अपने बच्चे को पैगंबर की कहानी सुनायें

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अपने बच्चे को पैगंबर की कहानी सुनायें:
इस पुस्तिका में हमारे प्रिय पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के बचपन से संबंधित कहानियों का एक समूह प्रस्तुत किया गया है, जिन्हें बच्चों को सुनाना उचित है।.
इस पुस्तिका में हमारे प्रिय पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की किशोरावस्था से संबंधित कहानियों का एक समूह प्रस्तुत किया गया है, जो बच्चों को सुनाना उचित है।.

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विस्तृत विवरण

 अपने बच्चे को पैगंबर की कहानी सुनायें

(पैगंबर का बचपन)

احْكِ لطفلك عن رسول الله

[ طفولة  الرسول ]


بِسْمِ اللَّـهِ الرَّحْمَـٰنِ الرَّحِيم

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

मैं अति मेहरबान और दयालु अल्लाह के नाम से आरम्भ करता हूँ।

إن الحمد لله نحمده ونستعينه ونستغفره، ونعوذ بالله من شرور أنفسنا، وسيئات أعمالنا، من يهده الله فلا مضل له، ومن يضلل فلا هادي له، وبعد:

हर प्रकार की हम्द व सना (प्रशंसा और गुणगान) केवल अल्लाह के लिए योग्य है, हम उसी की प्रशंसा करते हैं, उसी से मदद मांगते और उसी से क्षमा याचना करते हैं, तथा हम अपने नफ्स की बुराई और अपने बुरे कामों से अल्लाह की पनाह में आते हैं, जिसे अल्लाह तआला हिदायत प्रदान कर दे उसे कोई पथभ्रष्ट (गुमराह) करने वाला नहीं, और जिसे गुमराह कर दे उसे कोई हिदायत देने वाला नहीं। हम्द व सना के बाद :


पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का बचपन

 हाशिम की शादी की कहानी

जब मक्का में लोगों की भूख और गरीबी सख्त हो गर्इ, तो अम्र बिन मनाफ (नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के परदादा हाशिम) ने किसी ऐसे उपाय के बारे में सोचा जिससे वह अपने बाल बच्चों को इस परेशानी से नजात दिला सकें। चुनाँचे वह गर्मियों में शाम की ओर और सर्दियों में यमन की ओर यात्रा करते थे ताकि वह व्यापार करें और अपनी क़ौम के पास खाने की चीज़ें लेकर आयें। वह पहले व्यक्ति थे जिन्हों ने मक्का वालों को शाम और यमन की ओर तिजारत के लिए यात्रा करना सिखाया। अल्लाह तआला ने इन दोनों यात्राओं का वर्णन सूरत क़ुरैश में किया है।

एक बार जब हाशिम शाम की ओर यात्रा पर थे, तो वह यसरिब - मदीना - से गुज़रे। वहाँ उन्हों ने बनू नज्जार नामी गोत्र की एक महिला सलमा बिन्त अम्र से शादी कर ली, फिर कुछ दिन ठहरने के बाद उन्हें वहीं छोड़कर चले गए, इस हाल में कि वह उनके बेटे के साथ गर्भ की अवस्था में थीं, ताकि वह अपने परिवार वालों के बीच में ही जनें जिन्हों ने यह शर्त लगार्इ थी कि सलमा उनके बीच ही जनेंगी।

