वैज्ञानिक श्रेणियाँ

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    हृदय का आनन्द और हर्ष व उल्लास, शोक और चिन्ता-मुक्ति प्रत्येक मनुष्य का लक्ष्य और उद्देश्य है। इसी के द्वारा सुखित और शुभ जीवन प्राप्त होता है, तथा आनन्द और प्रसन्नता सम्पूर्ण होती है। इस के कुछ धार्मिक कारण, कुछ प्राकृतिक कारण और कुछ व्यवहारिक कारण हैं। इस पुस्तक में इन्हीं कारणों का उल्लेख है।

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    एक आदमी के दिल में अल्लाह अज़्ज़ा व जल्ल के बारें में शैतान भयानक वस्वसे डालता रहता है, और वह इस से भयभीत है, ऐसी स्थिति में उसे क्या करना चाहिए?

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    इस्लाम के शत्रु निरंतर यह राग अलापते रहे हैं कि इस्लाम ने महिलाओं पर अत्याचार किया है और उन्हें उनके अधिकारों से वंचित कर दिया है। किन्तु यह मिथ्यारोप अतिशीघ्र ही निराधार होकर धराशायी हो जाता है जब हम इस बात से अवगत होते हैं कि इस्लाम ने किस प्रकार महिलाओं को सम्मान प्रदान किया है? समस्त परिस्थितियों में उन के साथ न्याय किया है और उन्हें वो अधिकार प्रदान किये हैं जिनकी वह इस से पूर्व कल्पना भी नहीं कर सकती थी। वास्तविकता यह है कि स्वयं नारी की स्वतंत्रता अधिकारों का आहवान करने वालों ने उसका अपमान किया है। इस वीडियो में इस्लाम के निकट विभिन्न छेत्रों में नारी के अधिकारों का उल्लेख किया गया है।

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    दंपती के बीच विवादः दंपती के बीच विवाद अपरिहार्य है, और शायद ही कोई घर है जो इससे खाली हो। लेकिन इस विवाद के कारणों और कारकों को समझकर इन मतभेदों का उचित समाधान खोजना, वैवाहिक किंगडम के अस्तित्व को सुनिश्चित करने के लिए सबसे सुरक्षित तरीका है। इस प्रवचन में, दंपती के बीच विवाद के कुछ कारणों और उनके शरई समाधान, तथा वैवाहिक विवाद से निपटने के लिए कुछ सुझावों का वर्णन किया गया है।

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    आदरणीय शैख मुहम्मद बिन सालेह अल-उसैमीन रहिमहुल्लाह से प्रश्न किया गया किः मेरी एक पत्नी है जिसने हज्ज नहीं किया है, तो क्या मेरे ऊपर अनिवार्य है कि मैं उसे हज्ज कराऊँ? और क्या हज्ज में उसका खर्च मेरे ऊपर अनिवार्य है? और अगर वह मेरे ऊपर अनिवार्य नहीं है तो क्या उससे समाप्त हो जायेगा?

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    हमने सुना है कि ऐसी मान्यताएं पाई जाती हैं जिसका आशय यह है कि सफर के महीने में शादी, खतना और इसके समान अन्य चीज़ें करना जायज़ नहीं है। कृपया हमें इस बारे में इस्लामी क़ानून के अनुसार अवगत कराएं। अल्लाह आप की रक्षा करे।

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    नवजात शिशु का आगमन मनुष्य के लिए एक अपार खुशी का अवसर होता है। इस अवसर को लोग अपनी-अपनी परंपराओं और रीतियों के अनुरूप विभिन्न प्रकार से मनाते और हर्ष व उल्लास का प्रदर्शन करते हैं। इस्लाम धर्म में नवजात शिशु के विशेष प्रावधान हैं, जिनमें से एक यह है कि जिस व्यक्ति को अल्लाह ने इस नेमत से सम्मानित किया है, वह अल्लाह के प्रति आभार प्रकट करते हुए उसकी निकटता के तौर पर अक़ीक़ा करे। अक़ीक़ा के क्या प्रावधान हैं ? उसके कौन-कौनसे मुद्दे हैं ? तथा इसी विषय से संबंधित अन्य महत्वपूर्ण बातें इस पुस्तिका में प्रस्तुत की गई हैं।

