इस्लाम के विषय में जानें

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    इस्लाम इन्सान की हैसियत से इन्सान के कुछ हक़ और अधिकार मुक़र्रर करता है। दूसरे शब्दों में इसका मतलब यह है कि हर इन्सान चाहे, वह हमारे अपने देश और वतन का हो या किसी दूसरे देश और वतन का, हमारी क़ौम का हो या किसी दूसरी क़ौम का, मुसलमान हो या ग़ैर-मुस्लिम, किसी जंगल का रहने वाला हो या किसी रेगिस्तान में पाया जाता हो, बहरहाल सिर्फ़ इन्सान होने की हैसियत से उसके कुछ हक़ और अधिकार हैं जिनको एक मुसलमान लाज़िमी तौर पर अदा करेगा और उसका फ़र्ज़ है कि वह उन्हें अदा करे।

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    मैल्कम एक्सः «मैल्कम एक्स» या «मालिक शाबाज़» एक प्रसिद्ध अमेरिकी इस्लामी धर्म उपदेशक हैं, जिन्हों ने अमेरिका में इस्लामी आंदोलन के आचरण को सही किया जो बुरी तरह सत्यमार्ग से भटक गया था। उन्हों ने शुद्ध अक़ीदा के लिए आमंत्रित किया और उस पर धैर्यपूर्वक सुदृढ़ रहे यहाँ तक कि उसका आमंत्रण देते और सत्य की रक्षा करते हुए शहीद हो गए। प्रस्तुत पुस्तिका में उनकी जीवनी प्रस्तुत की गई है।

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    इस किताब में दुनियाभर के ग्यारह ईसाई पादरियों और धर्मप्रचारकों की दास्तानें हैं जिन्होंने इस्लाम अपनाया। गौर करने वाली बात यह है कि ईसाईयत में गहरी पकड़ रखने वाले ये ईसाई धर्मगुरू आखिर इस्लाम अपनाकर मुसलमान क्यों बन गए ? आज जहाँ इस्लाम को लेकर दुनियाभर में गलतफ़हमियां हैं और फैलाई जा रही हैं, ऐसे में यह किताब मैसेज देती है कि इस्लाम वैसा नहीं है जैसा उसका दुष्प्रचार किया जा रहा है।

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    मैं एक अवधि से इस्लाम को व्यवहार में ला रही हूँ और यदि अल्लाह ने चाहा तो मैं उसे स्वीकार करने की इच्छा रखती हूँ, लेकिन मुझे कुछ खतरनाक समस्याओं का सामना है। मैं और मेरे पति एक अवधि से वैवाहिक समस्याओं से जूझ रहे हैं, बावजूद इसके कि मामला ठीक ठाक चल रहा है किंतु मै सुनिश्चित नहीं हूँ कि स्थिति सदा इसी तरह बनी रहेगी क्योंकि उसे सख्त क्रोध के दौरे पड़ते हैं, और जब से हमारे वकील ने मुझे इसकी सलाह दी है, मैं गंभीरता से उससे अलग होने के बारे में सोच रही हूँ। समस्या यह है कि अब मुझे उससे प्यार नहीं है, इसके अलावा वह मुझे इस्लाम स्वीकारने से रोकता है तथा वह स्वयं भी इस्लाम स्वीकार करने से इनकार करता है, और उसका कहना है कि वह मेरे इस्लाम क़बूल करने पर हमारे अलग हो जाने को प्राथमिकता देगा। दूसरी समस्या यह है कि मेरे पास दो बेटियाँ हैं जो एक हिंदू स्कूल में पढ़ रही हैं, तो मेरे इस्लाम में प्रवेश करने के बाद उन दोनों से संबंधित शरीअत का हुक्म (प्रावधान) क्या है। मेरी मुलाक़ात एक मुसलमान व्यक्ति से हुई है जिससे मैं प्यार करती हूँ और वह भी मुझे बहुत प्यार करता है, वह मुझसे दो बार शादी करने का अनुरोध कर चुका है, ज्ञात रहे कि मैं उसके साथ नहीं सेती हूँ और न ही इसतरह की कोई चीज़ मेरे दिल में है। और वह मेरी दोनों बेटियों को स्वीकार करने के लिए तैयार है यदि वे दोनों भी इस्लाम में प्रवेश कर लेती हैं। उसने कहा है कि वह साल के अंत तक प्रतीक्षा करेगा उसके बाद वह अपने मामले में व्यस्त हो जायेगा, क्योंकि कुछ अन्य महिलाएं भी हैं जिनके साथ वह घर बसा सकता है, परंतु वह मुझे उनपर प्राथमिकता देता है। मुझे बहुत सी चीज़ों के अंदर अपने मामले में सावधानी और दूरदर्शिता से काम लेने की आवश्यकता है, इसके होते हुए भी में अपने पति के प्रति खेद और पाप का आभास करती हूँ, क्योंकि वह हमारे विवाह को सफल बनाने की चेष्टा करता है। लेकिन खेद की बात यह हैं कि धर्म बहुत बड़ी रूकावट बनता है।

