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आवधिक अवसर

यह फ़ाइल मौसमी सामग्रियों पर आधारित समूहों को शामिल है। जैसेः • रमजान की फाइलें • शव्वाल के महीने की फाइलें • हज्ज और उम्रा की फाइलें • आशूरा और अल्लाह के महीने मुहर्रम की फाइल • रजब के महीने और इस्रा व मेराज की फाइल • शाबान के महीने की फ़ाइल • क्रिसमस और गैर मुस्लिमों के त्योहारों को मनाने के प्रावधान की फाइल • झूठ और अप्रेल फूल की फाइल • वेलेंटाइन डे की फाइल •अवकाश और उससे लाभान्वित होने के तरीक़े की फाइल •दस ज़ुल-हिज्जा, क़ुर्बानी और अक़ीक़ा की फ़ाइल

आइटम्स की संख्या: 47

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    साइट इस्लाम प्रश्न और उत्तर से यह प्रश्न किया गया किः क्या मुहर्रम के महीने के समान सफर के महीने की भी कोई विशेषता है? आशा है कि इस पर विस्तार के साथ प्रकाश डालेंगे। तथा मैं ने कुछ लोगों से सुना है कि वे इस महीने से अपशकुन लेते हैं, तो इसका क्या कारण है?

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    शबे-बरात की वास्तविकता : वर्तमान समय में मुसलमानों के अंदर बिदनतों का बाहुल्य और भरमार है, जिनके दुष्ट परिणाम उनके जीवन में जगज़ाहिर हैं, जबकि परलोक में उन्हें कठोर अपमान, तिरस्कार और ह़ौज़े-कौसर से निराशा का सामना करना होगा। मुसलमानो में बिदअतों के प्रचलन के कुछ कारण हैं। इस आडियो में कुछ कारणों का उल्लेख करते हुए शाबान के महीने में प्रचलित एक निंदित बिदअत शबे-बरात की हक़ीक़त का खुलासा किया गया है।

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    मीलादुन्नबी - कब और कैसी? : प्रस्तुत वीडियो में पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जन्म दिवस का उत्सव मनाने का धार्मिके प्रावधान उल्लेख करते हुए यह वर्णन किया गया है कि स्वयं पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के समयकाल, आपके खुलफा-ए-राशेदीन के समयकाल तथा उसके बाद की सर्वश्रेष्ठ शताब्दियों में किसी प्रकार का कोई मालीदुन्नबी उत्सव नहीं मनाया गया। सबसे पहले जिन लोगों ने इसका ईजाद किया वे मिस्र में उबैदी (फातिमी शीया) थे। और सुन्नियों में इस नवाचार को फैलाने वाला इर्बिल का शासक शाह मुज़फ्फर था। इसी प्रकार इसको मनाने और इसे वैध समझने वाले लोग जिन प्रमाणों का सहारा लेते हैं उनका विश्लेशण करते हुए उनका उत्तर दिया गया है और उनके कुछ सन्देहों का चर्चाकर उनका खण्डन किया गया है।

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    सफर के महीने की बिदअतें : प्रस्तुत वीडियो में सफर के महीने में अरबो के अंदर पाई जाने वाली बुराईयों ; सफर के महीने से अपशकुन लेने, तथा उसे आगे और पीछे कर उसमें खिलवाड़ करने, का उल्लेख किया गया है। इसी तरह, इस्लाम के अनुयायियों के यहाँ इस महीने के अंदर पाये जाने वाले नवाचार (बिद्अतों) और भ्रष्ट मान्यताओं का वर्णन और खण्डन करते हुए, इस महीने के अंदर नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जीवन में घटित होने वाली कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं का उल्लेख किया गया है।

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    मुहर्रम के महीने के प्रावधानः इअल्लाह का महीना मुहर्रमुल-हराम एक महान और हुर्मत वाला महीना है, जिसे अल्लाह तआला ने आकाश एवं धरती की रचना करने के समय ही से हुर्मत –सम्मान एवं प्रतिष्ठा- वाला घोषित किया है, तथा यह हिज्री-वर्ष का प्रथम महीना है। प्रस्तुत व्याख्यान में इस महीने की विशेषता तथा इस में धर्मसंगत रोज़े का उल्लेख किया गया है। मुहर्रम के महीने के प्रावधानः इअल्लाह का महीना मुहर्रमुल-हराम एक महान और हुर्मत वाला महीना है, जिसे अल्लाह तआला ने आकाश एवं धरती की रचना करने के समय ही से हुर्मत –सम्मान एवं प्रतिष्ठा- वाला घोषित किया है, तथा यह हिज्री-वर्ष का प्रथम महीना है। प्रस्तुत व्याख्यान में इस महीने की विशेषता तथा इस में धर्मसंगत रोज़े का उल्लेख किया गया है। इसी तरह आशूरा के बारे में वर्णित कमज़ोर व मनगढ़त हदीसों पर चेतावनी दी गई है।