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    पर्दा सर्वप्रथम अल्लाह की उपासना है, जिसे अल्लाह ने अपनी व्यापक व अपार तत्वदर्शिता से औरतों पर अनिवार्य कर दिया है। पर्दा नारी के लिए पवित्रता, शालीनता और सभ्यता का प्रतीक, तथा उसके सतीत्व व मर्यादा का रक्षक है। पर्दा वास्तव में नारी के लिए प्रतिष्ठा और सम्मान का पात्र है। यह उसकी व्यक्तगत स्वतंत्रता के विरूद्ध या उसके विकास में रुकावट अथवा उसके लिए कलंक नहीं है, जैसाकि इस्लाम की शिक्षाओं और उसकी तत्वदर्शिता से अनभिग लोग तथा पक्षपाती एवं दोहरे मापदंड वाली मीडिया ऐसा दर्शाने की कुप्रयास करती रहती है। प्रस्तुत लेख में इस्लाम के निकट पर्दा की वास्तविकता, उसकी तत्वदर्शिता व रहस्य, उसके उद्देश्य और अच्छे परिणाम का उल्लेख किया गया है। इसी तरह आज के गैर-इस्लामी समाज की दुर्दशा और भयावह आँकड़े को प्रस्तुत करते हुए उन्हें इस्लामी जीवनशैली की प्रतिष्ठा की झलक दिखाकर उससे लाभान्वित होने का आमंत्रण दिया गया है।

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    इस्लाम धर्म की गुणों और विशेषताओं में से एक महत्वपूर्ण तत्व यह है कि उसने हर उस चीज़ से मनाही की है और उस पर कड़ी चेतावनी दी है, जिससे मानव के शरीर, स्वास्थ्य, बुद्धि और धन को छति और हानि पहुँचती है। शराब और सामान्यतः मादक पदार्थों का सेवन उनमें से एक है। शराब को इस्लाम ने बुराईयों की जननी घोषित किया है और उसे हर दुष्ट कार्य की कुंजी माना है। वास्तविकता भी यही है ; मेडिकल साइंस इसकी पुष्टि करती है और वस्तुस्थिति इसकी साक्ष्य है। प्रस्तुत लेख में इस तथ्य से रु-ब-रु कराने का सुप्रयास किया गया है।

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    अपने बच्चे को पैगंबर की कहानी सुनायें: इस पुस्तिका में हमारे प्रिय पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के बचपन से संबंधित कहानियों का एक समूह प्रस्तुत किया गया है, जिन्हें बच्चों को सुनाना उचित है।. इस पुस्तिका में हमारे प्रिय पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की किशोरावस्था से संबंधित कहानियों का एक समूह प्रस्तुत किया गया है, जो बच्चों को सुनाना उचित है।.

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    क्या यह बात जाइज़ है कि ‘‘फेसबुक” पर मुसलमान आदमी का खाता ग़ैर मह्रम महिलाओं के नामों पर आधारित हो और यह मात्र अल्लाह सर्वशक्तिमान के धर्म की ओर आमंत्रण देने के उद्देश्य से है ? हमें इस बात से अवगत करायें, अल्लाह तआला आप को लाभ प्रदान करे और आप को बेहतरीन बदला दे।

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    मैं सोलह साल की एक लड़की हूँ, और एक ऐसे परिवार से हूँ जो धर्म के प्रति प्रतिबद्ध नहीं हैं, मैं एक अकेली हूँ जो नमाज़ पढ़ती हूँ और इस्लाम की शिक्षाओं का पालन करने का प्रयास करती हूं, इसीलिए मुझे बहुत सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, उन्हीं में से यह है कि मेरी माँ मुझे इशा और फज्र की नमाज़ पढ़ने से रोकती है और कहती है कि वे दोनों अनुचित समय में हैं !! इसके बावजूद मैं उन्हें चुपके से पढ़ लेती हूं, और यदि वह मुझसे आकर पूछती है तो मैं कहती हूँ कि: मैं ने नमाज़ नहीं पढ़ी . . . ! तो इस बारे में शरीअत का प्रावधान क्या है ॽ क्या मेरे लिए ऐसी स्थिति में झूठ बोलना जइज़ है ॽ तथा मैं पिज़्ज़ा रेस्तरां में काम करता थी और यह रेस्तरां सूअर बेचता था इसलिए मैं ने उसे छोड़ दिया, और जब उसने मुझसे पूछा तो मैं ने उससे कहा कि उन्हों ने मुझे निकाल दिया है, तो इस स्थिति में भी शरीअत का दृश्य क्या है ॽ एक दूसरा मुद्दा यह है कि मैं अपनी माँ के साथ ट्रेन से एक दूसरे शहर का सफर करने वाली हूँ और ज़ुहर और अस्र की नमाज़ का समय ट्रेन ही में हो जायेगा, और उस समय मेरे लिए उनकी अदायगी करना संभव न होगा, तो फिर क्या करना होगा ॽ मैं ने सुना है कि नमाज़ों को एकत्र करके पढ़ना जाइज़ है, लेकिन मुझे नहीं पता कि कैसे . . .! क्या इसका मतलब यह है कि मेरे लिए ज़ुहर और अस्र की नमाज़ ज़ुहर की नमाज़ के समय पढ़ना संभव है, और इसे कैसे पढ़ा जायेगा ॽ यह बात निश्चित है कि मैं इशा और फज्र की नमाज़ भी पढ़ने पर सक्षम नहीं हूँगी क्योंकि मेरी माँ मेरे साथ होगी, तो फिर क्या करूँ ॽ क्या दूसरे समय में नमाज़ों की क़जा की जायेगी, और कैसे ॽ इसके अलावा, मेरी माँ मुझे हिजाब पहनने से भी रोकती है, और इस बात पर ज़ोर देती है कि मैं ऐसा पोशाक पहनूँ जो उस समाज और वातावरण के अनुकूल हो जिसमें मैं रहती हूँ, उदाहरण के तौर पर गर्मियों में मुझे छोटे कपड़े पहनने पर मजबूर करती है, और कहती है कि सूरज त्वचा के लिए उपयोगी है . . इन सब के बावजूद, मैं इन दबावों का विरोध करती हूँ, और यथा संभव शालीनता अपनाने का प्रयास करती हूँ, . . लेकिन मैं वास्तव में उस समय उदास और दुखी होती हूँ जब मैं अपनी माँ को देखती हूँ कि वह मुझसे गुस्सा करती है, लेकिन मैं भी अपने धर्म के सिद्धांतों को त्याग नहीं कर सकती, तो क्या आप कोई नसीहत करेंगेॽ