 ज़मज़म के कुँआ की कहानी

साल गुज़रते गए, सलमा बिन्त अम्र ने अब्दुल मुत्तलिब बिन हाशिम यानी नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के दादा को जन्म दिया था, अब्दुल मुत्तलिब बड़े हो गए, और अल्लाह तआला का करना ऐसा हुआ कि वह अपने पिता के नगर मक्का में रहने लगे। अब्दुल मुत्तलिब हज्ज के लिए मक्का आने वाले हाजियों को पानी पिलाया करते थे और अल्लाह के घर की सेवा करते थे। चुनाँचे लोग उनके आस पास एकत्रित हो गए और उन्हें अपना नायक बना लिया। अब्दुल मुत्तलिब अल्लाह के सम्मानित घर से बहुत प्यार करते थे। उन्हों ने ज़मज़म के कुँआ के खोदे जाने के बारे में सुन रखा था। अत: उनके अंदर उसके स्थान को जानने की अभिलाषा पैदा हुई ताकि फिर से उसकी खुदार्इ करें। चुनाँचे एक रात, अब्दुल मुत्तलिब ने सपने में देखा कि कोर्इ उन्हें पुकार कर कह रहा है : ज़मज़म का कुँआ खोदो। यह मामला कर्इ बार घटित हुआ, और उन्हों ने सपने में उसका स्थान भी देखा। जब उन्हों ने अपनी क़ौम को इसकी सूचना दी तो उन्हों ने आपका मज़ाक उड़ाया और आपकी बात की पुष्टि नहीं की। अब्दुल मुत्तलिब के केवल एक ही बेटा था जिसका नाम हारिस था। उन्हों ने उससे कुँआ खोदने में उनकी सहायता करने के लिए कहा, चुनाँचे अब्दुल मुत्तलिब और उनके बेटे हारिस ने मिलकर ज़मज़म का कुँआ खोदा।

 अब्दुल मुत्तलिब की मन्नत

जब कुँआ दुबारा खोद दिया गया, तो उनकी क़ौम ने उसमें हिस्सा बटा लिया। इस पर उन्हें कमज़ोरी और अत्याचार का आभास हुआ। क्योंकि उनकी क़ौम उस कुँआ में जिसे उन्हों ने खोदा था साझेदार बन गर्इ थी, इसलिए कि हारिस के अलावा उनकी कोर्इ संतान नहीं थी। अतः अब्दुल मुत्तलिब ने अपने दोनों हाथों को आसमान की ओर उठाकर अल्लाह से यह प्रार्थना की कि उन्हें दस बेटे प्रदान करे, और यह मन्नत मानी कि यदि अल्लाह तआला ने उन्हें दस बेटे प्रदान कर दिए तो वह अल्लाह की निकटता प्राप्त करने के लिए उनमें से एक बेटे को क़ुर्बान कर देंगे। नि:संदेह यह इस्लाम से पूर्व का मामाला है, और अब्दुल मुत्तलिब इस बात को नहीं जानते थे कि संतान की बलि देना हराम है, बल्कि वह अपने पास मौजूद सबसे क़ीमती चीज़ – अपने बेटे की बलि देकर अल्लाह की निकटता प्राप्त करना चाहते थे।

 बलिदान की कहानी

क्या आप जानते हैं कि पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पिता अब्दुल्लाह बलि चढ़ने वाले थे?

अब्दुल मुत्तलिब पर कर्इ साल बीत गए, अल्लाह ने उनकी दुआ को स्वीकार कर लिया, और उनकी अभिलाषा पूरी कर दी। चुनाँचे आपको दस बेटे प्रदान किए। उन्हें अल्लाह की नेमत का एहसास हुआ और वह बहुत प्रसन्न हुए। क्योंकि उनके बच्चे उनकी सहायता करेंगे, और उनके सहायक बनेंगे। इसलिए कि जाहिलियत के समय काल में शक्ति ही उनपर राज और शासन करती थी। शक्ति वाला कमज़ोर को खा जाता था। परंतु अब्दुल मुत्तलिब के चेहरे पर शोक छा गया। उन्हों ने अपनी मन्नत और इस वादा को याद किया कि यदि अल्लाह ने उन्हें दस बेटे प्रदान कर दिए तो वह अपने एक बेटे को बलिदान कर देंगे। अब्दुल मुत्तलिब ने अपने एक बच्चे को बलि देने का फैसला कर लिया, जैसाकि उन्हों ने अल्लाह से इसका वादा किया था। वह सोच विचार करने लगे कि अपने बच्चों में से किसे क़ुर्बान करें ? परंतु उन्हों ने इस मामले को अल्लाह पर छोड़ दिया। उन्हों ने अपने बेटों के बीचे क़ुर्आ अंदाज़ी की, लेकिन बड़े आश्चर्य का सामना हुआ, उनके सबसे छोटे और सबसे चहेते बेटे अब्दुल्लाह के नाम का क़ुर्आ निकला। चुनाँचे उन्हों ने दुबारा क़ुर्आ निकाला, परंतु प्रति बार अब्दुल्लाह के नाम का ही क़ुर्आ निकलता था।