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    पंद्रहवीं शाबान की रात का जश्न मनाने का हुक्म : इस लेख में पंद्रहवीं शाबान की रात का जश्न मनाने का इतिहास, इस कार्य का हुक्म,तथा इस नई गढ़ ली गई बिदअत के बारे में विद्वानों के कथनों का उल्लेख किया गया है।

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    इस वीडियो में उल्लेख किया गया है कि शाबान के महीने की क्या फज़ीलत है, नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम विशिष्ट रूप से इस महीने में क्या कार्य करते थे, तथा पंद्रहवीं शाबान की रात को जश्न मनाने और उसमें हज़ारी नमाज़ पढ़ने, विशिष्ट इबादतें करने, उस दिन रोज़ा रखने, तथा आधे शाबान के बाद रोज़ा रखने, रमज़ान से एक-दो दिन पूर्व रोज़ा रखने और शक्क के दिन रोज़ा रखने के अह्काम स्पष्ट किए गए हैं।

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    वर्तमान समय में कुछ मुसलमानों के बीच प्रचलित बिदअतों में से एक घृणित बिदअत : पंद्रह शाबान की रात का जश्न मनाना है, जिसे अवाम में शबे-बराअत के नाम से जाना जाता है और उसमें अनेक प्रकार की शरीअत के विरुद्ध कार्य किए जाते हैं, जिनके लिए ज़ईफ़ और मनगढ़त हदीसों का सहारा लिया जाता है। इस आडियो में पंद्रह शाबान की रात के बारे में वर्णित हदीसों का चर्चा करते हुए, उनकी हक़ीक़त से पर्दा उठाया गया है।

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    यह शव्वाल के महीने और उसके छः दिनों के रोज़े से संबंधित संक्षिप्त प्रावधान हैं, जिन्हें आदरणीय शैख अब्दुल अज़ीज़ बिन अब्दुल्लाह बिन बाज़ और अल्लामा मुहम्मद बिन सालेह अल-उसैमीन रहिमहुमल्लाह के फतावा संग्रह से चयन कर प्रस्तुत किया गया है।

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    शबें शबे-बराअत की हक़ीक़तः कोई महीना ऐसा नहीं बीतता जिसमें बिदअती और अपनी इच्छाओं के पुजारी लोग धर्म के नाम पर कोई न कोई नवाचार निकालकर अंजाम न देते हों। उन्हीं में से शाबान महीने की पंद्रहवीं रात को विशेष उपासना करना, उसके दिन का रोज़ रखना, हलवा बनाना, और अन्य अवैद्ध कार्य करना व मान्चता रखना इत्यादि शामिल हैं। प्रस्तुत व्याख्यान में, क़ुरआन व हदीस के प्रकाश में इस विषय में वर्णित प्रमाणों का उल्लेख कर उनकी वास्तविकता को स्पष्ट किया गया है, तथा उसके बारे में उठाए जाने वाले संदेहों का उत्तर दिया गया है, और यह बताया गया है कि पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और आपके सहाबा रज़ियल्लाह अन्हुम से इस बाबत कोई चीज़ प्रमाणित नहीं है।

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    हमारे देश में कुछ विद्वानों का भ्रम यह है कि इस्लाम धर्म में एक नफल नमाज़ है जो सफर महीने के अंत में बुध के दिन चाश्त के समय एक सलाम के साथ चार रकअत पढ़ी जाती है जिसमें हर रकअत के अंदर सूरतुल फातिहा, सत्तरह बार सूरतुल कौसर, पचास बार सूरतुल इख्लास, एक-एक बार मुअव्वज़तैन (यानी सूरतुल फलक़ और सूरतुन्नास) एक-एक बार पढ़े, इसी तरह हर रकअत में किया जाए और सलाम फेर दिया जाए। सलाम फेरने के बाद तीन सौ साठ बार यह आयत पढ़ें: ﴿وَاللَّهُ غَالِبٌ عَلَى أَمْرِهِ وَلَكِنَّ أَكْثَرَ النَّاسِ لاَ يَعْلَمُونَ﴾ तथा तीन बार जौहरतुल कमाल (तीजानी पद्वति का एक वज़ीफा) पढ़े, तथा अंत में ﴿سبحان ربك رب العزة عما يصفون وسلام على المرسلين والحمد لله رب العالمين﴾ और गरीबों को कुछ रोटी दान करे। इस आयत की विशेषता उस आपदा को दूर करना है जो सफ़र के महीने के अंतिम बुध को उतरती है। तथा उनका कहना है कि: हर वर्ष तीन लाख बीस हज़ार आपदाएं अवतरित होती हैं और ये सब की सब सफर के महीने की अंतिम बुध को उतरती हैं। इस तरह वह वर्ष का सबसे कठिन दिन होता है। अतः जो व्यक्ति इस नमाज़ को उक्त तरीक़े पर पढ़ेगा तो अल्लाह तआला उसे अपनी अनुकम्पा से उन सभी आपदाओं से सुरक्षित रखेगा जो उस दिन में उतरती हैं। तो क्या इसका यही समाधान है या नहीं ?

