जब कुछ सह़ाबा ने इबादत के उद्देश्य से दुनिया से कट जाने की इच्छा प्रकट की, तो उनके बारे में यह कठोर बात कही गई और उनके काम को सुन्नत से मुँह मोड़ना बताया गया। ऐसे में अन्य बिद्अतों और सह़ाबा के अतिरिक्त अन्य लोगों के बारे में आपका क्या विचार है?

 अल्लाह तआला के फ़र्मान فَأَقِمۡ

 وَجۡهَكَ لِلدِّينِ حَنِيفٗاۚ का वर्णन

अल्लाह तआला का फ़र्मान हैः

﴿فَأَقِمۡ وَجۡهَكَ لِلدِّينِ حَنِيفٗاۚ فِطۡرَتَ ٱللَّهِ ٱلَّتِي فَطَرَ ٱلنَّاسَ عَلَيۡهَاۚ

لَا تَبۡدِيلَ لِخَلۡقِ ٱللَّهِۚ ذَٰلِكَ ٱلدِّينُ ٱلۡقَيِّمُ وَلَٰكِنَّ أَكۡثَرَ ٱلنَّاسِ لَا يَعۡلَمُونَ﴾[28]

“आप एकांत होकर अपना मुँह दीन की ओर कर लें। (यही) अल्लाह तआला की वह फ़ितरत (प्रकृति) (है), जिस पर उसने लोगों को पैदा किया है। अल्लाह की सृष्टि को बदलना नहीं है। यही सीधा दीन है, किन्तु अधिकांश लोग नहीं जानते।”

तथा फ़रमायाः

﴿وَوَصَّىٰ بِهَآ إِبۡرَٰهِ‍ۧمُ بَنِيهِ وَيَعۡقُوبُ يَٰبَنِيَّ إِنَّ ٱللَّهَ ٱصۡطَفَىٰ لَكُمُ ٱلدِّينَ فَلَا تَمُوتُنَّ إِلَّا وَأَنتُم مُّسۡلِمُونَ﴾[29]

“और इसी इब्राहीमी धर्म की वसीयत इब्राहीम ने और याक़ूब ने अपनी-अपनी संतान को की कि ऐ मेरे बेटो! अल्लाह तआला ने तुम्हारे लिए इस धर्म को पसन्द कर लिया है। तो सावधान! तुम मुसलमान होकर ही मरना।”

तथा अल्लाह तआला ने फ़रमायाः

﴿ثُمَّ أَوۡحَيۡنَآ إِلَيۡكَ أَنِ ٱتَّبِعۡ مِلَّةَ إِبۡرَٰهِيمَ حَنِيفٗاۖ وَمَا كَانَ

مِنَ ٱلۡمُشۡرِكِينَ﴾[30]

“फिर हमने आपकी ओर यह वह़्य भेजी कि आप मिल्लते इब्राहीमी का अनुसरण कीजिए, जो कि मुवह़्ह़िद (एकेश्वरवादी) थे और मुश्रिकों में से न थे।”

इब्ने मस्ऊद रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः

“प्रत्येक नबी के अम्बिया में से कुछ दोस्त होते हैं और उनमें से मेरे दोस्त इब्राहीम हैं, जो मेरे बाप और मेरे पालनहार के ख़लील (दोस्त) हैं।” इसके बाद आपने यह आयत पढ़ीः

﴿إِنَّ أَوۡلَى ٱلنَّاسِ بِإِبۡرَٰهِيمَ لَلَّذِينَ ٱتَّبَعُوهُ وَهَٰذَا ٱلنَّبِيُّ وَٱلَّذِينَ

ءَامَنُواْۗ وَٱللَّهُ وَلِيُّ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ﴾[31]

“सबसे अधिक इब्राहीम से निकट वह लोग हैं, जिन्होंने उनका अनुसरण किया और यह नबी और वह लोग जो ईमान लाए, और मोमिनों का दोस्त अल्लाह है।”

इस ह़दीस को तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है।

अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है, वह बयान करते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः

“अल्लाह तआला तुम्हारा शरीर और तुम्हारा धन नहीं देखता, बल्कि तुम्हारा दिल और तुम्हारा कार्य देखता है।”

बुख़ारी एवं मुस्लिम में इब्ने मस्ऊद रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, वह कहते हैं कि पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः

