रमज़ान के रोज़े और उसके क़ियाम (तरावीह) की फ़ज़ीलत

 [هندي – HindifgUnh ]

अब्दुल अज़ीज़ बिन अब्दुल्लाह बिन बाज़

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अताउर्रहमान ज़ियाउल्लाह

 बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

मैं अति मेहरबान और दयालु अल्लाह के नाम से आरम्भ करता हूँ।

إن الحمد لله نحمده ونستعينه ونستغفره، ونعوذ بالله من شرور أنفسنا، وسيئات أعمالنا، من يهده الله فلا مضل له، ومن يضلل فلا هادي له، وبعد:

हर प्रकार की हम्द व सना (प्रशंसा और गुणगान) केवल अल्लाह के लिए योग्य है, हम उसी की प्रशंसा करते हैं, उसी से मदद मांगते और उसी से क्षमा याचना करते हैं, तथा हम अपने नफ्स की बुराई और अपने बुरे कामों से अल्लाह की पनाह में आते हैं, जिसे अल्लाह तआला हिदायत प्रदान कर दे उसे कोई पथभ्रष्ट (गुमराह) करने वाला नहीं, और जिसे गुमराह कर दे उसे कोई हिदायत देने वाला नहीं। हम्द व सना के बाद :

 रमज़ान के रोज़े और उसके क़ियाम (तरावीह) की फ़ज़ीलत


अब्दुल अज़ीज़ बिन अब्दुल्लाह बिन बाज़ की ओर से हर मुसलमान के नाम, अल्लाह मुझे और उन्हें ईमानवालों के रास्ते पर चलाए और मुझे और उन्हें क़ुरआन व सुन्नत के समझने की तौफीक़ प्रदान करे। आमीन

ये रमज़ान के रोज़े और उसके क़ियाम (तरावीह) की फज़ीलत, तथा उसके अंदर नेक कामों द्वारा एक दूसरे से आगे बढ़ने की फज़ीलत से संबंधित कुछ नसीहतें हैं, साथ ही कुछ ऐसे महत्वपूर्ण अहकाम का वर्णन है जो कुछ लोगों पर गुप्त रह जाते हैं।

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से प्रमाणित हैं कि आप अपने सहाबा (साथियों) को रमज़ान के महीने के आगमन की शुभसूचना देते थे और आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उन्हें यह बतलाते थे कि यह ऐसा महीना है जिसमें दया व करूणा के दरवाज़े और स्वर्ग के दरवाज़े खोल दिए जाते हैं, नरक के दरवाज़े बन्द कर दिए जाते हैं और शैतानों को जकड़ दिया जाता है। आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है :

‘‘जब रमज़ान की पहली रात होती है तो स्वर्ग के दरवाज़े खोल दिए जाते हैं चुनाँचे उनमें से कोई दरवाज़ा बन्द नहीं किया जाता, और नरक (जहन्नम) के दरवाज़े बन्द कर दिए जाते हैं चुनाँचे उनमें से कोई दरवाज़ा खोला नहीं जाता, और शैतानों को जकड़ दिया जाता है, और एक पुकारने वाला पुकारता है कि ऐ भलाई के चाहने वाले! आगे बढ़, और ऐ बुराई के चाहने वाले! बाज़ आ जा, और अल्लाह तआला हर रात अपने कुछ बन्दों को जहन्नम से आज़ाद करता रहता है।''[1]

तथा आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम फरमाते हैं : ''बरकत का महीना रमज़ान तुम्हारे पास आ चुका है, जिसमें अल्लाह तुमको ढाँप लेता है तो रमहत उतारता है, गुनाहों को मिटाता है और दुआ क़बूल करता है। अल्लाह इस महीने में तुम्हारे (नेकी में) एक दूसरे से आगे बढ़ने की चेष्टा को देखता है तो तुम्हारे ऊपर अपने फरिशतों के सामने गर्व करता है। अतः तुम अपनी ओर से अल्लाह को नेकी व भलाई दिखलाओ, क्योंकि वह व्यक्ति अभागा (बदनसीब) है जो इस महीने में अल्लाह की रहमत (दया) से वंचित रह जाए।'' इस हदीस को हैसमी ने मजमउज़्ज़वाइद में (3/142) अत्तबरानी अलकबीर की ओर मन्सूब किया है।