 अब्दुल्लाह का फिद्या

अब्दुल मुत्तलिब चिंता में पड़ गए कि क्या करें? क़ुर्आ उनके सबसे चहेते और सबसे छोटे बेटे अब्दुल्लाह के नाम पर निकला था। अत: उन्हों ने अपनी क़ौम से सलाह लिया, तो एक काहिना (अर्थात ज्योतिषिन) ने उन्हें सलाह दिया कि वह अपने बच्चे की जान को ऊँटों के बदले छुड़ा लें। अब्दुल मुत्तलिब ने काहिना की सलाह पर अमल किया, परंतु क़ुर्आ अब्दुल्लाह ही पर निकलता था। अतः वह ऊँटों की संख्या बढ़ाते रहते थे यहाँ तक कि वे सौ की संख्या को पहुँच गए, तो उस समय क़ुर्आ ऊँटों पर निकला। अब्दुल मुत्तलिब ने अपने बेटे अब्दुल्लाह के बलिदान के बदले एक सौ ऊँट ज़ब्ह किए, और उसे गरीबों व निर्धनों में वितरित कर दिए, और अपने परिवार और जनजाति के लोगों को भी खिलाए। अब्दुल मुत्तलिब ने अपने बेटे अब्दुल्लाह की मुक्ति पर अल्लाह की प्रशंसा की। उन्हें अपनी गोद में ले लिया और अपने स्नेह और सहानुभूति से ढाँप लिया।

 अब्दुल्लाह की शादी की कहानी

अब्दुल्लाह बिन अब्दुल मुत्तलिब बड़े होगए। वह क़ुरैश के युवाओं में सबसे सम्मानित, सबसे श्रेष्ठ नैतिकता वाले, और सबसे सुंदर दृश्य वाले थे। अब्दुल मुत्तलिब ने अपने बेटे को देखा कि वह बड़े हो गए हैं, तो उन्हों ने उनकी शादी करने के बारे में सोचा। क्योंकि जाहिलियत के समय काल में अरबों के अंदर व्यभिचार बड़े पैमाने पर फैली हुर्इ थी। किंतु अब्दुल मुत्तलिब अपने बच्चों का पालन पोषण पवित्रता, शु़द्धता और सतीत्व पर करते थे। अब्दुल मुत्तलिब ने उनके लिए आमिना बिन्त वहब से शादी करने का प्रस्ताव रखा जो कि बनू ज़हरा की सबसे पवित्र महिला और उनकी नायिका थीं। अब्दुल्लाह ने आमिना से विवाह कर लिया। एक पुनीत पुरूष और एक पुनीत महिला के बीच इस शुभ विवाह पर मक्का के सभी लोग खुशी से झूम रहे थे। अब्दुल्लाह ने आमिना के साथ कुछ महीने बिताने के बाद, उनसे अनुमति लेकर व्यापार के लिए निकल पड़े, लेकिन वह अपने रास्ते में मदीना के अंदर ही मृत्यु पा गए, जबकि अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम आमिना के गर्भ में थे। जब क़ाफिला वापस लौटा तो आमिना ने अपने पति की प्रतीक्षा की, किंतु वह वापस नहीं लैटे। उन्हें पता चला कि उनकी मृत्यु हो चुकी है। वह उन पर बहुत दु:खी हुर्इं, उनके पिता अब्दुल मुत्तलिब को भी उन पर बहुत शोक हुआ, और सभी लोग अब्दुल्लाह के बेटे के जन्म की प्रतीक्षा करने लगे।