“मैं ह़ौज़े-कौसर पर तुम सबसे पहले उपस्थित रहूँगा। मेरे पास मेरी उम्मत के कुछ लोग उपस्थित होंगे। जब मैं उन्हें देने के लिए बढ़ूँगा, तो वह मुझसे रोक दिए जाएंगे। मैं कहूँगाः ऐ मेरे पालनहार! यह तो मेरी उम्मत के लोग हैं! मुझसे कहा जाएगा कि आपको पता नहीं कि आपके बाद इन्होंने क्या-क्या बिद्अतें आविष्कार कर ली थीं।”

और बुख़ारी एवं मुस्लिम में अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः

“मेरी इच्छा थी कि हम अपने भाईयों को देख लेते”

सह़ाबा ने कहा कि ऐ अल्लाह के पैग़म्बर! क्या हम आपके भाई नहीं? फ़रमायाः “तुम मेरे असह़ाब (साथी) हो। मेरे भाई वह हैं, जो अब तक नहीं आए।” सह़ाबा ने कहा कि ऐ अल्लाह के पैग़म्बर! आपकी उम्मत के जो लोग अभी तक पैदा नहीं हुए, आप उन्हें कैसे पहचान लेंगे? फ़रमायाः “क्या अति श्वेत और काले घोड़ों के बीच अगर किसी का चमकदार माथा और सफ़ेद पाँव वाला घोड़ा हो, तो क्या वह अपना घोड़ा नहीं पहचान पायेगा?” उन्होंने उत्तर दियाः हाँ, क्यों नहीं? तो आपने फ़रमायाः “मेरी उम्मत भी क़यामत के दिन इस प्रकार उपस्थित होगी कि वुज़ु के प्रभाव से उनके चेहरे और अन्य वुज़ु के स्थान चमक रहे होंगे। मैं हौज़े कौसर पर पहले से उनकी प्रतीक्षा कर रहा हूँगा। सुनो! क़यामत के दिन कुछ लोग मेरे ह़ौज़े कौसर से ऐसे ही धुतकार दिए जाएंगे, जिस प्रकार पराया ऊँट धुत्कार दिया जाता है। मैं उन्हें आवाज़ दूँगा कि सुनो! इधर आओ! तो मुझसे कहा जाएगा कि यह वह लोग हैं, जिन्होंने आपके बाद दीन में परिवर्तन की थी। मैं कहूँगा कि फिर तो दूर हो जाओ! दूर हो जाओ!”

और सह़ीह़ बुख़ारी में है कि पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः

जिस समय मैं ह़ौज़े कौसर पर रहूँगा, एक टोली प्रकट होगी! जब मैं उन्हें पहचान लूँगा, तो मेरे और उनके बीच से एक आदमी निकलेगा और उनसे कहेगाः इधर आओ! मैं पूछूँगाः कहाँ? वह कहेगाः अल्लाह की क़सम जहन्नम की ओर! मैं कहूँगाः इनका क्या मामला है? वह कहेगाः यह वह लोग हैं, जो आपके बाद दीन से फिर गए थे। फिर इसके बाद एक अन्य टोली प्रकट होगी। –इस टोली के बारे में भी आपने वही बात कही, जो पहली टोली के बारे में कही थी।- इसके बाद आपने फ़रमायाः इनमें से मोक्ष प्राप्त करने वालों की संख्या भटके हुए ऊँटों के समान बहुत ही कम होगी।”

और बुख़ारी एवं मुस्लिम में इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा की ह़दीस है कि पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः

उस समय मैं भी वही कहूँगा, जो अल्लाह के नेक (सदाचारी) बन्दे –ईसा अलैहिस्सलाम- ने कहा थाः

﴿وَكُنتُ عَلَيۡهِمۡ شَهِيدٗا مَّا دُمۡتُ فِيهِمۡۖ فَلَمَّا تَوَفَّيۡتَنِي كُنتَ أَنتَ ٱلرَّقِيبَ عَلَيۡهِمۡۚ وَأَنتَ عَلَىٰ كُلِّ شَيۡءٖ شَهِيدٌ﴾[32]

“जब तक मैं उनके बीच रहा, उनपर गवाह रहा। फिर जब तूने मुझे उठा लिया, तो तू ही उनसे अवगत रहा और तू हर चीज़ की पूरी सूचना रखता है।”

तथा बुख़ारी एवं मुस्लिम में इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से मर्फूअन रिवायत हैः