तथा आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम फरमाते हैं : ‘‘जिस व्यक्ति ने ईमान के साथ पुण्य की आशा रखते हुए रमज़ान का रोज़ा रखा तो उसके पिछले (छोटे-छोटे) गुनाह क्षमा कर दिए जाएंगे। और जिसने ईमान की हालत में पुण्य की आशा रखते हुए रमज़ान का क़ियाम किया (तरावीह की नमाज़ पढ़ी) तो उसके पिछले (छोटे-छोटे) गुनाह क्षमा कर दिए जायेंगे। और जिसने ईमान रखते हुए पुण्य की आशा में क़द्र वाली रात में क़ियाम किया (इबादत मे बिताया) उसके पिछले (छोटे-छोटे) गुनाह क्षमा कर दिये जाएंगे।[2]

तथा आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम फरमाते हैं कि अल्लाह सर्वशक्तिमान फरमाता है : आदम के बेटे का हर कार्य उसी के लिए है, नेकी को उसके दस गुना से सात सौ गुना तक कर दिया जाता है सिवाय रोज़े के, क्योंकि वह मेरे लिए है और मैं ही उसका बदला दूँगा। उसने अपनी कामवासना और अपना खाना, पानी मेरे लिये त्याग दिया। रोज़ेदार के लिए खुशियों के दो क्षण हैं, एक खुशी उसे रोज़ा खोलते समय होती है और एक खुशी उस वक़्त होगी जब वह अपने रब से मिलेगा। रोज़ेदार के मुँह की गंध अल्लाह के निकट कस्तूरी की सुगंध से भी अधिक अच्छी है।''[3]

रमज़ान के रोज़े और उसके क़ियाम की फज़ीलत, तथा स्वयं रोज़े की फज़ीलत में वर्णित हदीसें बहुत अधिक हैं।

अतः एक मोमिन को चाहिए कि वह इस बहुमूल्य अवसर से लाभ उठाए और वह अवसर यह है कि अल्लाह ने उसपर उपकार करते हुए उसे रमज़ान का महीना प्रदान किया, तो उसे चाहिए कि वह नेकियों की तरफ जल्दी करे, बुराइयों से दूर रहे और उन कर्तव्यों के पालन में संघर्ष करे जिन्हें अल्लाह ने उसके ऊपर अनिवार्य किया है विशेषकर पाँचों नमाज़ें, क्योंकि यह इस्लाम का स्तंभ है और शहादतैन (ला इलाहा इल्लल्लाह व मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह की गवाही) के बाद सबसे बड़ा फरीज़ा (कर्तव्य) है। अतः हर मुसलमान पुरुष व महिला पर इन नमाज़ों की पाबंदी करना और इन्हें उनके समय पर इतमिनान और विनम्रता के साथ अदा करना अनिवार्य है।

तथा पुरुषों के हक़ में इसका एक महत्वपूर्ण कर्तव्य इसे जमाअत के साथ अल्लाह के उन घरों में अदा करना है, जिनको अल्लाह ने बुलन्द करने और जिनमें अपना नाम जपने का आदेश दिया है, जैसा कि अल्लाह तआला ने फरमाया :

]وَأَقِيمُوا الصَّلَاةَ وَآتُوا الزَّكَاةَ وَارْكَعُوا مَعَ الرَّاكِعِينَ[ (سورة البقرة : 43)

''और नमाज़ क़ायम करो और ज़कात दो और रुकूअ करने वालों के साथ रुकूअ करो।'' (सूरतुल बक़रा : 43).