 हाथी की घटना की कहानी

अब्दुल्लाह की मृत्यु हो गर्इ, और आमिना अपने पति के घर में अपने ​शिशु के आगमन की प्रतीक्षा करने लगीं। एक दिन मक्का वाले डरे और घबराए हुए बाहर निकले, उन्हें पता चला था कि अबरहा एक बड़ी फौज लेकर आ रहा है जिसके आगे-आगे एक भारी हाथी चल रहा है, और वह अल्लाह के पवित्र घर काबा को विध्वंस करने के लिए आ रहा है। अबरहा ने अब्दुल मुत्तलिब के कुछ ऊँट पकड़ लिए थे, इसलिए अब्दुल मुत्तलिब ने उससे मिलना चाहा। जब अब्दुल मुत्तलिब ने अबरहा से बात की, तो उससे कहा : तू ने मेरे कुछ ऊँट ले लिए हैं, अत: उन्हें वापस कर दे। अबरहा ने कहा : मैं ने तुझे यह समझा था कि तू मुझ से यह कहने के लिए आया है कि अल्लाह के पवित्र घर को न गिराओ। तो अब्दुल मुत्तलबि ने उसका उत्तर देते हुए कहा : जहाँ तक ऊँटों का मामला है तो मैं उनका मालिक हूँ, और काबा के घर का एक मालिक है, जो उसकी रक्षा करेगा।

अबरहा का काबा को विध्वंस करने का मक़सद लोगों को उससे विचलित करना था, ताकि वे उस चर्च की ओर तीर्थ यात्रा करें जिसे उसने यमन में बनाया था। मक्का वाले डर के मारे पहाड़ों पर चले गए। अबरहा ने अपनी फौज के साथ प्रवेश किया, और उसके साथ एक बड़ा हाथी था, वह काबा को गिराने के लिए उसकी ओर बढ़ा, लेकिन अल्लाह ने हाथी को आदेश दिया कि वह अपने स्थान से न हिले, चुनाँचे हाथी बैठ गया। लोग उसे मारते थे, लेकिन वह अपने स्थान से हिलने के लिए तैयार न हुआ। अल्लाह ने छोट छोटे पक्षि भेजे जो अपने पैरों में आग की कंकरियाँ उठाए हुए थे, वे अबरहा की फौज को क़त्ल कर रहे थे।  इस तरह अल्लाह ने बैतुल हराम को विध्वंस से बचा लिया।

 पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जन्म की कहानी

हाथी की घटना के वर्ष ही, सोमवार के दिन, रबीउल अव्वल के बारहवें दिन 571 र्इ. में, अबू लहब की लौंडी सुवैबा असलमिया जल्दी से अपने मालिक के पास गर्इ और उसे उसके भतीजे के जन्म की शुभसूचना दी, जिस पर वह बहुत प्रसन्न हुआ और उसे आज़ाद कर दिया।[1]

अब्दुर्रहमान बिन औफ की माँ शिफा बिन्त औफ बिन अल-हारिस ने अबू तालिब के घर में पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को जनवाने का कार्य संभाला।

 पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का नामकरण

आमिना ने आपके दादा को पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जन्म का संदेश भिजवाया, तो उन्हों ने आकाश की ओर देखा और अल्लाह तआला के प्रति आभार प्रकट किया। फिर वह आपके पास आए, उन्हें अपनी गोद में उठाया और काबा की ओर गए। उन्हें लेकर काबा के अंदर गए, अल्लाह तआला का शुक्र अदा किया और नवजात शिशु के लिए अल्लाह तआला से बरकत की दुआ की। फिर उन्हें लेकर बाहर निकले ताकि उन्हें उनकी माँ के पास वापस कर दें।

जन्म के सातवें दिन अब्दुल मुत्तलिब ने उनका खत्ना किया, और उनके लिए भोज तैयार किया और लोगों को उस पर आमंत्रित किया, और आपका नाम मुहम्मद रखा।

जब काबा के पास क़ुरैश ने अब्दुल मुत्तलिब से पूछा कि : आप ने इसका नाम अपने गोत्र के नामों के समान क्यों नहीं रखा, इसका नाम मुहम्मद क्यों रखा ?