“हर बच्चा इस्लाम की फ़ितरत पर पैदा होता है। फिर उसके माँ-बाप उसे ईसाई, यहूदी या मजूसी बना देते हैं। जिस प्रकार कि चौपाया सम्पूर्ण –बे ऐब- चौपाया जनता है। क्या तुम उनमें से कोई चौपाया ऐसा पाते हो, जिसके कान कटे-फटे हों? यहाँ तक कि तुम ही स्वयं उसके कान चीर-काट देते हो। इसके बाद अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु ने यह आयत पढ़ीः

﴿فِطۡرَتَ ٱللَّهِ ٱلَّتِي فَطَرَ ٱلنَّاسَ عَلَيۡهَاۚ[33]

“अल्लाह की वह फ़ितरत, जिसपर उसने लोगों को पैदा किया है।”

ह़ुज़ैफ़ा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, वह कहते हैं:

“लोग पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से ख़ैर –भलाई- के विषय में प्रश्न करते थे और मैं आपसे शर्र –बुराई- के बारे में पूछता था, इस डर से कि मैं उसका शिकार न हो जाऊँ। मैंने कहा कि ऐ अल्लाह के पैग़म्बर! हम जाहिलियत और बुराई में पड़े हुए थे। फिर अल्लाह तआला ने हमें ख़ैर –भलाई- की नेमत से सम्मानित किया। तो क्या इस ख़ैर के बाद भी फिर कोई बुराई होगी? तो आपने फ़रमायाः हाँ! मैंने कहाः क्या इस बुराई के बाद फिर ख़ैर का ज़माना आयेगा? फ़रमायाः “हाँ, किन्तु उसमें खोट होगी।” मैंने कहा कि कैसी खोट होगी? आपने फ़रमायाः “कुछ लोग ऐसे होंगे, जो मेरी सुन्नत और हिदायत को छोड़कर दूसरों का तरीक़ा अपनायेंगे। तुम्हें उनके कुछ काम उचित मालूम होंगे और कुछ काम अनुचित।” मैंने कहाः क्या इस ख़ैर के बाद फिर बुराई प्रकट होगी? फरमायाः हाँ, भयानक फ़ित्ने और नरक की ओर बुलाने वाले लोग पैदा होंगे। जो उनकी सुनेगा, उसे नरक में झोंक देंगे।”, मैंने कहाः ऐ अल्लाह के पैग़म्बर! आप हमें उनके औसाफ़ बता दें। फ़रमायाः “वह हममें से ही होंगे और हमारी ही भाषा में बात करेंगे।” मैंने कहाः ऐ अल्लाह के पैग़म्बर! यदि यह समय मुझे मिल जाए, तो आप मुझे क्या आदेश देते हैं? फ़रमायाः मुसलमानों की जमाअत और उनके इमाम के साथ जुड़े रहना।” मैंने कहा कि अगर उस समय मुसलमानों की कोई जमाअत और उनका इमाम न हो, तो क्या करूँ? फ़रमायाः “फिर इन सभी फ़िर्क़ों से अलग रहना, चाहे तुम्हें किसी पेड़ की जड़ से चिमटना ही क्यों न पड़ जाए, यहाँ तक कि इसी ह़ालत में तुम्हारी मृत्यु हो जाए।”

इस ह़दीस को बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है, किन्तु मुस्लिम की रिवायत में इतनी वृध्दि हैः

“इसके बाद क्या होगा? फ़रमयाः “फिर दज्जाल प्रकट होगा। उसके साथ एक नहर और एक जहन्नम होगी। जो उसकी जहन्नम में प्रवेश करेगा, उसका अज्र साबित हो जाएगा और गुनाह माफ हो जाएंगे। और जो उसकी नहर में प्रवेश करेगा, उसका गुनाह वाजिब और अज्र समाप्त हो जाएगा।” मैंने कहाः फिर इसके बाद क्या होगा? फरमायाः “इसके बाद क़यामत आ जाएगी।”

अबुल आलिया फ़रमाते हैः

“इस्लाम की शिक्षा प्राप्त करो। जब इस्लाम की शिक्षा प्राप्त कर लो, तो इससे मुँह न मोड़ो। सीधे मार्ग पर चलते रहो, क्योंकि यही इस्लाम है। इसे छोड़कर दाएं-बाएं न मुड़ो। और अपने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत पर अमल करते रहो और असत्य और भ्रष्ट अक़ायद और बिद्अतों के निकट न जाओ।”