और अल्लाह तआला ने फरमाया :

]حَافِظُوا عَلَى الصَّلَوَاتِ وَالصَّلَاةِ الْوُسْطَى وَقُومُوا لِلَّهِ قَانِتِينَ[ (سورة البقرة: 238)

''नमाज़ों की हिफाज़त करो विशेष रुप से बीच वाली नमाज़ की और अल्लाह तआला के लिए अदब से खड़े रहो।'' (सूरतुल बक़रा : 238).

और अल्लाह तआला ने फरमाया :

]قَدْ أَفْلَحَ الْمُؤْمِنُونَ الَّذِينَ هُمْ فِي صَلَاتِهِمْ خَاشِعُونَ [ (سورة المؤمنون: 2- 1)

''निःसंदेह ईमान वालों ने सफलता प्राप्त कर ली जो अपनी नमाज़ में खुशूअ (विनम्रता) अपनाते हैं।'' (सूरतुल मूमेनून : 1-2).

यहाँ तक कि अल्लाह ने फरमाया :

]أُولَئِكَ هُمُ الْوَارِثُونَ الَّذِينَ يَرِثُونَ الْفِرْدَوْسَ هُمْ فِيهَا خَالِدُونَ [ (سورة المؤمنون : 11-10)

(जो अपनी नमाज़ों की देख-भाल करते हैं।) ''यही लोग वारिस हैं जो फिरदौस (स्वर्ग) के वारिस होंगे जहाँ वे हमेशा रहेंगे।'' (सूरतुल मूमेनून : 10-11).

और अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : ''हमारे और उनके बीच नमाज़ का अहद व पैमान (प्रतिज्ञा) है तो जिसने इसे छोड़ दिया उसने कुफ्र किया।''[4]

नमाज़ के पश्चात सब से महत्वपूर्ण कर्तव्य ज़कात का अदा करना है, जैसा कि अल्लाह तआला ने फरमाया :

]وَمَا أُمِرُوا إِلَّا لِيَعْبُدُوا اللَّهَ مُخْلِصِينَ لَهُ الدِّينَ حُنَفَاءَ وَيُقِيمُوا الصَّلَاةَ وَيُؤْتُوا الزَّكَاةَ وَذَلِكَ دِينُ الْقَيِّمَةِ[ (سورة البينة : 5)

''उन्हें इसके सिवा कोई आदेश नहीं दिया गया कि केवल अल्लाह की उपासना करें उसी के लिए धर्म को खालिस रखें इब्राहीम हनीफ के धर्म पर और नमाज़ को कायम रखें और ज़कात देते रहें, यही है धर्म सीधी मिल्लत का।'' (सूरतुल बैयिनाः 5)

और अल्लाह तआला ने फरमाया :

]وَأَقِيمُوا الصَّلَاةَ وَآتُوا الزَّكَاةَ وَأَطِيعُوا الرَّسُولَ لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ [ (سورة النور : 56)

''नमाज़ की पाबंदी करो ज़कात अदा करो और अल्लाह तआला के रसूल की आज्ञा पालन में लगे रहो ताकि तुम पर दया की जाय।'' (सूरतुन्नूरः 56)

अल्लाह की महान किताब और सुन्नत इस बात का तर्क देते हैं कि जिसने अपने धन का ज़कात भुगतान नहीं किया है वह उसी के द्वारा क़ियामत के दिन दंडित किया जायेगा।

नमाज़ और ज़कात के पश्चात् सबसे महत्वपूर्ण बात रमज़ान के रोज़े हैं और यह इस्लाम के उन पाँच स्तंभों में से एक स्तंभ है जो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के इस कथन में उल्लिखित हैं कि : ‘‘इस्लाम की बुनियाद पाँच चीज़ों पर स्थापित है, ला इलाहा इल्लल्लाह और मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह की गवाही देना, नमाज़ स्थापित करना, ज़कात देना, रमज़ान के रोज़े रख़ना और खान-ए-काअबा का हज्ज करना।'' [5]