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    प्रश्न: उस आदमी के बारे में आप का क्या विचार है जो कहता है: चोर का हाथ काटना और महिला की गवाही को पुरूष की गवाही के आधा करार देना, क्रूरता और नारी के अधिकार को हड़प करना है ॽ

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    मैं एक अवधि से इस्लाम को व्यवहार में ला रही हूँ और यदि अल्लाह ने चाहा तो मैं उसे स्वीकार करने की इच्छा रखती हूँ, लेकिन मुझे कुछ खतरनाक समस्याओं का सामना है। मैं और मेरे पति एक अवधि से वैवाहिक समस्याओं से जूझ रहे हैं, बावजूद इसके कि मामला ठीक ठाक चल रहा है किंतु मै सुनिश्चित नहीं हूँ कि स्थिति सदा इसी तरह बनी रहेगी क्योंकि उसे सख्त क्रोध के दौरे पड़ते हैं, और जब से हमारे वकील ने मुझे इसकी सलाह दी है, मैं गंभीरता से उससे अलग होने के बारे में सोच रही हूँ। समस्या यह है कि अब मुझे उससे प्यार नहीं है, इसके अलावा वह मुझे इस्लाम स्वीकारने से रोकता है तथा वह स्वयं भी इस्लाम स्वीकार करने से इनकार करता है, और उसका कहना है कि वह मेरे इस्लाम क़बूल करने पर हमारे अलग हो जाने को प्राथमिकता देगा। दूसरी समस्या यह है कि मेरे पास दो बेटियाँ हैं जो एक हिंदू स्कूल में पढ़ रही हैं, तो मेरे इस्लाम में प्रवेश करने के बाद उन दोनों से संबंधित शरीअत का हुक्म (प्रावधान) क्या है। मेरी मुलाक़ात एक मुसलमान व्यक्ति से हुई है जिससे मैं प्यार करती हूँ और वह भी मुझे बहुत प्यार करता है, वह मुझसे दो बार शादी करने का अनुरोध कर चुका है, ज्ञात रहे कि मैं उसके साथ नहीं सेती हूँ और न ही इसतरह की कोई चीज़ मेरे दिल में है। और वह मेरी दोनों बेटियों को स्वीकार करने के लिए तैयार है यदि वे दोनों भी इस्लाम में प्रवेश कर लेती हैं। उसने कहा है कि वह साल के अंत तक प्रतीक्षा करेगा उसके बाद वह अपने मामले में व्यस्त हो जायेगा, क्योंकि कुछ अन्य महिलाएं भी हैं जिनके साथ वह घर बसा सकता है, परंतु वह मुझे उनपर प्राथमिकता देता है। मुझे बहुत सी चीज़ों के अंदर अपने मामले में सावधानी और दूरदर्शिता से काम लेने की आवश्यकता है, इसके होते हुए भी में अपने पति के प्रति खेद और पाप का आभास करती हूँ, क्योंकि वह हमारे विवाह को सफल बनाने की चेष्टा करता है। लेकिन खेद की बात यह हैं कि धर्म बहुत बड़ी रूकावट बनता है।

