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    यह पुस्तिका सहायक है उन गैर मुस्लिम और मुसलमानों के लिए जो ज्ञान की कमी और मीडिया के गलत प्रचार के कारण इस्लाम को सही तरीक़े से नहीं समझ पाते और संदेहों के शिकार बने रहते हैं। इसी तरह इस पुस्तिका में गैर मुस्लिम और मुसलमानों के ज़ेहन व दिमाग में जो सवाल उठते हैं और उन सवालों के जवाब न तो मुसलमानों को पता होते हैं, और न ही वे गैर मुसलमानों को उन सवालों के जवाब दलील से दे पाते हैं, उन सवालों के जवाबात कुरआन व हदीस के प्रमाणों से दिए गए हैं।

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    आमतौर पर यह समझा जाता है कि इस्लाम 1400 वर्ष पुराना धर्म है, और इसके ‘प्रवर्तक’ पैग़म्बर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हैं। लेकिन वास्तव में इस्लाम उतना ही पुराना जितना धर्ती पर स्वयं मानवजाति का इतिहास है, तथा पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम इसके प्रवर्तक व संस्थापक नहीं, बल्कि इसके आह्वाहक हैं। प्रथम मानव व ईश्दूत आदम अलैहिस्सलाम से लेकर अंतिम पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तक सभी ईश्दूतों और संदेष्टाओं का धर्म इस्लाम ही रहा है। पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम इस श्रृंखला के अंतिम कड़ी हैं। अल्लाह ने आप के हाथों पर इस धर्म को परिपूर्ण और संपन्न कर दिया है। प्रस्तुत लेख में इसी तथ्य का खुलासा करते हुए, इस दुष्प्रचार का खण्डन किया गया है कि इस्लाम के प्रवर्तक मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हैं।

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    प्रश्न: उस आदमी के बारे में आप का क्या विचार है जो कहता है: चोर का हाथ काटना और महिला की गवाही को पुरूष की गवाही के आधा करार देना, क्रूरता और नारी के अधिकार को हड़प करना है ॽ

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    इस लेख में धार्मिक ग्रंथों की रोशनी में सर्वशक्तिमान ईश्वर का सही ज्ञान प्रस्तुत किया गया है और इस ग़लत कल्पना का खंडन किया गया है कि ईश्वर, मानव के मार्गदर्शन के लिए अवतार लेता है। बल्कि वास्तविकता यह है कि ईश्वर मानव मार्गदर्शन के लिए उन्हीं में से एक व्यक्ति को चयन कर लेता है और उस पर अपने आदेश अवतरित करता है जिसे संदेष्टा और ईश्दूत कहा जाता है। तथा इस प्रचलित भ्रम का भी खंडन किया गया है कि इस्लाम के संस्थापक मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हैं।

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    इस पुस्तक में इस्लाम से संबंधित ग़ैर-मुस्लिमों के द्वारा पूछे जाने वाले 20 सामान्य प्रश्नों के प्रमाणों और तर्क के साथ उत्तर दिये गये हैं। यदि एक मुसलमान इन प्रश्नों के उत्तर अच्छी तरह समझ ले और इन्हें अपने दिमाग में बिठा ले, तो वह ग़ैर-मुस्लिमों के मस्तिष्कि में इस्लाम के संबंध में पाई जाने वाली ग़लतफ़हमियों को दूर करने और इस्लाम के प्रति उनके नकारात्मक सोच को बदलने में सफल रहेगा।

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    यह पुस्तिका वास्तव में एक पत्र है जिसे एक नव-मुस्लिम ने अपनी माँ के नाम लिखा है, जिस में उसने अपनी माँ को इस्लाम के वास्तविक संदेश से अवगत कराते हुये यह स्पष्ट किया है कि उसने इस्लाम धर्म क्यों स्वीकार किया है। तथा इस्लाम के बारे में अपनी माँ के अशुद्ध विचारों, ग़लतफह्मियों और आशंकाओं का निवारण किया है।

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