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    मैं ने आप की साइट पर कई प्रश्न पढ़े हैं जिन में आप गैर मुस्लिमों के प्रश्नों के उत्तर देते हैं, और मैं इस बात से सन्तुष्ट हूँ कि अल्लाह एक है और उस के ईश्दूत मुहम्मद अन्तिम सन्देष्टा हैं, मेरा प्रश्न यह है कि : मैं इस धर्म में कैसे प्रवेश करूँ, और मैं नमाज़ कैसे अदा करूँ जबकि मैं अरबी भाषा नहीं जानता हूँ, और क्या मैं अपना नाम बदल दूँ?

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    इस्लाम धर्म और मुस्लिम धर्म के बीच क्या अंतर है, या वे दोनों एक ही चीज़ हैं ॽ

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    मैं जानना चाहता हूँ कि क्या सत्य धर्म इस्लाम में रूचि रखने वाले व्यक्ति के लिए कोई प्रारंभिक बिंदु है क्योंकि मुझे बहुत से अलग अलग उत्तर प्राप्त हुए हैं ॽ

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    इस्लाम की शुरूआत कब हुई ॽ तथा मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और ईसा अलैहिस्सलाम के बीच कितना अंतराल है ॽ

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    इस पुस्तिका में यह उल्लेख किया गया है कि समस्त मानवीय धर्मों में मानवता और नैतिकता सम्बन्धी शिक्षाओं का वर्णन है, तथा विशेष रूप से इस्लाम धर्म के मूल ग्रंथ दिव्य कुरआन की अमृत वाणियों और मानवता उपकारक पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के मधुर सन्देशों में इसका व्यापक और स्पष्ट वर्णन हुआ है, स्वयं पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम इसके सर्वप्रथम और महान आदर्श नमूना थे, आपके बाद आपके उत्तराधिकारियों ने भी अपने व्यवहार से इसका प्रचार किया। अतः आज एक ऐसे समय में, जबकि मानव जाति, मानवता और नैतिकता खो देने के कारण, चारों ओर अशान्ति, अव्यवस्था, पारस्परिक घृणा, द्वेष, और अनैतिकता का शिकार है - इस बात की आवश्यकता बढ़ जाती है कि इस्लाम धर्म की मानवता, नैतिकता, उसके गुणों, सिद्धांतों, तर्कसिद्ध शिक्षाओं को प्रस्तुत व प्रदर्शित किया जाये ताकि उनका अनुसरण करके मानव अपना कल्याण कर सके और लोक परलोक में सौभाग्य से लाभान्वित हो। यह पुस्तिका इसी बात का आमंत्रण देती है।

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    इस पुस्तक में इस्लाम का अर्थ और उसकी वास्तविकता, अल्लाह के आदेश और उसकी शरीअत की जानकारी के साधन, ईश्दूतों और उनकी सत्यता के प्रमाणों का ज्ञान, इस्लाम और ईमान के स्तंभों का वर्णन, इस्लामी शरीअत के स्रोत और बंदों पर अनिवार्य कर्तव्यों का वर्णन किया गया है, तथा इस बात का उल्लेख किया गया है कि शरीअत को लागू करना अल्लाह की उपासना है और उसने मानव की पाँच आवश्यक ज़रूरतों की रक्षा की है।

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    सम्पूर्ण इस्लाम जिस के साथ अल्लाह ने अपने संदेष्टा मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को भेजा वह पाँच स्तम्भों पर आधारित है। कोई मनुष्य उस समय तक पक्का और सच्चा मुसलमान नहीं हो सकता जब तक कि वह उन पर ईमान न ले आए और उन पर कार्य बद्ध न हो। यह लेख में उन्हीं स्तम्भों पर आधारित है।

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    इस्लाम ही क्यों ?

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    दुनिया की भाषाओं में इस्लाम के परिचय का विश्वस्त इलेक्ट्रॉनिक संदर्भ https://islamhouse.com/hi/main

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