मुसलमान के ऊपर अनिवार्य है कि वह अपने रोज़े और क़ियाम (तरावीह) को उन बातों और कार्यों से सुरक्षित रखे जिन को अल्लाह ने उसके ऊपर हराम (निषिद्ध) ठहराया है, क्योंकि रोज़े का मक़सद अल्लाह का आज्ञा पालन, उसकी वर्जित चीज़ों का सम्मान करना, और अपने स्वामी की पैरवी में अपनी इच्छा का विरोध करने में संघर्ष करना, और अल्लाह की हराम की हुई चीज़ों से सब्र करने (बाज़ रहने) पर अपने आपको आदी बनाना है। उसका मक़सद मात्र खाना पानी और अन्य रोज़ा तोड़ने वाली चीज़ों का त्यागना नहीं है। इसीलिए सहीह हदीस में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से वर्णित है कि आप ने फरमाया : ''रोज़ा ढाल है, अतः जब तुम में से किसी के रोज़ा का दिन हो तो वह अश्लील बातें न करे, शोर-गुल न करे, अगर उसे कोई बुरा-भला कहे (गाली दे) या उस से लड़ाई झगड़ा करे, तो उस से कह दे कि : मैं रोज़े से हूँ।'' [6]

तथा आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से सहीह हदीस में वर्णित है कि आप ने फरमाया: ‘‘जो व्यक्ति झूठी बात कहने और झूठ पर अमल करने और मूर्खता से न बचे तो अल्लाह तआला को इस बात की कोई आवश्यकता नहीं है कि वह अपना खाना पानी त्याग कर दे।''[7]

इन प्रमाणों और इनके अलावा अन्य प्रमाणों से ज्ञात हुआ कि रोज़ेदार के ऊपर उन सभी चीज़ों से बचना अनिवार्य है जिनको अल्लाह ने उसके ऊपर हराम क़रार दिया हैं और उन सभी चीज़ों की पाबंदी करना अनिवार्य है जिनको अल्लाह ने उस के ऊपर वाजिब क़रार दिया है, और इसी अवस्था में उसके लिए बख्शिश, नरक से मुक्ति, और रोज़े व तरावीह की स्वीकृति की आशा की जा सकती है।

 कुछ बातें ऐसी हैं जिनसे कुछ लोग अनभिग रहते हैं :

उन्हीं में से एक यह है कि मुसलमान के ऊपर अनिवार्य हैं कि वह ईमान के साथ सवाब की आशा रखते हुए रोज़ा रखे, दिखावे के लिए, नाम कमाने के लिए, लोगों की देखा-देखी या अपने परिवार या अपने शहर के लोगों का अनुकरण करते हुए रोज़ा न रखे। बल्कि उसके ऊपर अनिवार्य यह है कि उसे रोज़ा रखने पर उभारने वाली चीज़ उसका यह ईमान हो कि अल्लाह ने इसे उसके ऊपर अनिवार्य किया है, और इस बारे में वह अपने रब से अज्र व सवाब की आशा रखे।

इसी प्रकार रमज़ान के क़ियाम (अर्थात तरावीह) के लिए भी ज़रूरी है कि मुसलमान उसे ईमान के साथ अज्र व सवाब की आशा रखते हुए करे, किसी अन्य कारण से न करे। इसीलिये आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया :

''जिसने ईमान के साथ पुण्य की आशा रखते हुए रमज़ान का रोज़ा रखा तो उसके पिछले (छोटे-छोटे) गुनाह क्षमा कर दिए जाएंगे। और जिसने ईमान की हालत में पुण्य की आशा रखते हुए रमज़ान का क़ियाम किया (तरावीह की नमाज़ पढ़ी) तो उसके पिछले (छोटे-छोटे) गुनाह क्षमा कर दिए जायेंगे। और जिसने ईमान रखते हुए पुण्य की आशा में क़द्र वाली रात में क़ियाम किया (इबादत में बिताया) उसके पिछले (छोटे-छोटे) गुनाह क्षमा कर दिए जाएंगे।''[8]