तो उन्हों ने उत्तर दिया : मैं चाहता हूँ कि अल्लाह इनकी आकाश में प्रशंसा करे और लोग धरती पर इनकी प्रशंसा करें।

 पैगंबर के दूध पीने (स्तनपान) की कहानी

अरबों की यह आदत थी कि वे दूध पीने की आयु में अपने बच्चों को दीहात में भेज दिया करते थे, क्योंकि दीहात की हवा सबसे अच्छी और वातावरण सबसे शुद्ध होता है, तथा दीहात के वासियों की ज़ुबान और भाषण बहुत वाक्पटु होती है।

बनू सअद के गोत्र से महिलाओं का एक समूह निकला, जिनमें से एक हलीमा सादिया भी थीं, वह अपने पति और एक दूध पीते बच्चे के साथ अपनी एक गधी पर सवार होकर निकलीं, तथा उनके साथ एक बूढ़ी ऊँटनी भी थी। यह एक सूखे के वर्ष की घटना है। हलीमा की गधी इतनी कमज़ोर थी कि वह काफिला में सबसे पीछे रहती थीं।

जब बनू सअद की औरतें मक्का मुकर्रमा पहुँचीं, तो हर एक ने अपने लिए किसी दूध पीने वाले बच्चे को तलाश करना शुरू कर दिया, और उनकी आशा होती थी कि उसका बाप धनवान हो, ताकि वह उसे ढेर सारा पैसा दे। अल्लाह तआला का करना ऐसा हुआ कि हर औरत को एक दूध पीने वाला बच्चा मिल गया। और जब उन पर और उनके पति पर अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को पेश किया गया तो उन्हों ने आप से बहुत प्यार किया।

 पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की प्रथम बरकतें

हलीमा को पता था कि आप अनाथ हैं, लेकिन उनका दिल इस दूध पीने वाले बच्चे से लग गया। उन्हों ने इसे ले लिया और अल्लाह से उम्मीद लगार्इ कि उसके अंदर बरकत पैदा हो जाए। उन्हों ने अपने पति से कहा : मैं अब्दुल्लाह के बेटे मुहम्मद को ले लूँगी, आशा है कि उसमें हमारे लिए बरकत हो। इस पर उनके पति ने कहा : हाँ ऐ हलीमा, तुम उसे ले लो, अल्लाह की क़सम! मुझे आशा है कि अल्लाह हमें उसके कारण हलाल रोज़ी, और अपनी ओर से बरकत प्रदान करेगा।

हलीमा ने पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को ले लिया और इस पर उन्हें बहुत सौभाग्य प्राप्त हुआ। उन्हों ने आप को अपने सीने पर रखा ही था, कि उनकी छाती दूध से भर गर्इ, चुनाँचे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उससे दूध पीना शुरू कर दिया यहाँ तक कि आपका पेट भर गया, फिर हलीमा ने अपने बच्चे को लेकर उसे दूध पिलाया। तो यह अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की पहली बरकत थी। तथा हलीमा ने अपने पति की ओर देखा और उन्हों ने हलीमा की तरफ देखा और देानों अल्लाह का गुणगान करने लगे, क्योंकि वे दोनों जिस चीज़ की आशा लगा रहे थे, वह पूरी हो गर्इ थी। तो यह रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की पहली बरकत है।

 नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की बरकतें

हलीमा कहती हैं : मेरी सहेलियों में से मेरे अलावा कोर्इ भी नहीं बची थी जिसने किसी बच्चे को न ले लिया हो। अतः मैं ने नापसंद किया कि मैं बिना किसी को लिए ही वापस लौटूँ। अतएव, मैं ने अपने पति से कहा : अल्लाह की क़सम ! मैं उस अनाथ के पास जाऊँगी और उसे ले लूँगी। वह कहती हैं कि मैं उसके पास आर्इ और उसे ले लिया, और उसे लेकर अपनी सवारी के पास आर्इ, तो मेरे पति ने कहा : तुम ने उसे ले लिया ? मैं ने कहाः हाँ, अल्लाह की क़सम! उसने कहा : आशा है कि उसमें बरकत हो। मैं ने उसे ले लिया और उसे लेकर मुझे बहुत सौभाग्य प्राप्त हुआ। आपके ऊपर उनका स्तन जितना अल्लाह ने चाहा दूध से भर गया, आप ने दूध पिया यहाँ तक कि तृप्त होकर उसे छोड़ दिया, तो यह पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की प्रथम बरकत थी। जब प्रस्थान करने का समय आगया, और हलीमा सादिया पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की माँ आमिना बिन्त वहब को विदार्इ देकर, अपनी गधी पर सवार होने के लिए आर्इं तो क्या देखती हैं कि गधी तेज़ी से चलने लगी। बनू सअद की औरतों ने इस चीज़ को महसूस किया, वे कहने लगीं : हे अबू ज़ुवैब की बेटी! क्या यह तेरी वही कमज़ोर गधी नहीं है ?! तो उन्हों ने कहा : क्यों नहीं ! किन्तु यह मेरे दूध पीते बच्चे के कारण है। तो यह पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की दूसरी बरकत थी। तथा एक कमज़ोर बकरी को दूहते समय उनके पति ने अचानक यह देखा कि वह उस दूधपीते बच्चे की बरकत से बहुत अधिक दूध देती है। यह नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की तीसरी बरकत थी।

पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बनू सअद में पूरे दो वर्ष रहे।

 सैयिदा हलीमा का अल्लाह के पैगंबर से लगाव

फिर हलीमा पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की माँ आमिना के पास यह अनुमति लेने के लिए गर्इं कि वह मुहम्मद को जवान और बड़ा होने तक उनके पास ही रहने दें। जब आमिना ने पूछा: ऐ हलीमा! तुम क्यों चाहती हो कि मुहम्मद तुम्हारे पास रहें ? तो उन्हों ने कहा : अल्लाह की क़सम! मैं ने जब से मुहम्मद को आप से लिया है, उनसे बहुत प्यार करती हूँ, और जब से हम उन्हें ले गए हैं निरंतर अल्लाह की बरकतें हमारे ऊपर उतर रही हैं। तो आमिना ने कहा : अल्लाह की क़सम! मेरे इसे बेटे का एक महत्वपूर्ण मामला होगा, अत: ऐ हलीमा इनकी रक्षा करना। तो उन्हों ने कहा : ऐ महोदया! आप मत डरें, मुहम्मद मेरी आँखों में हैं।

हलीमा सादिया मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को लेकर खुशी-खुशी वापस लौटीं। क्योंकि अन्य दूसरे वर्षों के लिए भी बरकत उनके साथ रहेगी। जब पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जवान हो गए, तो हलीमा सादिया की बकरियों को चराने के लिए बाहर निकलने लगे, और जब भी आप किसी जगह उतरते, तो वहाँ बहुत अधिक घास पाते, इसलिए औरतें अपने बच्चों से कहती थीं : तुम उसी जगह चराओ, जहाँ हलीमा सादिया का चरवाहा चराता है, क्योंकि वे पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की बरकतें देखती थीं।