अबुल आलिया –रह़मतुल्लाहि अलैहि- के इस कथन पर ग़ौर करो। कितना ऊँचा कथन है! और उनके उस समय का स्मरण करो, जिसमें वह इन भ्रष्ट अक़ाइद एवं बिद्अतों से सावधान कर रहे हैं कि जो इन ग़लत अक़ाइद एवं बिद्अतों में पड़ जाए, वह मानो कि इस्लाम से फिर गया। किस प्रकार उन्होंने इस्लाम की व्याख्या सुन्नत –ह़दीस- से की है। उनका बड़े-बड़े और विद्वान ताबेईन के बारे में किताब व सुन्नत के दायरे से निकलने का डर अल्लाह तआला के इस फ़र्मान का अर्थ स्पष्ट कर देता हैः

﴿إِذۡ قَالَ لَهُۥ رَبُّهُۥٓ أَسۡلِمۡۖ قَالَ أَسۡلَمۡتُ لِرَبِّ ٱلۡعَٰلَمِينَ﴾[34]

“जब उनके पालनहार ने उनसे कहा कि आज्ञाकारी हो जाओ, तो उन्होंने कहा कि मैं अल्लाह रब्बुल आलमीन का आज्ञाकारी हो गया।”

और इस फ़र्मान के अर्थ को भीः

﴿وَوَصَّىٰ بِهَآ إِبۡرَٰهِ‍ۧمُ بَنِيهِ وَيَعۡقُوبُ يَٰبَنِيَّ إِنَّ ٱللَّهَ ٱصۡطَفَىٰ لَكُمُ ٱلدِّينَ فَلَا تَمُوتُنَّ إِلَّا وَأَنتُم مُّسۡلِمُونَ﴾[35]

“इसी बात की वसीयत इब्राहीन ने और याक़ूब ने अपनी-अपनी संतान को की कि ऐ मेरे बेटो! अल्लाह ने तुम्हारे लिए इस धर्म को पसन्द कर लिया है, तो तुम मुसलमान होकर ही मरना।”

तथा इस फर्मान के अर्थ को भीः

﴿وَمَن يَرۡغَبُ عَن مِّلَّةِ إِبۡرَٰهِ‍ۧمَ إِلَّا مَن سَفِهَ نَفۡسَهُ﴾[36]

“और इब्राहीम के धर्म से वही मुँह मोड़ेगा, जो मूर्ख होगा।”

इसी प्रकार की और भी मूल बातें ज्ञात होंगी, जो मूल आधार की बुनियाद रखती हैं, परन्तु लोग इनसे निश्चेत हैं। अबुल-आलिया के कथन पर ग़ौर करने से इस अध्याय में वर्णित ह़दीसों और इन जैसी अन्य ह़दीसों का भी अर्थ स्पष्ट हो जाएगा। परन्तु जो व्यक्ति यह और इन जैसी अन्य आयतों और ह़दीसों को पढ़कर गुज़र जाए और इस बात से संतुष्ट हो कि वह इन ख़तरों का शिकार नहीं होगा और सोचे कि इसका सम्बन्ध ऐसे लोगों से है, जो कभी थे और अब समाप्त हो गए हैं, तो जान जाइये कि यह व्यक्ति भी अल्लाह तआला की पकड़ से निडर है और अल्लाह की पकड़ से वही लोग निडर होते हैं, जो घाटा उठाने वाले हैं।

और अब्दुल्लाह बिन मस्ऊद रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, वह कहते हैं कि अल्लाह के पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने एक लकीर खींची और फ़रमायाः “यही अल्लाह का सीधा मार्ग है।” फिर उस लकीर के दाएं-बाएं कई लकीरें खींचीं और फ़रमायाः “यह ऐसे मार्ग हैं, जिनमें से हर मार्ग पर शैतान बैठा हुआ है और अपनी ओर बुला रहा है।” इसके बाद आपने इस आयत की तिलावत कीः­­­

﴿وَأَنَّ هَٰذَا صِرَٰطِي مُسۡتَقِيمٗا فَٱتَّبِعُوهُۖ وَلَا تَتَّبِعُواْ ٱلسُّبُلَ

فَتَفَرَّقَ بِكُمۡ عَن سَبِيلِهِۦۚ ذَٰلِكُمۡ وَصَّىٰكُم بِهِۦ لَعَلَّكُمۡ

تَتَّقُونَ [37]

“और यही मेरा सीधा मार्ग है, तो तुम इसी पर चलो, और दूसरे मार्गों पर मत चलो कि वह तुम्हें अल्लाह के मार्ग से अलग कर देंगे, इसी का अल्लाह तआला ने तुमको ताकीदी आदेश दिया है ताकि तुम परहेज़गार (ईशभय रखने वाले) बनो।”