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    क्या मुझे ठहर जाना चाहिए और इस बात की कोशिश नहीं करनी चाहिए कि मेरे बच्चे पैदा हूँ, क्योंकि मुझे डर है कि अल्लाह तआला मुझे जो बच्चे देगा मैं उन के लिए परिवार में एक इस्लामी वातावरण (माहौल) उपलब्ध नहीं कर सकूंगा ? मेरे ऊपर पिछले ऋण हैं जिन्हें मैं चुका रहा हूँ, उस पर जो सूद बढ़ता है वह अतिरिक्त है। मैं सोचता हूँ कि मेरे लिए उपयुक्त यह है कि बच्चे पैदा करने से रूका रहूँ यहाँ तक कि मैं क़र्ज़ का भुगतान कर दूँ। तो इस विषय में आप के क्या विचार हैं ?

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    मेरे पति मुझसे बहुत बड़े हैं जिसका मतलब यह होता है कि हो सकता है वह मुझसे पहले मर जाएं। यह मात्र मेरी धारणा है इस एतिबार से कि मैं ऐसे परिवार से हूँ जिनकी आयू लंबी होती है, अर्थात मेरे परिवार के लोग आमतौर पर लंबे समय तक जीते हैं। यही चीज़ है जो मुझे, अपने और उसके बीच उम्र के अंतर को देखते हुए, इस धारणा पर उभारती है। हालांकि पति की मौत अपने आप में एक आपदा है, परंतु मैं एक दूसरी चीज़ के बारे में सोच रही हूँ और वह यह कि यदि उसकी मृत्यु हो गई तो मेरा क्या होगा और मैं कहाँ रहूँगी . . ! इस समय जिस घर में हम रह रहे हैं वह एक छोटा सा घर है, इसके बावजूद वह उसके सभी रिश्तेदारों के बीच विभाजित हो सकता है। यह बात सही है कि वह इस समय मेरा बहुत ही ध्यान रखता है, लेकिन उसके मरने पर जो हिस्सा पत्नी का उसके पति की मृत्यु के बाद होता है वह घर खरीदने के लिए काफी नहीं होगा, यहाँ तक कि वह माल जो उसने मुझे शादी के समय महर के तौर पर दिया था वह केवल चंद गिने चुने दिनों के लिए काफी होगा। तथा मैं अपने परिवार वालों की वारिस नहीं हो सकती हूँ क्योंकि वे सभी ग़ैर-मुस्लिम हैं। मैं ने गंभीरता के साथ अगले दस या पंद्रह साल तक के लिए बच्चे पैदा करने से रूक जाने के बारे में सोचना शुरू कर दिया है (अभी तक उससे मेरे कोई बच्चा नहीं है), मैं इन सालों में काम करने के लिए जाऊँगी और धन एकत्र करूँगी ताकि अपना अलग घर खरीद सकूँ, फिर यदि मेरे बच्चे पैदा होते हैं और मेरे पति की मृत्यु हो जाती है तो वह एक शरणस्थल (आश्रय) हो जो मेरी और मेरे बच्चों की परागंदगी को एकत्र कर दे, इस बात से बेहतर है कि हम सड़क पर या दूसरों पर बोझ बनकर ज़िंदगी बितायें। लेकिन यहाँ पर एक दूसरी समस्या भी है और वह यह कि यदि मैं ऐसा करती हूँ तो इसका मतलब यह होगा कि हो सकता है कि मेरे पति उर्वरता और प्रजनन के चरण को पार कर जायें। तो इस बारे में आपका विचार क्या है ॽ