उन्हीं बातों में से जिनका हुक्म कुछ लोगों पर गुप्त रह जाता है यह है कि कभी कभार रोज़ेदार घाव, या नक्सीर से पीड़ित हो जाता है, या उसकी इच्छा व नियंत्रण के बिना उसके गले में पानी या पेट्रोल चला जाता है, तो इन सभी चीज़ों से रोज़ा ख़राब नहीं होता है, परन्तु जो व्यक्ति जानबूझ कर उल्टी कर दे तो उसका रोज़ा खराब हो जायेगा, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है कि: ‘‘जिस पर क़य (उल्टी) ग़ालिब आगई उस पर कोई क़ज़ा नहीं और जिसने जानबूझ कर क़य किया वह (रोज़े की) क़ज़ा करे।''[9]

उन्हीं बातों में से एक यह है कि रोज़ेदार को कभी जनाबत के स्नान को फज्र के निकलने तक विलंबित करना पड़ता है, और कुछ औरतों को हैज़ (माहवारी) अथवा निफास (प्रसव) के स्नान को फज्र निकलने तक विलंबित करना पड़ता है। जब वह फज्र से पहले पाकी को देख ले, तो ऐसी अवस्था में उस पर रोज़ा रखना ज़रुरी है, और फज्र उदय होने के बाद तक स्नान को विलंब करने में कोई रुकावट नहीं है, परन्तु उसके लिए उसे सूर्य के उदय होने तक विलंब करने की अनुमति नहीं है, बल्कि उसके लिए ज़रूरी है कि वह सूर्य के निकलने से पहले ही स्नान करे और फज्र की नमाज़ पढ़े। इसी प्रकार जनाबत वाले आदमी के लिए सूर्य के निकलने के बाद तक स्नान को विलंब करना जायज़ नहीं है, बल्कि उसके ऊपर अनिवार्य है कि वह सूर्य के निकलने से पहले ही स्नान करे और फज्र की नमाज़ पढ़े, जबकि पुरूष के लिए ज़रुरी है कि वह इसमें जल्दी करे ताकि वह फज्र की नमाज़ जमाअत के साथ पढ़ सके।

तथा जिन चीज़ों से रोज़ा खराब नहीं होता है : खून जाँच करवाना, ऐसा इन्जेक्शन लगवाना जो खूराक का काम नहीं करता है, परन्तु अगर हो सके तो उसे रात तक विलंब करना बेहतर और अधिक सावधानी का पात्र है। क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है : ''जो चीज़ तुम्हें शंका (सन्देह) में डालनेवाली हो उसे छोड़कर उस चीज़ को अपना लो जो तुम्हें शंका में डालनेवाली न हो।''[10]

और आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है : ''जो व्यक्ति शुब्हात (सन्देहों) से बच गया उसने अपने दीन और इज़्ज़त व आबरू को बचा लिया।'' [11]

उन्हीं बातों में से जिनका हुक्म कुछ लोगों पर गुप्त रह जाता है : नमाज़ में इतमिनान व स्थिरता का न पाया जाना है, चाहे वह नमाज़ फ़र्ज हो या नफ्ल हो। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सहीह हदीसें यह इंगित करती हैं कि इतमिनान व स्थिरता नमाज़ के स्तंभों में से एक स्तंभ है जिसके बिना नमाज़ सहीह नहीं होती है, और वह नमाज़ के अंदर स्थिरता और विनम्रता अपनाना तथा जल्द बाज़ी से काम न लेना है यहाँ तक कि हर जोड़ अपने स्थान पर लौट आए।

बहुत सारे लोग रमज़ान में तरावीह की नमाज़ इस तरह पढ़ते हैं कि वे उसे न तो समझते हैं और न ही उसमें इतमिनान व स्थिरता से काम लेते हैं, बल्कि उसमें कुछ चोंच मारते हैं। जबकि इस तरीक़े पर यह नमाज़ व्यर्थ है, और ऐसी नमाज़ पढ़ने वाला गुनाहगार है उसे सवाब नहीं मिलता है।