इस ह़दीस को इमाम अह़मद और नसाई ने रिवायत किया है।

 इस्लाम की अजनबियत और ग़ुरबा (अजनबियों) की विशेषता

अल्लाह तआला का फ़र्मान हैः

﴿فَلَوۡلَا كَانَ مِنَ ٱلۡقُرُونِ مِن قَبۡلِكُمۡ أُوْلُواْ بَقِيَّةٖ يَنۡهَوۡنَ

عَنِ ٱلۡفَسَادِ فِي ٱلۡأَرۡضِ إِلَّا قَلِيلٗا مِّمَّنۡ أَنجَيۡنَا مِنۡهُمۡۗ وَٱتَّبَعَ

ٱلَّذِينَ ظَلَمُواْ مَآ أُتۡرِفُواْ فِيهِ وَكَانُواْ مُجۡرِمِينَ﴾[38]

“पस क्यों न तुमसे पहले लोगों में ख़ैर वाले हुए, जो धरती पर दंगा फैलाने से रोकते, सिवाय उन थोड़े लोगों के, जिन्हें हमने उनमें से नजात दी थी।”

और अबू हुरैरह रज़ियल्लाहु अन्हु से मर्फ़ूअन वर्णित हैः

“इस्लाम अजनबियत की अवस्था में आरम्भ हुआ था और शीघ्र ही पहले ही के समान अजनबी हो जाएगा। ऐसे में शुभ सूचना है ग़ुरबा (अजनबियों) के लिए।”

इस ह़दीस को इमाम मुस्लिम ने रिवायत किया है तथा इसे इमाम अह़मद ने अब्दुल्लाह बिन मस्ऊद रज़ियल्लाहु अन्हु के द्वारा रिवायत किया है, जिसमें यह वृध्दि हैः

“कहा गया कि ऐ अल्लाह के पैग़म्बर! ग़ुरबा कौन लोग हैं? तो आपने फ़रमायाः “अल्लाह के मार्ग में अपने वतन तथा ख़ानदान को छोड़ देने वाले।”

और दूसरी रिवायत में हैः

“ग़ुरबा वह लोग हैं, जो उस समय नेक और सदाचारी होंगे, जब अधिकांश लोग बिगड़ चुके होंगे।”

इस ह़दीस को इमाम अह़मद ने सअद बिन अबी वक़्क़ास रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है, जिसमें हैः

“पस उस समय ख़ुशख़बरी हो ग़ुरबा के लिए, जब लोगों के अन्दर फ़साद और बिगाड़ आ जाएगा।”

इमाम तिर्मिज़ी ने कसीर बिन अब्दुल्लाह के वास्ते से रिवायत किया है, वह अपने बाप के वास्ते से अपने दादा से रिवायत करते हैं कि पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः

“ख़ुशख़बरी है उन ग़ुरबा के लिए, जो मेरी उन सुन्नतों को सुधारेंगे, जिन्हें लोग बिगाड़ चुके होंगे।”

और अबू उमय्या से रिवायत है, वह कहते हैं कि मैंने अबू सअलबा ख़ु-शनी रज़ियल्लाहु अन्हु से पूछा कि इस आयत के बारे में आप क्या कहते हैः

﴿يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ عَلَيۡكُمۡ أَنفُسَكُمۡۖ لَا يَضُرُّكُم مَّن ضَلَّ إِذَا ٱهۡتَدَيۡتُمۡ﴾[39]

“ऐ ईमान वालो! तुम अपनी चिन्ता करो। यदि तुम सीधे मार्ग पर चलोगे, तो जो पथ-भ्रष्ट है, उससे तुम्हारा कोई नुक़्सान नहीं होगा।”

तो अबू सअलबा ने कहा कि अल्लाह की क़सम! इस आयत के बारे में मैंने सबसे अधिक जानकार अर्थात अल्लाह के पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से प्रश्न किया था, तो आपने फ़रमायाः