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    हमने सुना है कि ऐसी मान्यताएं पाई जाती हैं जिसका आशय यह है कि सफर के महीने में शादी, खतना और इसके समान अन्य चीज़ें करना जायज़ नहीं है। कृपया हमें इस बारे में इस्लामी क़ानून के अनुसार अवगत कराएं। अल्लाह आप की रक्षा करे।

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    अक्सर दोहराया जाता रहता है कि सफर का महीना नहूसत (अपशगुन, दुर्भाग्य) का महीना है, जिससे कुछ अवाम बहुत से मामलों में अपशकुन लेते हैं। चुनाँचे उदाहरण के तौर पर इस महीने में निकाह नहीं किया जाता है, इसी तरह कुछ लोगों का मानना है कि निकाह की सभा में लकड़ी तोड़ना या रस्सियों में गाँठ लगाना और उंगलियों में उंगलियाँ डालना जायज़ नहीं है ; क्योंकि इसकी वजह से यह विवाह विफल हो जायेगा और पति-पत्नी के बीच सामंजस्य नहीं बन पायेगा। चूँकि यह अक़ीदा को प्रभावित करता है, इसलिए कृपया नसीहत (सदुपदेश) करें और इस बारे में शरई प्रावधान स्पष्ट करें। अल्लाह तआला सभी लोगों को उस चीज़ की तौफीक़ प्रदान करने जिसे वह पसंद करता है और उससे प्रसन्न होता है।

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    अल्लाह तआला की अपने बन्दों पर असंख्य नेमतों में से एक यह है कि वह उन्हें नेकियों के मौसम प्रदान करता रहता है ताकि उन्हें भरपूर बदला दे और अपनी अनुकम्पा से उन्हें अधिक प्रदान करे। अभी हज्ज का शुभ मौसम समाप्त ही हुआ था कि उसके बाद एक महान मौसम और आ गया और वह अल्लाह का महीना मुहर्रम है। प्रस्तुत लेख उसकी फज़ीलतों और उसके प्रावधान का वर्णन किया गया है।

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    अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जिस दिन पैदा हुए उसका क्या महत्तव है, तथा उस दिन को कब और कैते मनाया जाता है ?

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    मीलाद के लिए लोगों के एकत्रित होने का क्या हुक्म है जबकि उनका यह भ्रम होता है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उनकी सभाओं (महफिलों) में उपस्थित होते हैं ॽ क्या यह जमावड़ा (सभा) धार्मिक दृष्टिकोण से सही है ॽ हमें नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जन्म दिन पर क्या करना चाहिए ॽ और आप का जन्म किस दिन, किस महीने और किस वर्ष हुआ और क्या नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपनी क़ब्र में अभी जीवित हैं या नहीं ॽ

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    क्या बिदअत वाली सभाओं जैसे - मीलादुन्नबी की रात, मेराज की रात और पंद्रह शाबान की रात के उत्सवों में उस व्यक्ति के लिए उपस्थित होना जायज़ है, जो उनके अवैध होने का अक़ीदा रखता है ताकि वह उसके बारे में सच्चाई को बयान करे ॽ

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    नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जन्म दिन का उत्सव मनाने का क्या हुक्म है, और क्या नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उस में उपस्थित होते हैं ॽ

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    प्रस्तुत लेख में अपशकुन व निराशावाद का अर्थ स्पष्ट करते हुए यह उल्लेख किया गया है कि यदि मुसलमान के दिल में अपशकुन पैदा हो जाए तो उसके साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए। तथा इस बात पर प्रकाश डाली गई है कि सफर के महीने से अपशकुन लेना जाहिलियत के समयकाल की प्रथा है, इस्लाम धर्म में उसकी कोई वास्तविकता नहीं है।

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    मेरे ऊपर रमज़ान के रोज़े की क़ज़ा अनिवार्य है और मैं आशूरा (दसवें मुहर्रम) का रोज़ा रखना चाहता हूँ। क्या मेरे लिए क़ज़ा करने से पहले आशूरा का रोज़ा रखना जाइज़ है ? तथा क्या मेरे लिए रमज़ान के रोज़े की क़ज़ा की नीयत से आशूरा (यानी दसवें मुहर्रम) और ग्यारहवें मुहर्रम का रोज़ा रखना जाइज़ है ? और क्या मुझे आशूरा के रोज़े की फज़ीलत प्राप्त होगी ?

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