तथा उन्हीं बातों में से जिनका का हुक्म कुछ लोगों पर गुप्त रह जाता है : कुछ लोगों का यह समझना है कि बीस रकअत से कम तरावीह का पढ़ना जायज़ नहीं है, इसी तरह कुछ लोगों का यह समझना है कि ग्यारह रकअत या तेरह रकअत से अधिक तरावीह पढ़ना जायज़ नहीं है, हालाँकि ये सब भ्रम हैं जो अपनी जगह में नहीं हैं, बल्कि वह एक गल्ती है जो दलीलों के खि़लाफ है।

अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से प्रमाणित सहीह हदीसें इस बात को इंगित करती हैं कि रात की नमाज़ में विस्तार है, इसकी कोई निर्धारित सीमा नहीं है जिसका विरोध करना जायज़ नहीं, बल्कि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से साबित है कि आप रात की नमाज़ ग्यारह रकअत पढ़ते थे और कभी कभार आप ने तेरह रकअत पढ़ी और कभी कभी रमज़ान के महीने में और अन्य महीनों में इससे कम नमाज़ पढ़ी, और जब आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से रात की नमाज़ के बारे में पूछा गया तो फरमाया: ‘‘दो-दो रकअत है, तो जब तुम में से किसी को सुबह होने का भय हो तो एक रकअत नमाज पढ़़ ले, यह उसकी पढ़ी हुई नमाज़ को वित्र बना देगी।'' [12]

तथा आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने रमज़ान और अन्य महीनों में कोई विशिष्ट संख्या निर्धारित नहीं किया है। इसीलिए उमर रज़ियल्लाहु अन्हु के समयकाल में सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम ने कभी तेईस (23) रकअत तरावीह पढ़ी और कभी (11) ग्यारह रकअत तरावीह पढ़ी है। ये सब उमर रज़ियल्लाहु अन्हु से और आपके समयकाल में सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम से प्रमाणित है।

तथा कुछ सलफ सालिहीन रहिमहुमुल्लाह रमज़ान में छत्तीस रकअत तरावीह और तीन रकअत वित्र पढ़ते थे, और कुछ तो इक्तालीस रकअत पढ़ते थे। इस बात को शैखुल इस्लाम इब्ने तैमिय्या रहिमहुल्लाह और अन्य विद्धानों ने उनसे वर्णन किया है। तथा आप रहिमहुल्लाह ने वर्णन किया है कि इस संबंध में मामले के अंदर विस्तार है और यह भी बयान किया है कि जो क़िराअत और रुकूअ व सज्दे लम्बे करता है उसके लिए बेहतर है कि रकअतों की संख्या कम कर दे, और जो क़िराअत और रुकूअ व सज्दे हल्के करता है, वह रकअतों की संख्या बढ़ा दे। यह आप रहिमहुल्लाह की बात का आशय है।

और जो व्यक्ति आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत में मननचिन्तन करेगा उसे पता चल जायेगा कि इन सब में सबसे बेहतर रमज़ान और अन्य महीनों में ग्यारह रकअत या तेरह रकअत तरावीह की नमाज़ पढ़ना है, क्योंकि अक्सर हालतों में यही नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के अमल के अनुसार है, और इसलिए कि यही नमाज़ियों के लिए अधिक आसान है और खुशूअ व इतमिनान के अधिक निकट है, और जिसने इसपर वृद्धि की तो कोई हरज और कोई घृणा की बात नहीं है जैसा कि यह बात गुजर चुकी है।

और जो व्यक्ति इमाम के साथ रमज़ान का क़ियाम करता (तरावीह पढ़ता) है उस के लिए बेहतर यह है कि वह इमाम के साथ ही पलटे, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है कि : ‘‘जब आदमी इमाम के साथ तरावीह पढ़ता है यहाँ तक कि वह फारिग़ हो जाता है तो अल्लाह उसके लिये एक रात का क़ियाम लिखता है।'' [13]