 सीना चाक किए जाने की कहानी

एक दिन पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हलीमा सादिया के बेटे के साथ बकरियाँ चराने के लिए निकले, कि दो महान आदमी आते हैं और वे दोनों अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को ले कर जाते हैं और आपको सुलाकर आपके सीने को चीरते हैं। आपके दूध पीते भार्इ निकट से ही इस दृश्य को देख रहे थे जो आपके साथ घटित हो रहा था, चुनाँचे उन्हें आपके ऊपर भय महसूस हुआ और वह दौड़ते हुए अपनी माँ के पास आए ताकि उन्हें वह चीज़ बतलाएं जो उन्हों ने देखा था।

हलीमा सादियाँ जल्दी से उस जगह आयीं जहाँ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बकरी चरा रहे थे, और वह यह देखकर आश्चर्यचकित रह गर्इं कि आप कुशल मंगल और सुरक्षित हैं, किंतु आपके चेहरे पर पीलापन था, तो उन्हों ने आपसे उसके बारे में पूछा जो घटित हुआ था। तो आप ने उनसे पूरी कहानी बयान की, तो उन्हों ने आपको अपने सीने से चिमटा लिया और आपके ऊपर भय महसूस किया। अत: वह आपको लेकर सैयिदा आमिना के पास आर्इं ताकि आपके साथ जो कुछ घटित हुआ था उसके बारे में उन्हें बतलायें। तो सैयिदा आमिना ने उन्हें आश्वासन दिया, और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम एक बार फिर बनू सअद के दीहात में वापस लौट आये।

 अब्दुल मुत्तलिब की किफालत की कहानी

सीना चाक किए जाने की घटना के बाद, पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बनू सअद में अधिक दिन तक नहीं ठहरे, बल्कि अपनी माँ आमिना के पास लौट आए, ताकि उनके प्यार से लाभान्वित हों, तथा वह आपके अनाथपन की छतिपूर्ति करने की कोशिश करती थीं।

आमिना ने अपने पति अब्दुल्लाह को याद किया, और अपने बेटे मुहम्मद के साथ उनकी क़ब्र की ज़ियारत करने का इरादा किया। चुनाँचे उन्हों ने यसरिब (मदीना मुनव्वरा) की ओर यात्रा की, और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के दादा के ननिहाल बनू नज्जार के पास नाबिग़ा के घर पर उतरीं, और वहाँ एक महीना ठहरीं। जब यहूदियों ने मुहम्मद को देखा, तो उन्हों ने पहचान लिया कि आप इस उम्मत के नबी हैं, और कहा : यह इस उम्मत के नबी हैं और यसरिब ही वह नगरी है जिसकी ओर वह हिजरत करेंगे। तो आमिना को आपके ऊपर डर महसूस हुआ। अत: वह आपको लेकर वापस लौटीं, उनके साथ उम्मे ऐमन भी थीं, और इन्हों ने ही आमिना को यहूद जो कुछ कहते थे उसके बारे में सूचना दी थी। मक्का आते हुए रास्ते में आमिना बीमार हो गर्इं, और वहीं उनकी मृत्यु हो गर्इ, और अबवा नामी स्थान पर दफन कर दी गर्इं। पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की दाया उम्म ऐमन आपको लेकर मक्का आयीं और आप अपने दादा अब्दुल मुत्तलिब की किफालत (देखरेख) में आगए।  


[1] किसी भी सही सू़त्र से यह बात प्रमाणित नहीं है कि अबू लहब नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जन्म पर खुश हुआ, या सुवैबा ने अबू लहब को पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जन्म की शुभसूचना दी, या यह कि अबू लहब ने सुवैबा को नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जन्म की शुभसूचना देने की वजह से आज़ाद कर दिया। बल्कि इसके विपरीत सही सूत्रों से यह बात प्रमाणित है कि सुवैबा को नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के मदीना की तरफ हिजरत करने के बाद आज़ाद किया गया था, जैसाकि इब्ने सअद ने अत्तबक़ात (1/108, 109) में और इब्ने हजर ने अल-इस्तीआब (1/12) में उल्लेख किया है। (अनुवादक)

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