“बल्कि तुम आपस में एक दूसरे को भलाई का आदेश देते और बुराई से रोकते रहो। यहाँ तक कि जब देख लो कि लालच का अनुपालन किया जा रहा है, ख्वाहिशात की पैरवी की जा रही है, दुनिया को प्रधानता दी जा रही है और हर व्यक्ति अपने विचारधारा पर मगन है, तो अपनी चिन्ता करो और जन साधारण की चिन्ता अपने मन से निकाल दो। क्योंकि तुम्हारे बाद ऐसे दिन आने वाले हैं, जिनमें दीन पर धैर्य से जमे रहने वाला आग का अंगारा पकड़ने वाले के समान होगा और उनमें अमल करने वाले को ऐसे पचास आदमियों के बराबर अज्र मिलेगा, जो तुम्हारे ही जैसा अमल करने वाले हैं। हमने कहा कि क्या हममें से पचास आदमी या उनमें से पचास आदमी? तो आपने फ़रमायाः “बल्कि तुममें से।” इस ह़दीस को अबू दाऊद और तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है।

इब्ने वज़्ज़ाह़ ने इसी अर्थ की ह़दीस इब्ने उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा के तरीक़ से रिवायत की हैः

“तुम्हारे बाद ऐसे दिन आयेंगे, जिनमें धैर्य करने वाले और आज तुम जिस दीन पर हो, उसपर जमे रहने वाले को तुम्हारे पचास आदमियों के बराबर पुण्य मिलेगा।”

इसके बाद इब्ले वज़्ज़ाह़ ने फ़रमाया कि हमसे मुह़म्मद बिन सईद ने बयान किया, उन्होंने कहा कि हमसे असद ने बयान किया, उन्होंने कहा कि हमसे सुफ़्यान बिन उययना ने अस्लम बसरी से और उन्होंने ह़सन के भाई सईद से रिवायत की, वह मर्फ़ूअन रिवायत करते हुए कहते हैः मैंने सुफ़्यान से कहाः क्या सईद नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से मर्फ़ूअन रिवायत करते हैं? तो उन्होंने कहाः हाँ, अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़र्मायाः

“आज तुम अपने पालनहार के शुध्द और स्पष्ट मार्ग पर हो, भलाई का आदेश देते हो, बुराई से रोकते हो और अल्लाह के मार्ग में जिहाद करते हो। अभी तक तुम्हारे अन्दर दो नशे प्रकट नहीं हुए हैं; एक जिहालत का नशा और दूसरा जीवन से प्यार का नशा। परन्तु शीघ्र ही तुम्हारी यह ह़ालत बदल जायेगी। तुम न भलाई का आदेश दोगे, न बुराई से रोकोगे और न ही अल्लाह के मार्ग में जिहाद करोगे। तुम्हारे अन्दर दोनों नशे प्रकट जो जाएंगे। उस समय किताब एवं सुन्नत पर जमे रहने वाले को पचास आदमियों के बराबर पुण्य मिलेगा।” पूछा गया कि क्या उनके पचास आदमी? आपने फ़रमायाः “नहीं बल्कि तुम्हारे पचास आदमियों के बराबर।”

इब्ने वज़्ज़ाह़ ने एक दूसरी सनद से मुआफ़री से रिवायत किया है, वह बयान करते हैं कि अल्लाह के पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः

“ख़ुशख़बरी है उन ग़ुरबा कै लिए कि जब किताबुल्लाह को छोड़ दिया जाएगा, तो वह उसपर अमल करेंगे और जब सुन्नत की रोशनी बुझा दी जाएगी, तो वह उसपर अमल करके ज़िन्दा करेंगे।”

 बिद्अतों पर चेतावनी

इर्बाज़ बिन सारिया रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, वह बयान करते हैं कि पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हमें एक बड़ी ही प्रभावशाली नसीह़त की, जिससे हमारे दिल काँप उठे और आँखें आँसू बहाने लगीं। हमने कहा कि ऐ अल्लाह के पैग़म्बर! यह तो अल-विदाई नसीह़त जान पड़ती है। आप हमें वसीयत कीजिए। तो आपने फ़रमायाः

“मैं तुम्हें अल्लाह से डरने तथा अमीर की बात मानने और सुनने की वसीयत करता हूँ। भले ही कोई दास तुम्हारा अमीर –शासक- बन जाए। तुममें से जो व्यक्ति जीवित रहेगा, वह बहुत मतभेद देखेगा। ऐसी अवस्था में तुम मेरी सुन्नत और मेरे बाद हिदायत से सम्मानित ख़ुलफ़ाये राशिदीन का तरीक़ा अपनाए रखना और उसे दृढ़ता से थामे रहना और दीन में नई आविष्कारित बिद्अतों से बचे रहना। क्योंकि हर बिद्अत पथभ्रष्टता है।” इस ह़दीस को इमाम तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है और ह़सन कहा है।