सभी मुसलमानों के लिए इस सम्मानित महीने में अनेक प्रकार की उपासनाओं में संघर्ष करना धर्मसंगत है - जैसे नफ्ल नमाज़, समझबूझ और मननचिंतन के साथ कुरआन की तिलावत, अधिक से अधिक सुबहानल्लाह, ला-इलाहा इल्लल्लाह, अल्हम्दुलिल्लाह, अल्लाहु अक्बर पढ़ना, इस्तिग़फ़ार और शरई दुआयें करना, भलाई का आदेश देना और बुराई से रोकना, और अल्लाह तआला की ओर लोगों को बुलाना, निर्धनों और गरीबों का ध्यान रखना, माता-पिता के साथ अच्छा व्यवहार करना, रिश्तेदारी को जोड़ना, पड़ोसी का सम्मान करना, बीमार की तीमारदारी करना और इसके अलावा अन्य प्रकार के भलाई के काम। क्योंकि पिछली हदीस में आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है : ''अल्लाह इस महीने में तुम्हारे (नेकी में) एक दूसरे से आगे बढ़ने की चेष्टा को देखता है तो तुम्हारे ऊपर अपने फरिश्तों के सामने गर्व करता है। अतः तुम अपनी ओर से अल्लाह को नेकी व भलाई दिखलाओ, क्योंकि वह व्यक्ति अभागा (बदनसीब) है जो इस महीने में अल्लाह की रहमत (दया) से वंचित रह जाए।''

और चूँकि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का सही हदीस में फरमान है कि ''रमज़ान का उम्रा एक हज्ज के बराबर है'' - या आप ने फरमाया – ''मेरे साथ हज्ज करने के बराबर है।''[14]

और इस मुबारक महीने में अनेक प्रकार की नेकियों में पहल करने और एक दूसरे से आगे बढ़ने की वैद्धता को दर्शाने वाली हदीसें और आसार बहुत हैं।

अल्लाह से दुआ है कि वह हमें और सभी मुसलमानों को उस चीज़ की तौफीक़ दे जिसमें उसकी प्रसन्नता हो, और हमारे रोज़ों और क़ियाम (तरावीह) को क़बूल करे, हमारी स्थितियों को सुधार दे, और हम सबको पथभ्रष्ट करने वाले फित्नों से सुरक्षित रखे। तथा हम अल्लाह से यह भी दुआ करते हैं कि वह मुस्लिम नेताओं का सुधार करे, और उन्हें हक़ के ऊपर एकजुट कर दे, निःसंदेह वह इसका स्वामी और इसपर शक्तिमान है।

(अनुवादकः अताउर्रहमान ज़ियाउल्लाह)



[1] (सहीह बुख़ारी, किताबुस्सौम (1800), सहीह मुस्लिम, किताबुस्सि-याम (1079), सुनन तिर्मिज़ी, किताबुस्सौम (682), सुनन नसाई, किताबुस्सियाम (2106), सुनन इब्ने माजा, किताबुस्सियाम (1642), सुनन दारमी, किताबुस्सौम (1775).

[2] सहीह बुखारी, किताब सलातुत-तरावीह (1910), सहीह मुस्लिम किताब सलातुल मुसाफिरीन व क़सरुहा (760), सुनन तिर्मिज़ी, किताबुस्सौम (683), सुनन नसाई किताबुस्सियाम (2203), सुनन अबू दाऊद, किताबुस्सलात (1372), मुसनद अहमद बिन हंबल (2/241), सुनन दारमी किताबुस्सौम (1776).

[3] सहीह बुख़ारी, किताबुस्सौम (1805), सहीह मुसलिम, किताबुस्सियाम (1151), सुनन तिर्मिज़ी, किताबुस्सौम (764), सुनन नसाई किताबुस्सियाम (2215), सुनन इब्ने माजा, किताबुस्सियाम (1638), मुसनद अहमद बिन हंबल (2/516).

