आशूरा के दिन अलंकरण और आभूषण का प्रदर्शन करना

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मैं गर्ल्स कॉलेज में एक छात्रा हूँ। हमारे बीच शियाओं की बड़ी संख्या रहती है। वे लोग इस समय आशूरा के अवसर पर काले कपड़े पहनते हैं। तो क्या हमारे लिए इस बात की अनुमति है कि उसके विपरीत हम चमकीले रंगों वाले कपड़े पहनें और अधिक से अधिक श्रृंगार करें ? केवल इसलिए कि हम उन्हें चिढ़ायें और क्रोध दिलायें ! और क्या हमारे लिए उनकी गीबत करना और उन पर बद्-दुआ (शाप) करना जाइज़ है ? जबकि ज्ञात रहे कि वे हमारे लिए घृणा और द्वेष का प्रदर्शन करते हैं, तथा मैं ने उनमें से एक छात्रा को देखा कि वह ताबीज़ पहने हुए थी जिन पर मंत्र लिखे हुए थे और उसके हाथ में एक छड़ी थी जिस से वह एक छात्रा की ओर संकेत कर रही थी और मुझे उस से हानि पहुँचती थी और बराबर पहुँच रही है।

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    आशूरा के दिन अलंकरण और आभूषण का प्रदर्शन करना

    حكم إظهار الزينة يوم عاشوراء

    ] fgUnh & Hindi &[ هندي

    और अल्लाह तआला ही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान रखता है।

    محمد صالح المنجد

    अनुवाद : साइट इस्लाम प्रश्न और उत्तर

    समायोजन : साइट इस्लाम हाउस

    ترجمة: موقع الإسلام سؤال وجواب
    تنسيق: موقع islamhouse

    2012 - 1433

    आशूरा के दिन अलंकरण और आभूषण का प्रदर्शन करना

    मैं गर्ल्स कॉलेज में एक छात्रा हूँ। हमारे बीच शियाओं की बड़ी संख्या रहती है। वे लोग इस समय आशूरा के अवसर पर काले कपड़े पहनते हैं। तो क्या हमारे लिए इस बात की अनुमति है कि उसके विपरीत हम चमकीले रंगों वाले कपड़े पहनें और अधिक से अधिक श्रृंगार करें ? केवल इसलिए कि हम उन्हें चिढ़ायें और क्रोध दिलायें ! और क्या हमारे लिए उनकी गीबत करना और उन पर बद्-दुआ (शाप) करना जाइज़ है ? जबकि ज्ञात रहे कि वे हमारे लिए घृणा और द्वेष का प्रदर्शन करते हैं, तथा मैं ने उनमें से एक छात्रा को देखा कि वह ताबीज़ पहने हुए थी जिन पर मंत्र लिखे हुए थे और उसके हाथ में एक छड़ी थी जिस से वह एक छात्रा की ओर संकेत कर रही थी और मुझे उस से हानि पहुँचती थी और बराबर पहुँच रही है।

    हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान अल्लाह के लिए योग्य है।

    तुम्हारे लिए आशूरा के अवसर पर किसी भी प्रकार के कपड़े के द्वारा आभूषित और श्रृंगार करना जाइज़ नहीं है ; क्योंकि जाहिल (अज्ञानी) और दुष्ट उद्देश्य वाला आदमी इस से यह समझ सकता है कि अह्ले सुन्नत (सुन्नी लोग) हुसैन बिन अली रज़ियल्लाहु अन्हुमा की हत्या पर खुश होते हैं। हालांकि अल्लाह की पनाह ! कि अह्ले सुन्नत इस से सहमत और खुश हों।

    रही बात उनके साथ गीबत के द्वारा व्यवहार करने, उन पर बद्-दुआ करने और इसके अलावा अन्य व्यवहार जिनसे नफरत और द्वेष का संकेत मिलता हैं, तो ये उपयुक्त और लाभकारी नहीं हैं। हमारे ऊपर जो चीज़ अनिवार्य है वह उन्हें आमंत्रण देने, उन पर प्रभाव डालने का प्रयास करना और उनका सुधार करने में संघर्ष करना है। यदि आदमी इस बात की क्षमता और योग्यता नहीं रखता है तो उनसे उपेक्षा करे और उस व्यक्ति के लिए मैदान छोड़ दे जो इसका सामर्थ्य रखता है, और कोई ऐसा क़दम न उठाये जो दावत के रास्ते में बाधा डालने वाला हो।

    शैख: सअद अल हुमैयिद

    तथा शैखुल इस्लाम इब्ने तैमिय्या रहिमहुल्लाह ने फरमाया:

    "शैतान- हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु की हत्या के कारण लोगों के अंदर दो नवाचार (बिद्अतें) पैदा करने लगा : आशूरा के दिन दुःख और शोक प्रकट करने की बिद्अत जैसेकि चेहरा पीटना, चींखना चिल्लाना, रोना, और मर्सिये पढ़ना . . . तथा खुशी और आनंद की बिद्अत . . . इस प्रकार उन लोगों ने शोक और दुःख (मातम) प्रकट करना शुरू कर दिया और इन लोगों ने खुशी और उल्लास मनाना शुरू कर दिया, चुनाँचि वे आशूरा के दिन सुर्मा (काजल) लगाना, स्नान करना, बाल बच्चों पर खर्च में विस्तार करना और आसामान्य खाने और पकवान तैयार करना अच्छा (श्रेष्ठ) समझने लगे . . . हालांकि हर नवाचार (बिद्अत) पथभ्रष्टता और गुमराही है, तथा मुसलमानों के चारों इमामों तथा अन्य लोगों में से किसी एक ने भी इन दोनों चीज़ों में से किसी चीज़ को भी पसंद नहीं किया है . . . "मिनहाजुस्सुन्ना" (4/554-556) से संक्षेप के साथ समाप्त हुआ।