और ह़ुज़ैफ़ा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, उन्होंने फ़रमायाः

“हर वह इबादत जिसे मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सह़ाबा किराम ने इबादत न समझा हो, उसे तुम भी इबादत न समझो। क्योंकि उन्होंने बाद में आने वालों के लिए किसी बात की गुन्जाइश नहीं छोड़ी है। अतः ऐ क़ारियों की जमाअत! अल्लाह तआला से डरो और अपने असलाफ़ –पूर्वजों- के तरीक़े पर गमन रहो।” इसे इमाम अबू दाऊद ने रिवायत किया है।

और इमाम दारिमी कहते हैं कि हमें हकम बिन मुबारक ने सूचना दी, ह़कम बिन मुबारक कहते हैं कि हमसे अम्र बिन यह़या ने बयान किया, अम्र बिन यह़या कहते हैं कि मैंने अपने बाप से सुना, वह अपने बाप से रिवायत करते हैं कि उन्होंने फ़रमायाः हम नमाज़े फ़ज्र से पहले अब्दुल्लाह बिन मस्ऊद रज़ियल्लाहु अन्हु के द्वार पर बैठ जाते और जब वह घर से निकलते, तो उनके साथ मस्जिद रवाना होते। एक दिन की बात है कि अबू मूसा अश्अरी रज़ियल्लाहु अन्हु आए और कहाः क्या अबू अब्दुर्रह़मान (अब्दुल्लाह बिन मस्ऊद) निकले नहीं? हमने उत्तर दियाः नहीं। यह सुनकर वह भी हमारे साथ बैठ गए। यहाँ तक कि इब्ने मस्ऊद बाहर निकले तो हमसब उनकी ओर आगे बढ़े। अबू मूसा अश्अरी उनसे मुख़ातिब हुए और कहाः ऐ अबू अब्दुर्रह़मान! मैं अभी-अभी मस्जिद में एक नई बात देखकर आ रहा हूँ। हालाँकि जो बात मैंने देखी है, वह अल्-हम्दुलिल्लाह ख़ैर ही है। इब्ने मस्ऊद ने कहा कि वह कौन-सी बात है? अबू मूसा अश्अरी ने कहा कि अगर ज़िन्दगी रही, तो शीघ्र ही आप भी देख लेंगे। उन्होंने कहाः वह बात यह है कि कुछ लोग नमाज़ की प्रतीक्षा में मस्जिद के भीतर ह़ल्क़े बनाए बैठे हैं। उनसब के हाथों में कंकरियाँ हैं और हर ह़ल्के में एक-एक आदमी नियुक्त है, जो उनसे कहता है कि सौ बार अल्लाहु अक्बर कहो, तो सब लोग सौ बार अल्लाहु अक्बर कहते हैं। फिर कहता है कि सौ बार ला-इलाहा इल्लल्लाह कहो, तो सब लोग सौ बार ला-इलाहा इल्लल्लाह कहते हैं। फिर कहता है कि सौ बार सुब्ह़ानल्लाह कहो, तो सब लोग सौ बार सुब्ह़ानल्लाह कहते हैं! इब्ने मस्ऊद ने कहा कि आपने उनसे क्या कहा? अबू मूसा ने जवाब दिया कि आपके विचार की प्रतीक्षा में मैंने उनसे कुछ नहीं कहा। इब्ने मस्ऊद ने फ़रमाया कि आपने उनसे यह क्यों नहीं कहा कि तुम अपने गुनाह शुमार करो और फिर इस बात का ज़िम्मा ले लेते कि उनकी कोई भी नेकी नष्ट नहीं होगी।