[4] सुनन तिर्मिज़ी, किताबुल ईमान (2621), सुनन नसाई, किताबुस्सलात (463), सुनन इब्ने माजा, किताब इक़ामतुस्सलात (1079), मुसनद अहमद बिन हंबल (5/346)

[5] सहीह बुखारी, किताबुल-ईमान (8), सहीह मुस्लिम किताबुल-ईमान (16), सुनन तिर्मिज़ी किताबुल ईमान (2609), सुनन नसाई किताबुल ईमान (5001) मुसनद अहमद बिन हंबल (2/26).

[6] सहीह बुखारी किताबुस्सौम, (1904), सहीह मुस्लिम किताबुस्सियाम (1151), सुनन तिर्मिज़ी, किताबुस्सौम (764), सुनन नसाई किताबुस्सियाम  (2216), सुनन अबू दाऊद किताबुस्सौम (2363).

[7] सहीह बुखारी, किताबुल अदब (1903), सुनन तिर्मिज़ी किताबुस्सौम (707), सुनन अबू दाऊद किताबुस्सौम (2362), सुनन इब्ने माजा किताबुस्सियाम (1689), मुसनद अहमद बिन हंबल (2/505).

[8] सहीह बुखारी, किताब सलातुत-तरावीह (1910), सहीह मुस्लिम किताब सलातुल मुसाफिरीन व क़सरुहा (760), सुनन तिर्मिज़ी, किताबुस्सौम (683), सुनन नसाई किताबुस्सियाम (2203), सुनन अबू दाऊद, किताबुस्सलात (1372), मुसनद अहमद बिन हंबल (2/241), सुनन दारमी किताबुस्सौम (1776).

[9] सुनन तिर्मिज़ी, किताबुस्सौम (720), सुनन अबू दाऊद, किताबुस्सौम (2380), सुनन इब्ने माजा किताबुस्सियाम (1676) मुसनद अहमद बिन हंबल (2/498), सुनन दारमी किताबुस्सौम (1729).

[10] सुनन तिर्मिज़ी, सिफतुल क़ियामह वर्रिक़ाक़ वल-वरअ (2518) सुनन नसाई किताबुल अशरिबा (5711), मुसनद अहमद बिन हंबल (1/200) सुनन दारमी किताबुल बुयूअ (2532).

[11] सहीह बुखारी, किताबुल ईमान (52), सहीह मुस्लिम किताबुल मुसाक़ात (1599), सुनन तिर्मिज़ी किताबुल बुयूअ (12015), सुनन नसाई किताबुल बुयूअ (4453), सुनन अबू दाऊद किताबुल बुयूअ (3329), सुनन इब्ने माजा किताबुल फितन (3984), मुसनद अहमद बिन हंबल (4/270) सुनन दारमी किताबुल बुयूअ (2531).

[12] सहीह बुखारी किताबुस्सलात (460), सहीह मुस्लिम किताब सलातुल मुसाफिरीन व क़सुरहा (749), सुनन तिर्मिज़ी किताबुस्सलात (461), सुनन नसाई किताब क़ियामुल्लैल (1691), सुनन अबू दाऊद किताबुस्सलात (1326), सुनन इब्ने माजा किताब इक़समतुस्सलात (1175), मुसनद अहमद बिन हंबल (2/102), मुवत्ता इमाम मालिक किताबुन्निदा लिस्सलात (269).

[13] (सुनन तिर्मिज़ी किताबुस्सौम (806), सुनन नसाई किताबुस सहव (1364), सुनन अबू दाऊद किताबुस्सलात (1375), सुनन इब्ने माजा किताबुल इक़ामतुस्सलात (1327), मुसनद अहमद बिन हंबल (5ध्160) सुनन दारमी किताबुस्सौम (1777).

[14] (सुनन तिर्मिज़ी किताबुल हज्ज (939), सुनन अबू दाऊद किताबुस्सलात (1988), सुनन इब्ने माजा किताबुल मनासिक (1327), मुसनद अहमद बिन हंबल (6/375) सुनन दारमी किताबुल मनासिक (1860).