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    कुछ महीने हुए एक युवा के साथ मेरी शादी हुई है जो एक नास्तिक देश में रहता है, और यह तथ्य कि उसने अपने परिवार, जो कि एक सभ्य और खुला परिवार है, के विरोध के बावजूद मेरे नक़ाब पहनने के विचार को स्वीकार कर लिया, मुझे प्रभावित करता है और वह मेरी दृष्टि में बहुत बड़ा बन गया है। जहाँ तक उसकी बात है तो वह समय बीतने के साथ धार्मिकता को और अधिक पसंद करने लगा और इस बात पर अल्लाह का गुणगान करता है कि उसे एक दीनदार (धर्मनिष्ठ) पत्नी प्रदान की, और मैं यह महसूस करने लगी कि मुझे कामयाब जोड़ी मिल गई। लेकनि मुझे प्रतीक हुआ कि वह मेरे काम करने के विषय पर ज़ोर देता है, वह मुझसे चाहता है कि मैं काम करने के लिए बाहर निकलूँ और कुछ पैसा कमाऊँ ताकि उसकी मदद कर सकूँ। वह कहता है कि वह आर्थिक रूप से स्थिर नहीं है और उसे मदद की आवश्यकता है, शायद वह अप्रत्यक्ष रूप से यह संकेत दे रहा है कि मैं अपने पिता को जो कि एक अमीर आदमी हैं, बताऊँ कि वह हमारी सहायता करें। यह बात कल्पना में भी नहीं थी, क्योंकि मैं एक ऐसी औरत हूँ कि घर पर रहना चाहती हूँ ताकि अपनी वैवाहिक जीवन और घर के मामलों की देखभाल करूँ, और मैं ने कई बार उस के साथ इस मुद्दे पर बात की है कि यह मेरे लिए किसी भी तरह उचित नहीं है, लेकिन वह मेरी बात को गंभीरता से नहीं लेता है, जिसकी वजह से मैं इस संबंध में अपने पिता से बात करने पर मजबूर हो गई ताकि वह हमारे लिए इसका समाधान खोजें। यह मुद्दा मुझे बहुत परेशान कर रहा है, और मैं इन सब का अंत करना चाहती हूँ। इसलिए मैं ने इस शादी के अनुबंध को रद्द करने अर्थात तलाक़ के बारे में सोचा है। लेकिन मुझे याद आ रहा है कि इस शादी पर सहमत होने से पहले मैं ने इस्तिखारा की नमाज़ पढ़ी थी, तथा मेरे माता पिता उससे और उसके परिवार से प्यार करते हैं, किंतु अब मैं अलग भावना का एहसास करती हूँ, और मै ने पाया है कि हमारे कुछ धार्मिक एवं सांसारिक मुद्दों के समझ से संबंधित हम दोनों के बीच विशाल अंतर पाया जाता है। तो मेरी समझ में नहीं आता कि मैं क्या करूँ ॽ क्या कोई सलाह व नसीहत है ॽ

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    मैं एक युवती हूँ और एक मुस्लिम युवा से शादी के लिए प्रस्तावित हूँ जो मुझे बहुत प्यार करता है और अल्लाह की आज्ञा से हम शादी के बहुत निकट हैं। मेरे मंगेतर ने मेरे ऊपर बहुत ज़्यादा ज़ोर दिया कि मैं उसे दूसरों पुरूषों के साथ अपने पिछले संबंधों के बारे में बताऊँ। तो मैं ने उसे दो संबंधों के बारे में बताया जो दो युवाओं से उस समय स्थापित हुए थे जब मैं केवल 18 वर्ष की थी और उसमें कुछ निषिद्ध काम हुए थे किंतु मैं ने उसे उसके विवरण के बारे में सूचित नहीं किया क्योंकि मैं ने उन हराम कामों से अल्लाह से तौबा (पश्चाताप) कर लिया है, और यह फैसला किया है कि एक नये जीवन का आरंभ करूँ। परंतु मेरे मंगेतर ने उस युवा से एसएमएस के माध्यम से संपर्क कर लिया और उस पुराने मित्र ने उसे सारी कहानी सुना दी। अब मेरा मंगेतर हमारी शादी को इसलिए पूरा करना चाहता है कि तैयारी पहले से हो चुकी है (केवल पाँच दिन रह गए हैं) और परिवार के सभी सदस्य इसके लिए सहमत हैं, तो वह केवल अपने परिवार के सामने अपनी छवि बचाने के लिए इस शादी को संपन्न करना चाहता है, किंतु वह एक समय के बाद मुझे तलाक़ दे देगा। क्या मैं उसे अपने अतीत के सभी विवरण बता दूँ ॽ

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    इस उम्मत पर अल्लाह सर्वशक्तिमान की यह अनुकम्पा और अनुग्रह है कि उसने इसे सबसे अंतिम और सबसे श्रेष्ठ उम्मत बनाया है, तथा इस उम्मत के पैगंबर को समस्त ईश्दूतों और संदेष्टाओं में श्रेष्ठतम और उन सबकी अंतिम कड़ी बनाया है। और आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की मोहब्बत को धर्म क़रार दिया है जिसके द्वारा हम अल्लाह सर्वशक्तिमान की उपासना व आराधना करते हैं, और उसके द्वारा उसकी निकटता चाहते हैं। प्रस्तुत लेख में पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की मोहब्बत पर नफ्स के प्रशिक्षण और पालन पोषण के तरीक़े के बारे में चर्चा किया गया है। साथ ही साथ क़ियामत के दिन पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की शफाअत की प्राप्ति के कुछ कारणों का भी उल्लेख किया गया है।

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