यह कहकर इब्ने मस्ऊद मस्जिद की ओर रवाना हुए और हमभी उनके साथ चल पड़े। मस्जिद पहुँचकर इब्ने मस्ऊद उन ह़ल्क़ों में से एक ह़ल्क़े के पास खड़े हुए और फ़रमायाः तुम लोग क्या कर रहे हो? उन्होंने जवाब दिया कि ऐ अबू अब्दुर्रह़मान? यह कंकरियाँ हैं, जिनपर हम तक्बीर, तह्लील और तस्बीह़ गिन रहे हैं। इब्ने मस्ऊद ने फ़रमायाः इसके बजाय तुम अपने गुनाह गिनो और मैं इस बात का ज़िम्मा लेता हूँ कि तुम्हारी कोई भी नेकी नष्ट नहीं होगी। तुम्हारी ख़राबी हो ऐ उम्मते मुह़म्मद! अभी तो तुम्हारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सह़ाबा बड़ी संख्या में उपस्थित हैं, अभी आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के छोड़े हुए कपड़े नहीं फटे हैं, आपके बर्तन नहीं टूटे हैं और तुम इतनी जल्दी तबाही के शिकार हो गये? क़सम है उस ज़ात की, जिसके हाथ में मेरी जान है! तुम या तो एक ऐसी शरीअत पर चल रहे हो, जो मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की शरीअत से –नऊज़ु बिल्लाह- श्रेष्ठ है या फिर तुम गुमराही (पथ-भ्रष्टता) का द्वार खोल रहे हो। उन्होंने कहा कि ऐ अबू अब्दुर्रह़मान! अल्लाह की क़सम इस काम से ख़ैर के सिवाय हमारा कोई और उद्देश्य न था। तो इब्ने मस्ऊद ने फरमायाः ऐसे कितने ख़ैर के आकांक्षी हैं, जो ख़ैर तक कभी नहीं पहुँच पाते। चुनांचे अल्लाह के पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हमें बताया है कि एक क़ौम ऐसी होगी, जो क़ुर्आन पढ़ेगी, किन्तु क़ुर्आन उनके गले से नीचे नहीं उतरेगा। अल्लाह की क़सम! क्या पता कि उनमें से अधिकतर शायद तुम्हीं में से हो।

यह बातें कहकर इब्ने मस्ऊद रज़ियल्लाहु अन्हु वहाँ से वापस आ गये।

अम्र बिन सल्मा रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि इन ह़ल्कों के अधिकांश लोगों को हमने देखा कि नहरवान की वड़ाई में वह ख़्वारिज के गिरोह में शामिल होकर हमसे नेज़ा ज़नी कर रहे थे।

अल्लाह तआला ही सहायक और सहयोगी है और उसी पर हमारा भरोसा है।

وصلى الله وسلم على سيدنا محمد وعلى آله و صحبه أجمعين.

 अनुवादक

(अताउर्रह़मान ज़ियाउल्लाह)

[email protected]



[1] सूरह अल-माइदाः3

[2] सूरह यूनुसः104

[3] सूरा अल-ह़दीदः28

[4] सूरह आले-इम्रानः85

[5] सूरह आले-इम्रानः19

[6] सूरह अल्-अन्आमः153

[7] बुख़ारी एवं मुस्लिम

[8] सह़ीह़ मुस्लिम

[9] सह़ीह़ बुख़ारी

[10] सूरह आले-इम्रानः 20

[11] सह़ीह़ मुस्लिम

[12] इस ह़दीस को इमाम अह़मद ने रिवायत किया है।

[13] इस ह़दीस का शैख़ुल इस्लाम इब्ने तैमिया ने “किताबुल ईमान” के अन्दर उल्लेख करने के बाद फ़रमाया है कि इसे इमाम अह़मद और मुह़म्मद बिन नस्र मर्वज़ी ने रिवायत किया है।

[14] सूरह आले-इम्रानः 85

[15] सूरह अन्-नह़्लः 89

[16] सूरह अल्-ह़ज्जः 78

[17] इस ह़दीस को इमाम अह़मद और तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है और तिर्मिज़ी ने ह़सन कहा है।

[18] सूरह अल्-बक़राः 208

[19] सूरह अन्-निसाः 60

[20] सूरह अल्-अन्आमः 159

[21] सूरह आले-इम्रानः 106

[22] सूरह अन्-निसाः 48

[23] सूरह अल्-अन्आमः 144

[24] सूरह अन्-नह़्लः 25

[25] सह़ीह़ बुख़ारी एवं सह़ीह़ मुस्लिम

[26] सूरह आले-इम्रानः 65-67

[27] सूरह अल्-बक़राः 130

[28] सूरह अर्-रूमः 30

[29] सूरह अल्-बक़राः 132

[30] सूरह अन्-नह़्लः 123

[31] सूरह आले इम्रानः 68

[32] सूरह अल्-माइदाः 117

[33] सूरह अर्-रूमः 30

[34] सूरह अल्-बक़राः 131

[35] सूरह अल्-बक़राः 132

[36] सूरह बक़रहः 130

[37] सूरह अल-अन्आमः153

[38] सूरह हूदः 116

[39] अल्-माइदाः 105